विधानसभा चुनावों के बाद अलगावादी नेताओं के खेमे में एक बड़ी बहस छिड़ी कि क्या चुनाव बहिष्कार करना ठीक है। हुर्रियत का एक धड़ा इस राय पर सहमत हो गया कि चुनाव बहिष्कार से मसला-ए-कश्मीर को फ़ायदा नहीं हो रहा और न ही लोग इसका साथ दे रहे हैं। इसलिए बहिष्कार की राजनीति को तब्दील करने में ही भलाई है।
हुर्रियत मोडरेट धड़े के रहनुमा मौलाना अब्बास अंसारी के चुनाव बहिष्कार न करने के ऐलान के बाद अलगाववादी खेमे में ज़बरदस्त खलबली मच गई। मौलाना साहब के पुतले भी जलाए गए और उनके खिलाफ नारेबाजी भी हुई लकिन इस सारे मामले में जो अहम और गौर करने वाली बात है वो यह कि मौलाना साहब को अब तक कोई खोफनाक धमकी नहीं मिली जो ऐसे बयानों के बाद अक्सर मिला करती थी। इस तरह रिवायत बदल गई और एक नई रिवायत ने जन्म लिया। इस रिवायत के बदलने के पीछे जो भी वजह हो लकिन इसे एक तब्दीली ज़रूर कहा जा सकता है। मौलाना साहब के पुतले जला कर उनके बायान पर नाराज़गी जताना जम्हूरियत का हिस्सा है और जम्हूरियत में हर किसी को अपने ख्याल का इज़हार करने का हक़ है।
दरअसल इस धड़े को लगता है कि बेशुमार मुसीबतों और मजबूरियों के कारण लोग अब बहिष्कार सियासत का साथ नहीं दे रहे, अब उनपर दबाव डालना मुमकिन नहीं है। इसलिए जनता पर दबाव डालने के उल्टे नतीजे निकल सकते हैं बल्कि जो भी ऐसा करेगा वो जनता में अपना असर खो सकता है। इस धड़े को लगता है कि बहिष्कार को न कह कर वो जनता के जज्बातों का साथ दे रहे हैं।
वहीं, दूसरा धड़ा चुनाव को नॉन इशू समझने के बिलकुल खिलाफ है। इसके पास यह दलील है कि भारत चुनाव में लोगों की शिरकत को अपने हक़ में इस्तमाल करता है और दुनिया को बता रहा है कि कश्मीर की जनता भारत के साथ है। इस दलील में कितनी सदाकत है इस पर इख्तलाफ़ आज की बात नहीं है जिन दिनों महज़ रायशुमारी चुनाव बहिष्कार के साथ थी उन दिनों यह बहस होती थी कि क्या चुनाव में हिस्सा लेना चाहिये या नहीं, क्या चुनाव में हिस्सा लेने से कश्मीर मसले को फ़ायदा है, इसका असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या होता है। उन दिनों कश्मीर की वो लीडरशिप जो आज बहिष्कार के साथ है, बहिष्कार के खिलाफ थी और चुनावी मैदान में बहिष्कार के खिलाफ मज़बूत दलील के साथ बात करते थे लकिन जब महज़ रायशुमारी की लीडरशिप इस बात की कायल हुई कि चुनाव बहिष्कार सही नहीं है तो बहिष्कार की मुखालफत करने वाली यह लीडरशिप यह कहने लगी की चुनाव बहिष्कार जरूरी है।
दोनों लीडरशिप में किसी ने भी जनता को कभी भी यह राज़ नहीं बताया की बहिष्कार करने की सियासत यह इसे नहीं करने की सियासत में क्या वजह है। जब जो चुनाव लड़ता है कि वो जनता को सिर्फ यह बताता है कि चुनाव में हिस्सा लेने में उसकी भलाई है और जो बहिष्कार करता है वो जनता को बताता है कि बहिष्कार में ही कश्मीर के मुस्तकबिल का राज़ छुपा है।
कई अलगावादी नेताओं और मिलिटेंट संगठन के मुखियाओं ने जब चुनाव लड़ा था तब भी कश्मीर मसला था और बहिष्कार का रास्ता भी था लेकिन उस वक्त वो बहिष्कार के खलाफ थे तो क्या आज उनका कश्मीर मसले से कोई ताल्लुक बनता है। यह ऐसे सवाल हैं जिन पर आने वाले दिनों में तारीखदान चर्चा करेंगे। और आने वाली नस्ल के सामने हकीकत लाएंगे। इस वक्त यही गनीमत है कि हर किसी को अपनी अपनी राय का इज़हार करने का मौका मिल रहा है और यह बात जनता पर छोड़ी जा सकती है कि वो किस राय से इत्तफाक करती है क्योंकि जम्हूरियत में फैसले का हक शायद शरीफ जनता को होता है।














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