अमित चौधरी
Saturday , July 23, 2011 at 14 : 32

आज तक नहीं बदली 'वागले की दुनिया'


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वागले की दुनिया यह नाम 1988 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले उस सीरियल का है जिसे यादकर आज भी मध्यवर्गीय उस भारतीय की तस्वीर आंखों के सामने उतर आती है जो कभी महंगाई तो कभी भ्रष्टाचार से लड़ता-मरता जिये जा रहा है। मशहूर लेखक और कार्टूनिस्ट आर. के. लक्ष्मण द्वारा लिखे इस सीरियल का मुख्या किरदार था 'श्रीनिवास वागले'। एक सरकारी ऑफिस में काम करने वाला बाबु 'मिस्टर वागले', दो बच्चों का बाप मिस्टर वागले, घर और बच्चों को संभालने वाली हाउस वाइफ राधिका का पति 'मिस्टर वागले'...!

ज़ाहिर है 'सास बहु', आनंदी, अक्षरा और रागिनी की मौजूदा टीवी की दुनिया में वागले की दुनिया याद दिलवाने के लिए ऊपर दिया ज्ञान ज़रूरी था। 1988 में मैं महज़ आठ साल का था। इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री की गद्दी पर थे। पंजाब में आतंकवाद चरम पर था, इस आतंकवाद का खौफ पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ में भी कम न था। शाम होते ही लोग अपने-अपने घरों में दुबक जाते, हमें भी खेलने के लिए बाहर नहीं निकलने दिया जाता, सड़कों पर अक्सर सेना और पुलिस की गाड़ियां दौड़ती दिखाई देती थीं। कभी भी कर्फ्यू लग जाता। तब मनोरंजन का एक मात्र साधन था टीवी, जिसे आजकल कुछ लोग इडियट बॉक्स भी कहते हैं। 1988 में ही दूरदर्शन पर शुरू हुआ 'वागले की दुनिया', उन दिनों आज की तरह हमारे पास कोई दूसरा चैनल देखने का विकल्प भी नहीं था। क्योंकि सेटेलाइट टीवी तब आम आदमी के जेहन में भी नहीं था। मनोरंजन का जरिया सिर्फ दूरदर्शन था, लिहाज़ा रात को नौ बजे प्रसारित होने वाला 'वागले की दुनिया' सीरियल देखना मेरे जैसे आठ साल के बच्चे के लिए मजबूरी भी था।

धीरे-धीरे मैंने इस सीरियल को देखना और बाद में पसंद करना शुरू कर दिया। मिस्टर वागले की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में मुझे अपने परिवार की ज़िन्दगी दिखनी शुरू हुई, एक मध्य वर्गीय भारतीय परिवार की ज़िन्दगी, मिस्टर वागले कभी लाइसेंस बनवाने के लिए सरकारी ऑफिस में धक्के खा रहे होते तो कभी बिजली का मीटर बदलवाने के लिए रिश्वत को लेकर परेशान रहते, कभी बच्चों की ट्यूशन फीस की चिंता तो कभी छोटी सी सेलरी में परिवार के गुजारे के साथ-साथ परिवार के हर सदस्य के शौक पूरे करने की कवायद, पेट्रोल महंगा हुआ तो स्कूटर में पेट्रोल भरवाने की बजाए बस में ऑफिस जाने की मजबूरी।

मुझे वागले की दुनिया में अपनी और आसपास की दुनिया दिखने लगी। हालांकि उस दुनिया के मायने आज की मेरी दुनिया से अलग हैं। बचपन में मैं वागले की दुनिया के किरदार अपने माता-पिता के साथ जोड़कर देखता था तब भी घर में महंगाई, भ्रष्टाचार और आतंकवाद जैसे शब्द अक्सर बातचीत का हिस्सा होते लेकिन आज जब में खुद शादीशुदा हो गया हूं एक बच्चे का बाप बन गया हूं तो देखता हूं कि वागले वो दुनिया आज भी मेरी ज़िन्दगी के साथ वहीं खड़ी है।

'वागले की दुनिया' सीरियल के 22 साल बाद बेशक आज बीएसएनएल के लैंडलाइन फ़ोन की जगह मोबाइल फ़ोन ने ले ली है, टीवी को कंप्यूटर और इन्टरनेट मात दे रहा है, दोस्तों से मुलाकात खेल के मैदान या फिर कैंटीन के बाहर न होकर फेसबुक और ट्विटर जैसी वर्चुअल दुनिया में हो रही है लेकिन असलियत यही है कि आज भी हमारी ज़िन्दगी से महंगाई, भ्रष्टाचार और आतंकवाद नहीं निकल पाए हैं। 'वागले' की वो दुनिया आज भी वहीं की वहीं खड़ी है।

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अमित चौधरी के बारे में कुछ और

फिलहाल आईबीएन7 के चंडीगढ़ ब्यूरो में सीनियर स्पेशल कोरेस्पोंडेंट के रूप में कार्यरत। पिछले 10 सालों से मीडिया में। 2005 में चैनल 7 ज्वाइन करने से पहले स्टार न्यूज़ के चंडीगढ़ ब्यूरो में दो साल बतौर फ्रीलांसर और स्टाफर काम किया। इससे पहले लोकल टीवी चैनल में बतौर सीनियर रिपोर्टर जुड़े रहे। स्नातक डीएवी कॉलेज चंडीगढ़ से 2003 में किया।
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