विधानसभा चुनाव में लोगों की भरपूर शमूलियत की वजह से इस बार लोकसभा चुनावों का मंज़र किसी हद तक बदला दिख रहा है। मगर माहौल में कहीं खोफ भी दिख रहा है। पिछले कुछ हफ्तों से एक अरसे के बाद अचानक आतंकी कार्रवाई में तेजी को लोकसभा चुनावों से ही जोड़कर देखा जा रहा है।
घुसपैठ में भी अचानक इजाफा हुआ है हालांकि पहाड़ियों पर अभी भी काफी बर्फ मौजूद है और इस मौसम में नियंत्रण रेखा पार करना बड़ा जोखिम का काम रहता है। इसके बावजूद आतंकी यह रेखा पार करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते दिख रहे हैं। कुपवाड़ा में हुई 6 दिन की मुठभेड़ इस बात का साफ़ इशारा करती है कि आने वाले दिनों में यह घुसपैठ की कोशिश और बढ़ सकती है। लश्कर-ए-तोइबा ने पहले ही साफ़ कर दिया है कि आने वाले दिनों में इन हमलों में और तेजी होगी।
विधानसभा चुनावों से पहले मिलिटेंट संगठन ने चुनाव के दौरान खामोश तमाशाई बने रहने का ऐलान पहले से ही कर दिया था। उन्हें उम्मीद थी कि अमरनाथ ज़मीन विवाद से जो माहौल कश्मीर में पैदा हुआ उसे कोई भी मतदान के लिए नहीं जाएगा। वहीं अलगाववादी नेता ने लोहा गर्म समझकर चुनाव बहिष्कार की कॉल भी दे डाली थी। मगर जनता ने इन दोनों बातों को नज़रअंदाज़ करके बड़ी संख्या में विधानसभा चुनावों मे हिसा लिया था। यही वजह है शायद कि मिलिटेंट की खामोशी टूटती दिख रही है वो अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाना चाहते हैं। वो नहीं चाहते जो विधानसभा में वोट प्रतिशत रहा वो लोकसभा चुनाव में दोहराया जाये।
वैसे भी लोकसभा चुनाव में वोट प्रतिशत कश्मीर में कम ही देखने को मिलता है। यहां की जनता समझती है कि लोकसभा चुनाव से उनका सीधा वास्ता नहीं है। वो समझते हैं कि इन चुनावों से उनके रोज़मर्रा मसलों का हाल भी नहीं निकलता। इसलिए जनता की दिलचस्पी कम ही देखने को मिलती रही है। उस पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम चुनावी इलाका छावनी मे तब्दील होता है। इस माहौल में मतदाता घर में ही बैठना ठीक समझता है।
इस बार लश्कर की धमकी ओर खुफिया एजेंसियों को मिली इत्तला कि आतंकी चुनाव के दौरान गड़बड़ी पैदा करने का इरादा रखते है के चलते सुरक्षा के इंतजाम और कड़े कर दिये गए हैं। चुनाव के दौरान अधिक सुरक्षा मंगाई गई है ताकि हर हालात से निपटा जाए। आतंकी की हर चाल को नाकाम बनाने के सुरक्षा के नए मंसूबों पर काम जारी है लेकिन अगर आतंकी एक छोटी सी भी घटना को अंजाम देने में कामयाब हुए तो उनके लिए वो ही काफी है। क्योंकी उनका असली मकसद तो है अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाना।
कश्मीर का यह माहौल यहां की जनता खासकर पर्यटन से जुड़े लोगों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। यही वक्त रहता है जब देश-विदेश से पर्यटक कश्मीर का रुख करते है और सर्दियों के 6 महीने की मंदी के बाद यहां की जनता के लिए कमाई का वक्त शरू होता है लकिन चुनाव की गर्मी, बढ़ती सुरक्षा, आतंकियों की कार्रवाईयों में तेजी लाने की धमकी ने यहां की जनता को चौराहे पर ला खड़ा किया है लेकिन चुनाव तो होंगे। अब लोकतंत्र जीतता है या फिर खौफ, यह तो अभी कह पाना मुश्किल है लेकिन नुकसान अगर किसी का होगा तो वो होगा आम जनता का। चाहे फिर वो खोफ की वजह से वोट ना डालने का नुकसान हो यह माहौल की वजह से कारोबार में नुकसान हो।














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