अपैल, 2009
विधानसभा चुनावों के बाद अलगावादी नेताओं के खेमे में एक बड़ी बहस छिड़ी कि क्या चुनाव बहिष्कार करना ठीक है। हुर्रियत का एक धड़ा इस राय पर सहमत हो गया कि चुनाव बहिष्कार से मसला-ए-कश्मीर को फ़ायदा नहीं हो रहा और न ही लोग इसका साथ दे रहे हैं। इसलिए बहिष्कार की राजनीति को तब्दील करने में ही भलाई है। हुर्रियत मोडरेट धड़े के रहनुमा मौलाना अब्बास अंसारी के चुनाव बहिष्कार न करने के ऐलान के बाद अलगाववादी खेमे में ज़बरदस्त खलबली मच गई। मौलाना साहब के पुतले भी जलाए गए और उनके खिलाफ नारेबाजी भी हुई लकिन इस सारे मामले में जो अहम और गौर करने वाली बात है वो यह कि मौलाना साहब को अब तक कोई खोफनाक धमकी नहीं मिली जो ऐसे बयानों के बाद अक्सर मिला करती थी। इस तरह रिवायत बदल गई और एक नई रिवायत ने जन्म लिया। इस रिवायत के बदलने....
विधानसभा चुनाव में लोगों की भरपूर शमूलियत की वजह से इस बार लोकसभा चुनावों का मंज़र किसी हद तक बदला दिख रहा है। मगर माहौल में कहीं खोफ भी दिख रहा है। पिछले कुछ हफ्तों से एक अरसे के बाद अचानक आतंकी कार्रवाई में तेजी को लोकसभा चुनावों से ही जोड़कर देखा जा रहा है। घुसपैठ में भी अचानक इजाफा हुआ है हालांकि पहाड़ियों पर अभी भी काफी बर्फ मौजूद है और इस मौसम में नियंत्रण रेखा पार करना बड़ा जोखिम का काम रहता है। इसके बावजूद आतंकी यह रेखा पार करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते दिख रहे हैं। कुपवाड़ा में हुई 6 दिन की मुठभेड़ इस बात का साफ़ इशारा करती है कि आने वाले दिनों में यह घुसपैठ की कोशिश और बढ़ सकती है। लश्कर-ए-तोइबा ने पहले ही साफ़ कर दिया है कि आने वाले दिनों में इन हमलों में और तेजी होगी। ....









