वीर दामोदर सावरकर ने 1923 में पहली बार हिन्दुत्व शब्द ढूंढ़ा और उसे परिभाषित किया। अपने एक अंग्रेजी पैंफ्लेट - हिंदुत्व - हू इज अ हिन्दु -। हिंदुत्व की उस विचारधारा की गूंज बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी सुनाई दी। सावरकर से लेकर वरुण गांधी तक संघ परिवार और बीजेपी में हिंदुत्व के कई ब्रांड उभरे और उनमें से कई ब्रांड को गर्व से लागू भी किया गया। सावरकर ब्रांड हिंदुत्व, गोलवलकर ब्रांड हिंदुत्व, बालासाहेब देवरस ब्रांड हिंदुत्व, वाजपेयी ब्रांड हिंदुत्व, आडवाणी ब्रांड हिंदुत्व, मोदी छाप हिंदुत्व और अब वरुण ब्रांड हिंदुत्व। कार्यकारिणी में एक राय स्पष्ट दिखी। वरुण ब्रांड हिंदुत्व नहीं चलेगा।
पार्टी के एक बड़े धड़े के मुताबिक वरुण का मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलना पार्टी के लिये भारी पड़ा। लेकिन हकीकत तो ये है कि चुनाव के दौरान पार्टी के भीतर ही वरुण के खिलाफ जो आवाज उठी वो दबा दी गयी। क्योंकि पार्टी तो हिंदुत्व से एकस्पेरिमेंट करने के मूड में थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और आडवाणी को लगा यही मौका है वरुण के रास्ते हिंदुत्व का झंडा फिर बुलंद किया जाये ताकि आडवाणी प्रधानमंत्री बनें और आरएसएस को यकीन दिलाया जा सके कि पार्टी अपने धर्म से कतई नहीं डिगी है। एक तरफ थे मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलने वाले वरुण। और दूसरी तरफ करोड़ों मुसलमान जो कि यकीनन वरुण के बयान से आहत हुये थे। लेकिन लगभग पूरा बीजेपी खेमा वरुण के साथ खड़ा दिखा। राजनाथ और आडवाणी खेमे के माने जाने वाले वैंकैया नायडू तो वरुण की कुशल-क्षेम लेने इटावा जेल भी गए। कुल मिलाकर मैसेज ये दिया कि वरुण तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। आडवाणी मनमोहन पर कमजोर प्रधानमंत्री होने का आरोप लगाते रहे मगर वरुण की जहरीली सोच पर चुप्पी साध कर अपनी ही बनायी लौह पुरुष की छवि को अपने ही हाथों से नेस्तनाबूत कर दिया।
इससे पहले पार्टी 2004 की अपनी हार पर भी आत्मचिंतन करने से कतराती रही। तब पार्टी की हार का एक बड़ा कारण नरेन्द्र मोदी ब्रांड हिंदुत्व भी था जिसका मुजाहिरा गोधरा, बेस्ट बेकरी, नरोडा पटिया और गुलबर्गा सोसाइटी के नरसंहार में दिखा। वरुण ने तो जहरीला भाषण दिया। मोदी पर वैसी हरकतों को अंजाम देने का आरोप लगा। तब न शाहनवाज बोले न नकवी। बीजेपी ने तब भी अपनी हार से कोई सबक नहीं लिया। क्योंकि सही मायनों में आत्म चिंतन होता तो दिखता कि फोड़े घाव बन चुके हैं। उसका इलाज करना पड़ता। सब को मालूम था कि घाव रिस रहा है, इलाज जल्द न किया तो नतीजे भयंकर होंगे, मगर सब उस घाव से निकलते मवाद को नजरअंदाज करने का नाटक करते रहे। नतीजा ये रहा कि 2009 आते-आते आडवाणी ब्रांड हिंदुत्व भी फेल हो गया।
अब लाल कृष्ण आडवाणी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में इंक्लूसिव हिंदुत्व पर जोर दे रहे। सुप्रीम कोर्ट के परिभाषित हिंदुत्व पर जोर दे रहे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि हिंदुत्व या हिंदुइज्म भारतीय संस्कृति और परंपरा से अलग किसी धर्म विशेष के संकीर्ण दायरे में रखकर नहीं समझा जा सकता। हिंदुत्व एक जीवन शैली है। इसे उग्र हिंदुत्व से जोड़ना गलत है। तो आडवाणी के बयान के क्या मतलब निकाले जाएं। बीजेपी अपने किये पर पश्चाताप करना चाहती है? अगर ऐसा है तो पश्चातात के लिये वरुण का केस सामने है। फॉरेन्सिक रिपोर्ट तय कर ही चुकी है कि सीडी में आवाज वरुण की ही थी। पार्टी सांसद वरुण को इस्तीफा देने के लिये बाध्य करे। क्या वरुण के सैक्रिफाइस के लिये बीजेपी मन बना पाएगी। वर्ना पार्टी इतनी हिम्मत जुटाए कि वरुण को निर्देश दे कि वो पीलीभीत जाकर मुसलमानों से माफी मांगे। पार्टी खुद बीजेपी मुख्यालय से माफीनामा जारी करे।
