विधानसभा का इजलास जिस तरह से हुआ उससे ज़ाहिर होता है कि पीडीपी ने पहले से ही यह फैसला किया कि हुक्मरान इत्तहाद (गठबंधन) को हिला कर रख देगी और ऐसा बोहरान (हालात) पैदा कर देगी कि दिल्ली को भी सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा। इस तरह कांग्रेस के लिए कोई चारा ही नहीं रह जाएगा सिवाए इसके कि वो नेशनल कॉन्फ्रेंस का साथ छोड़ कर फिर से पीडीपी के साथ अपना नाता जोड़ ले।
इसलिये बहुत सोच-समझ कर एक ऐसा मामला चुना गया था जिसकी शिद्दत बजाहिर ख़त्म हो चुकी थी और जो तक़रीबन कश्मीरियों के दिमाग से उतर चूका था लेकिन इसके बावजूद यह मामला बहुत हिस्साफ (संवेदनशील) है और कश्मीरी ऐसे मामलों पर भड़कने की रिवायत रखते हैं और इस मामले पर अगर भड़क जाते तो बात बहुत दूर तक जाती।
सेक्स स्कैंडल कश्मीर और कश्मीरियों के लिए काफी अहम मामला रहा है। पीडीपी ने बहुत सोच-समझ करके इस मामले में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को मुलव्विज (शामिल) बताने का मंसूबा बनाया जिन लोगों ने मंसूबा तैयार किया होगा उन्हें पूरा यकीन था कि विधानसभा में यह मामला उठते ही पूरे कश्मीर में आग भड़क जाएगी और नेशनल कॉन्फ्रेंस की 6 महीने पुरानी सरकार लड़खड़ा कर गिर जाएगी। लेकिन इस मंसूबे में बहुत बड़ी खामी ये रही कि जिस पर इल्जाम लगाया गया उसके किरदार पर अभी तक एसा कोई दाग नहीं है और जो इल्जाम लगा रहा था उसके दामन पर ऐसे कई दाग का इल्जाम है। मुख्यमंत्री ने इल्जाम सुनते ही इस्तीफा देकर पीडीपी के मंसूबों पर पानी फेयर दिया।
आखिर उमर अब्दुल्ला इस इल्जाम से पूरी तरह बरी हो गए। अहम बात यह कि इस इल्जाम का लोगों में भी कोई असर नहीं हुआ। लोगों ने सुनकर अनसुनी कर दी यानी उन्हें यह इल्जाम कबूल नहीं था। इस तरह पीडीपी का वार पलट गया और मुख्यमंत्री के लिए उन्होंने जो रुसवाई का मंसूबा बनाया था वह उसकी अपनी रुसवाई बन गया। पीडीपी को इस को इस कदम से जो धक्का लगा उसे शायद वो कभी न भुला पाएगी। इससे साबित हुआ कि वो इख्तदार (सत्ता) हासिल करने के लिए कुछ भी कर सकती है इसके लिए किसी भी हद तक गिर सकती है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस को पीडीपी के इस ड्रामे से जो राजनीतिक फ़ायदा हुआ वो शायद उसे कभी नहीं होता। उमर अब्दुल्ला की पोजीशन इससे मजबूत हुई ओर उसकी जात (पर्सनैलिटी) और सरकार को लोगों का ऐत्माद हासिल हुआ लेकिन राजनीतिक दलों के फायदे और नुकसान से विधानसभा के कई दिन ज़रूर जाया हुए और जनता का बड़ा नुकसान हुआ।
इसके लिए जो जिम्मेदार है वो जनता के कटघरे में मुजरिम है और जनता उन्हें इसकी सजा ज़रूर देगी। क्योंकि सदन कोई जंग का मैदान नहीं है। यह वो जगह है जहां आम जनता के मसले उठाए जाते हैं और उन पर बहस की जाती है और अगर कोई राजनीतिक दल ऐसा करने से बचे और सत्ता की ज़ंग लड़ने सदन में जाए जो जनता का सब से बड़ा दुश्मन है। क्योंकि सदन के एक दिन की कार्यवाही पर जनता का भारी सरमाया खर्च होता है और जो जनता के हमदर्द होंगे वो इसकी कद्र करेंगे...














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