कोई माने या न माने, हकीकत यही है कि कश्मीर में बहुत ही गंभीर स्थिति पैदा हो गई है जिसका सबूत यहां का हर एक लम्हा खुद बयान कर रहा है। अफरातफरी, हंगामे, प्रदर्शन व मनमानी हर जगह यही दिख रहा है। न किसी को मकसद का पता और ना ही किसी को यह मालूम की किस तरह कौन सा मामला हल किया जा सकता है।
शोपियां में जो हुआ वो इस बात का सबूत फ़राहम करने के लिए काफी हैं। पीडीपी अध्यक्षा अपने मैंबर के साथ शोपियां पहुंचीं और उन्होंने कत्ल और बलात्कार मामले को हवा दी। महिलाओं के घर जाकर शोक जताना चाहा लेकिन घर में दाखिल होते ही वहां कोहराम मच गया। शोर इतना हुआ कि ना महबूबा जी कुछ कह सकीं और ना सुन सकीं। यहां मौजूद महिलाओं का यह हंगामा समझ में आ रहा था। और जब महबूबा जी कुछ नहीं कह पाईं तो जख्मों पर नमक छिड़क कर कहा कि इस मामले में पुलिस ने कत्ल और बलात्कार का मामला दर्ज नहीं किया है और चल पड़ीं पुलिस स्टेशन की ओर। जैसे ही लोगों ने यह सुना तो हंगामा बरपा हो गया। और एक बहुत बड़ा जुलूस निकला।
इस जुलूस में नैशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, हुर्रियत हर धड़े के लोग थे। यह पहली बार था कि लोग बिला लिहाज़ किसी एक बात पर प्रदर्शन कर रहे थे लेकिन फिर हर पार्टी इस भीड़ को अपने काबू में करने में लग गई। नतीजा हंगामा हिंसक हुआ और पुलिस को आंसू गैस के गोले दागने पड़े, लाठियां भांजनी पड़ीं। जवाब मे पथराव हुआ। कई दर्जन लोग घायल हुए। हालत पर किसी का काबू न रहा। मंजिल क्या है, मकसद क्या, जो कोई सड़क पर निकला अपना ही एजेंडा, अपना ही मकसद, अपनी ही मंजिल का नक्शा दिमाग में लिए दिखा। जो जी में आया वो कर गुज़रा, क्या इससे मामले हल हो सकता है।
किसी भी जद्दोजहद के लिए एक सोच होना लाज़मी है। एक रोड मैप की ज़रूरत होती है इसके बाद एक अच्छी कयादत हो तो मंजिल आसान होती है लकिन यहां ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है। हर जमात लोगों को अपने हिसाब से इस्तमाल करती है ओर अपनी सियासी दुकान चला रही है। कौम की फिक्र किसी को नहीं जो मर रहा है, ज़ख्मी हो रहा है उसकी किसी को फिक्र नहीं। सब इन मासूम बच्चों के खून पर सियासत कर रहे हैं।
इस बात पर कोई सोच विचार नहीं करता। बस हर हादसे की आग पर अपनी रोटियां सेकने में लगे हैं। घाटी के हालत खराब हो रही हैं किसी को इसकी फिक्र नहीं। किसी को फिक्र नहीं कि इन लोगों पर क्या बीत रही है जिनका कारोबार तबाह हो रहा है। हालत यह है कि इए लोगों के होठों पर ताले लगा दिए हैं लेकिन जब यह लोग अपना मुह खोलेंगे वो दिन इस सब के लिए काफी बुरा होगा जो लोग इन बातों पर सियासत करते हैं वो खुद छुपा भी नहीं पाए गए।
हड़ताल का इस्तमाल जितना कश्मीर में हुआ है दुनिया में इतना न तो कहीं हुआ होगा और ना होगा। एक दिन गिनिस बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में कश्मीर का नाम हड़ताल की वजह से ज़रूर दर्ज होगा और इसमें शायद यह भी लिखा जाएगा कि इन हड़तालों से कश्मीर को कुछ भी हासिल नहीं हुआ।
यह बात समझदार लोग ही समझ सकते हैं कि हड़ताल जैसे चीज का इस्तमाल अगर महदूद और बेहतर तरीके से किया जाए तो इससे कुछ हासिल हो सकता है लेकिन मुसलसल (लगातार) हड़ताल का मतलब बर्बादी के सिवाए ओर कुछ नहीं।
मजमूई तौर पर आज कश्मीर जिन हालातों में कैद है वो अफरातफरी के सिवा कुछ नहीं। और अब जब से भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में दरार आई है, लोगों का अमन दूर लगने लगा है। और यहां के लीडर हर इंसानी वाकये को इस तरह सियासी मकसद के लिए इस्तमाल कर रहे हैं तो प्रदर्शनों का असर भी कम होता दिख रहा है और एक दिन ऐसा भी होगा जब लोगों को इनमें बिलकुल दिलचस्पी नहीं रहेगी।
आज यह बातें शायद बहुत सारे लोगों को अजीब लगेंगीं मगर एक दिन खुद हालात उन्हें इसका एहसास दिला देगा। शोपियां मामले पर सियासत करके इसकी हकीकत जानने में काफी दुश्वारियां हो रही हैं और अगर हमने अक्लमंदी से इस मामले पर प्रदर्शन किया होता तो शायद अब तक मामले के मुलजिम अंजाम तक पहुंच गए होते.....














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