खालिद हुसैन
Monday , March 09, 2009 at 12 : 39

बिजली-पानी-सड़क के आगे क्या....


0IBNKhabar

क्या लोकसभा चुनाव में भी वही जोश देखने को मिलेगा, बिजली-पानी-सड़क से आगे बढ़कर अब लोग क्या चाहते हैं, क्या लोग अब अमन शांति के लिया वोट करेंगे, क्या कश्मीर विवाद के हल के लिए वोट करेंगे या फिर मतदाता दूर से ही तमाशा देखेंगे या फिर बिजली-पानी-सड़क का नारा बुलंद होगा।

विधानसभा चुनाव की लम्बी-लम्बी कतारों में ठंड से ठिठुरते मतदाता, फारन के अंदर कांगड़ी लिए मर्द, मुंह ढाके हुए औरतें और आंखों में उम्मीद लिए युवा बिजली-सड़क-पानी की बात करते दिखे। लोगों ने सब भुलाकर अपनी रोज़ मर्रा की मुसीबतों को दूर करने के लिया वोट दिया। सारे सियासी मुद्दों पर इनके ये मुद्दे भारी पड़े। इन चुनावों के नतीजे सबको चौंका देने वाले थे।

इस बार का मतदान राज्य में पिछले बीस साल से जब से हालात बिगड़े और आतंकवाद ने अपना जाल फैलाया तब से लेकर आज तक सबसे ज्यादा रहा। इन चुनावों की और भी कई खास बातें थीं। इन चुनावों में 1,354 के रिकॉर्ड नंबर की संख्या में उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया और इस चुनाव में सबसे कम हिंसा देखने को मिली वो भी तब जब कुछ ही वक्त पहले अमरनाथ ज़मीन विवाद ने पूरे राज्य को हिला दिया था। कुल मिलाकर यह चुनाव हर रंग से चौंका देने वाला रहा।

विधानसभा चुनाव में सियासी मुद्दे कहीं पर भी नहीं दिखे, पीडीपी का सेल्फ रूल का मुद्दा, नैशनल कॉन्फ्रेंस का ऑटोनोमी एजेंडा दफ़न हो गए।

कांग्रेस सियासी मुद्दों से दूर ही रही लकिन अब लोकसभा चुनाव में कश्मीर विवाद और जम्मू बनाम कश्मीर के मुद्दे पर फिर राजनीति हो सकती है। पीडीपी अपने सॉफ्ट अलगाववाद एजेंडे को लेकर फिर मैदान उतरी है और सेल्फ रूल का राग अलाप रही है ताकि कश्मीर में ओर मैदान मार सके वहीं बीजेपी जम्मू क्षेत्र के मुद्दे पर जोर दे रही है ताकि जम्मू के हिन्दू वोट हासिल कर सके। इन दोनों दलों ने विधानसभा में भी इन्हीं मुद्दों को लेकर एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था मगर जीत हासिल नहीं कर सके लकिन दोनों दलों को फायदा ज़रूर हुआ था।

आने वाले लोकसभा चुनाव में विधानसभा चुनावों के नतीजों का असर भी रहेगा, कश्मीर के तीन लोकसभा चुनाव क्षेत्र में से अनंतनाग, पुलवामा पर पीडीपी का पलड़ा भारी दिख रहा है वहीं श्रीनगर, बुडगाम और बारामुला-कुपवाड़ा क्षेत्र में कोएलिशन पार्टनर कांग्रेस ओर नैशनल कॉन्फ्रेंस का हाथ भारी दिख रहा है। नैशनल कॉन्फ्रेंस ने 1977-1989 तक कश्मीर की सारी सीटें जीती थीं। 1996 मे नैशनल कॉन्फ्रेंस ने चुनाव लड़ा ही नहीं था फिर 2002 मे उन्होंने एक सीट गवांई जो पीडीपी के हिस्से मे आई।

वहीं जम्मू मे बीजेपी ओर कांग्रेस के बीच ज़ंग रहेगी जहां अमरनाथ ज़मीन विवाद के बाद कांग्रेस को धक्का लगा है और बीजेपी को फायदा हुआ है। बीजेपी पहली बार 1 से 11 विधानसभा सीट तक पहुंची है और वो इसे बरकार रखने की कोशिश करेगी जम्मू एजेंडा उछाल कर।

विधानसभा चुनाव में देखा गया मतदान का उत्साह फिर देखने को मिलता है यह कह पाना अभी मुश्किल होगा। पिछली बार हुर्रियत की पोल बॉयकॉट कॉल नहीं चली अबकी बार वो फिर कोशिश में है और अब नहीं लगता की मतदाता बिजली-पानी-सड़क के नारे बुलंद करेंगे बल्कि इन चुनाव से जम्मू-कश्मीर राज के लोग सियासी मुस्तकबिल ढूंढेंगे।

IBN7IBN7
IBN7IBN7
IBN7IBN7

खालिद हुसैन के बारे में कुछ और

IBN7IBN7

IBN7IBN7

पिछली पोस्ट

    आर्काइव्स

    IBN7IBN7