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खालिद हुसैन
Monday , November 09, 2009 at 11 : 51

यह कैसा फैसला?


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केंद्र सरकार के विभिन्न विभाग कश्मीर में अपने-अपने तरीके पर अमल करते हैं और अपने-अपने फैसले करते हैं और कभी यह फैसले कश्मीर के हालत को और ख़राब बनाने के कारण बनते हैं। कश्मीर में केंद्र के खिलाफ गुस्सा और बढ़ा देते हैं। प्री-पेड सर्विस पर बैन भी एसा ही एक फैसला है जिसने एक ही दिन में बीस हज़ार लोगों के रोज़गार पर ताला लगा दिया। बीस हज़ार घरों का प्रभावित होना यानी एक लाख लोगों की ज़िन्दगी पर असर होना।

इस फैसले के बारे में जब अभी अफवाहें ही फैल रही थीं तो केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट ने यह यकीन दिलाया कि राज्य की अवाम को ऐसा कोई फैसला नहीं लिया जायेगा लेकिन अभी इस वादे के शब्द लोग के कानों मे गूंज ही रहे थे की प्री-पेड सिम पर बैन का फैसला लागू किया गया।

यह फैसला क्यों लिया गया? कश्मीर की आम जनता बिल्कुल नहीं समझ पाई। और इसे ज्यादा हैरान किया जनता को इस बात ने कि यह फैसला अचानक क्यों लिया गया। कहा जाता है कि यह फैसला सुरक्षा कारणों से लिया गया। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है की कुछ प्री-पेड सिम आतंकियों के पास पहुंच गए हैं जिसका इस्तमाल वो देशद्रोह के कामों में करते हैं, बेशक इस तरह के कई सबूत भी मिले हैं कि आतंकियों के पास ऐसे कुछ सिम कार्ड पहुंचे हैं। ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि प्री-पेड सिम के सारे कागजात डीलर के पास ही जमा किए जाते हैं इसलिये इनमें हेराफेरी होनी की पूरी गुन्जाइश है।

यह बात अपनी जगह बिल्कुल ठीक है लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं की जनता की एक बड़ी तादाद को एक दम मुश्किलात में डाला जाए। प्री-पेड सिम पर बैन से न सिर्फ बीस हज़ार डीलर के रोज़गार पर असर पड़ा बल्कि व्यापारियों, स्टूडेंट, दुकादारों से जुड़े खासकर गरीब लोगों पर भी पड़ा है जिनके लिए मोबाइल अब एक ज़रूरत बन चुका है। उन लोगों को इस फैसले से काफी ज़हनी तकलीफ हुई है। अगर वाकई में सुरक्षा एजेंसियों को यह महसूस हो रहा था कि प्री-पेड सर्विस पर बैन के इलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। तब भी उन्हें चाहिए था कि लोगों को कुछ समय देते। कोशिश की जानी चाहिये थी कोई दूसरा रास्ता निकालने की ताकि जनता को एकदम इतनी बड़ी मुश्किल का सामना न करना पड़ता। क्योंकि इस फैसले से एक दो नहीं बल्कि करीबन 48 लाख लोग का सिम बंद होगा जो प्री-पेड का इस्तमाल करते थे राज्य में।

राज्य सरकार पर भी जनता हैरत जता रही है जिसका फ़र्ज़ है जनता को हर सुविधा देने का। राज्य सरकार केंद्र से एक महीने का वक़्त तो मांग सकती थी ताकि लोग प्री-पेड को पोस्ट पेड में बदल सकते लकिन इस अचानक फैसले से कश्मीर की जनता में केंद्र की तरफ काफी गुस्सा देखने को मिल रहा है और इस फैसले से एक आम कश्मीरी के भरोसे को बड़ी ठेस पहुंची है जो ऐसे हलात में केंद्र के लिये ठीक नहीं। जनता पूछ रही है कि आखिर उनकी खता क्या है और उन्हें बिना जुर्म किए सजा दी जा रही है।

इतना ही नहीं इस फैसले से बेकार हुए लोगों ने भी फैसला किया है कि वो बहुत जल्द एजिटेशन शुरू करेंगे। और इनका साथ देने का फैसला किया है व्यापारियों की फेडरेशन ने। और इस बात में कोई दो राय नहीं कि अगर बीस हज़ार डीलर सड़क पर आ गए तो एक नई स्थिति जन्म लेगी।

अभी भी मौका है सर जोड़कर बैठा जाए और इस मामले पर फिर सोचा जाए ताकि कोई ऐसा रास्ता निकले जिसे लोगों का रोज़गार भी न छिने, आम जनता को मुश्किलात का सामना भी न करना पड़े और सरकार ओर सुरक्षा एजेंसियों का मकसद भी पूरा हो जाये। ऐसा नहीं है कि इस तरह के रास्ते मौजूद ही न हों। इस तरह के एक नहीं बल्कि बहुत सारे रास्ते मौजूद हैं। ज़रूरत है सिर्फ जिम्मेदारी और अक्लमंदी से सब कुछ नज़र मे रख कर सोचने की।

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