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खालिद हुसैन
Tuesday , March 17, 2009 at 11 : 46

दिग्गज चुनाव लड़ेंगे नहीं लड़वाएंगे


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जम्मू-कश्मीर राज्य में आने वाले लोकसभा चुनाव एक नए अंदाज़ मे होंगे। राज्य के राजनीतिक हालात पर नज़र डाली जाये तो ऐसा लगता है कि अब की बार लगभग सारे राजनीतिक दल दिग्गजों के बजाए नये चहरे मैदान में उतारने के मिजाज़ में दिख रहे हैं।

कांग्रेस की बात करें तो गुलाम नबी आजाद और सैफुद्दीन सोज़ जैसे दिग्गज नेता दल को मजबूत करने के काम मे जुटे हैं जिससे इस बात का संकेत मिलता है कि अब की बार कांग्रेस कुछ एक नेताओं को छोड़ नए खिलाड़ियों को चुनावी रणभूमि में उतारने की सोच रही है।

वहीं, नैशनल कॉन्फ्रेंस भी इसी रास्ते पर चलती दिख रही है। दल के दिग्गज नेता और पार्टी प्रमुख फारूख अब्दुल्ला पहले ही दिल्ली का रुख कर चुके हैं। उमर अब्दुल्ला ने राज्य की कमान संभालकर यह बात साफ कर दी कि वो राज्य में अपने दल की जड़ों को और मजबूत करने के लिए ही काम करेंगे।

राज्य के एक और प्रमुख राजनीतिक दल पीडीपी के दिग्गज नेताओं महबूबा मुफ्ती और मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कांग्रेस से नाता तोड़कर दिल्ली के राजनीतिक दरवाजे फ़िलहाल खुद के लिये बंद कर लिए हैं। उनका कहना है कि उनके दल को फ़िलहाल राज्य में मजबूत करने की ज़रूरत है जिसके लिए उनका राज्य मे रहना ज़रूरी है।

ऐसा लगता है कि राज्य के सभी राजनीतिक दल इस उम्मीद के साथ नये चहरों को लोगों के सामने पेश करना चाहते हैं कि नये चेहरे इन दलों पर लगे हुए आरोपों को दूर करने में सही साबित होंगे लेकिन अब यह देखना ज़रूरी होगा कि यह दल जिन लोगों को मैदान में उतारें वो मतदाता को किस हद तक प्रभावित करने मे सफल रहेंगे।

वहीं इस बार बिजली-पानी-सड़क और रोगजार से आगे चलकर यह राजनितिक दल कुछ नये मुद्दों से मतदाताओं को रिझाने की कोशिश में दिखेंगे। घाटी के मतदाताओं की अगर बात करें तो ज्यादातर मतदाता कश्मीर घाटी में अमन की स्थापना चाहते हैं। अमन स्थापित करने के लिए ज़रूरी है कि कश्मीर समस्या का राजनीतिक समाधान निकाला जाए। ऐसे में यह साफ़ ज़ाहिर है कि कश्मीर मुद्दे की बात हर राजनीतिक दल का मुख्य मुद्दा रहेगा।

हालांकि विधानसभा चुनाव में राज्य के मतदाताओं ने अलगावादी नेताओं की चुनाव बहिष्कार कॉल को रद्द कर लोकतंत्र का बोल बाला किया था। मगर हर मतदाता यही कहता दिखा कि वो कश्मीर मसले को छोड़कर मतदान की क़तार में इसलिए खड़े हैं कि उनके अपने रोज़मर्रा की मुश्किलों का निपटारा हो सके। यह बात राजनेता भी भली-भांति जानते हैं। इसलिए अब की बार राजनेता इन रोज़मर्रा के मसलों के साथ-साथ कुछ नये मुद्दों से राज्य के मतदाताओं को रिझाते दिखेंगे।

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