उसके बाद गुजरात के मुसलमानों की तरफ आंख करनी होगी। इंक्लूसिव हिंदुत्व के नाम पर क्या पार्टी मोदी को गुजरात दंगों के लिये माफी मांगने को कहेगी। क्या बीजेपी ऐलान करेगी गुजरात दंगो की निष्पक्ष जांच करायी जाए। जापान और जर्मनी ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नरसंहार में मारे जाने वालों के परिवारों से माफी मांगी। कांग्रेस 1984 के सिख विरोधी दंगो के लिये सिखों से माफी मांग चुकी है। माफी मांगने से पाप तो नहीं धुलता शायद दिल पर पड़ा बोझ कम हो जाता है। क्या बीजेपी अपने दिल पर पड़े बोझ को हल्का करने में यकीन नहीं रखती, तो क्या ये माना जाए पार्टी कंधमाल दंगों के लिये, डांग दंगो के लिये, ग्राहम स्टेन्स हत्या के लिये ईसाईयों से माफी मांगेगी, क्या प्रमोद मुथालिक और बाबू बजरंगी की महिला विरोधी करतूतों के लिये माफी मांगेगी, क्या बजरंग दल जैसे मिलिटेंट और उत्पाती संगठन इंक्लूसिव हिंदुत्व की राह में रोड़ा नहीं, मोहन भागवत तय करें ऐसे संगठन के बने रहने का क्या औचित्य है।
आडवाणी ने इशारों-इशारों में ये भी कहा आरएसएस के बिना बीजेपी अधूरी है। आडवाणी नए, होनहार युवा की खोज करने और बीजेपी की तीसरी, चौथी और पांचवी पंक्ति खड़ी करने भारत यात्रा पर निकलने वाले हैं। उनका पहला पड़ाव नागपुर होना चाहिए। हेडगेवार भवन में बैठकर मंथन करना पड़ेगा। समझाना होगा राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम का लघु रूप ही स्वीकार करना बेहतर है क्योंकि समाज का एक वर्ग पूरे गीत को स्वीकार नहीं करता। आरएसएस के साथ तर्क करना पड़ेगा कि वनवासी कल्याण आश्रम का उद्देश्य आदिवासियों के हितों और उनकी जरूरतों की रक्षा करना है न कि दारा सिंह सरीखे लोगों के जरिये उग्र हिंदुत्व का प्रचार करके अख्लियतों को मारना काटना। तर्क करना पड़ेगा कि विश्व हिन्दु परिषद के अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया को इंक्लूसिव हिंदुत्व का पाठ कैसे पढ़ाया जाए। आरएसएस के साथ बैठ कर तर्क करना होगा कि कैसे हल हो सकता है अयोध्या का मसला। हेडगेवार भवन से ही ऐलान हो जाये कि आरएसएस अयोध्या की विवादित स्थान से अलग दूसरे स्थान पर मंदिर और मस्जिद दोनों बनवाने के पक्ष में है। राम तो कण-कण में हैं। फिर मंदिर कहीं बने। अगर आडवाणी और भागवत संघ परिवार में ये वैचारिक मंथन कराने में कामयाब होते हैं तो बीजेपी में ही क्यों, हो सकता है आरएसएस में भी तीसरी और चौथी पंक्ति के नेता उभर कर सामने आएं। और आडवाणी का टैलेंट हंट किसी मुकाम तक पहुंचे। अगर \'पार्टी विद ए डिफ्रेंस\' बनना है तो आउट ऑफ द बॉक्स सोचना होगा। चाल, चरित्र और चेहरा बदलना होगा।
इंक्लूसिव पॉलिटिक्स, इंटिग्रल ह्यूमेनिज्म और सोशल इंजिनियरिंग जैसे उम्दा शब्दों के मायने तभी समझ आएंगे जब जमीन पर इन्हें लागू किया जाए और इसके लिए आरएसएस और बीजेपी दोनों एक दूसरे के पूरक साबित हों। इस्लाम धर्म और उस दौर के सबसे बड़े और अहम परिवर्तन को सबसे पहले कबूल करने वालों में हजरत मुहम्मद की पत्नी खादिजा थीं। अपने राजनीतिक जीवन की संध्या में आडवाणी संघ परिवार में तब्दीली लाने में सहायक तो बन ही सकते हैं। शायद लौह पुरुष बनने का रास्ता इसी पड़ाव से होकर गुजरता हो।








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