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खालिद हुसैन
Wednesday, October 21, 2009 at 18 : 44

जूनियर डॉक्टर्स की जिद और कश्मीरी जनता


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जूनियर डॉक्टर्स की हड़ताल जारी है जिसके नतीजे में कश्मीर के सारे सरकारी अस्पतालों में मुश्किल हालात पैदा हो गए हैं। आपातकालीन सेवा भी प्रभावित हुई है। पिछले कई दिनों से श्रीनगर के बड़े अस्पतालों में होने वाले ऑपरेशन भी नहीं हो पा रहे हैं। इस खराब सूरतेहाल का सामना कश्मीर की गरीब जनता कर रही है। पैसे वाले तो अपने लिये कोई भी सुविधा खरीद सकते हैं लेकिन गरीब अवाम की तो एक ही उम्मीद सरकारी अस्पताल होता है।

इन सरकारी अस्पतालों में ऐसे भी मरीज हैं जिन्हें डॉक्टरों की लगातार तवज्जो की ज़रूरत रहती है जो दर्द से मर भी सकते हैं। ऐसे मरीज भी होते हैं जिनका ऑपरेशन फ़ौरन करना होता है लेकिन अस्पतालों मे डॉक्टरों के न होने का मतलब है कई मरीजों की ज़िन्दगी से खिलवाड़।

डॉक्टरी का पेशा तो अजीम होता है, एक आम आदमी को खुदा के बाद सहारा होता है एक डॉक्टर पर। अब अगर यह पेशा भी सिर्फ पैसे की नज़र हो गया तो आम आदमी का क्या होगा। डॉक्टर के फ़र्ज़ को देखते हुए यह उनको शोभा नहीं देता की वो अपनी मांगें मनवाने के लिए हड़ताल जैसा कदम नहीं उठाएं। यह इंसानी जज्बे से सीधा खिलवाड़ है। एक डॉक्टर को समझना चाहिए कि उसके डॉक्टर बनने में उसकी मेहनत के साथ आम जनता की खून पसीने की कमाई भी लगी होती है और हड़ताल करके आम आदमी को मौत और ज़िन्दगी की कश्मकश में छोड़कर वो जनता की उम्मीदों का खून नहीं कर सकता।

माना डॉक्टर्स ने जो मांगें सरकार के सामने रखी हैं वो पूरी की पूरी नाजाइज नहीं हैं बल्कि ज़्यादातर जायज़ हैं और सरकार का फ़र्ज़ है कि डॉक्टर की मांगों पर हमदर्दी से गौर करे और उनके साथ बातचीत का दौर शुरू करे लेकिन सरकार ने पहले तो डॉक्टर्स की मांगों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया और जब गौर करना शुरू किया तब बहुत देर हो गई थी।

डॉक्टर हड़ताल का फैसला ले चुके थे अब जब हड़ताल हुए आधा महीना गुज़रा है। सरकार आज भी गंभीरता से बातचीत नहीं कर रही है और इससे लगता है कि डॉक्टर्स के साथ सरकार भी आम जनता से खिलवाड़ कर रही है जबकि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि अस्पताल के कामकाज में कोई रुकावट न हो। किस की क्या मांगें हैं और उन्हें कैसे हल किया जाए यह भी सरकार को ही देखना है लेकिन सरकार की यह पहली जिम्मेदारी है कि अस्पतालों में एक दिन क्या एक लम्हे के लिए भी मरीज की देखभाल ना रुके। और इससे साफ़ ज़ाहिर है आम जनता को पीड़ा देने में जितना हाथ डॉक्टर्स का है उसे ज्यादा जिम्मेदार सरकार है।

डॉक्टर्स के साथ-साथ सरकार भी गैरजिम्मेदारी से काम ले रही है। जनता पूछती है कि अगर डॉक्टर्स की मांगें हैं तो उसमें जनता का क्या कसूर है। और अगर सरकार डॉक्टर्स की मांगों पर गौर नहीं करती तो उसमें जनता का क्या कसूर है और जनता को किस बात की सजा मिल रही है। जो सजा उसे मिल रही है वो बहुत की संगीन सजा है वह भी बिना कसूर किए। और इस सब का जवाब सरकार को देना ही होगा......?

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