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खालिद हुसैन
Wednesday, March 31, 2010 at 19 : 31

क्या लौटेगा डर?


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घाटी में पिछले कुछ साल की खामोशी के बाद फिर आतंकियों की सरगर्मियां पिछले कुछ समय से बढ़ने लगी हैं। खासकर श्रीनगर शहर में आतंकियों की मौजूदगी साबित हुई है। खुफिया विभाग को भी यह जानकारी है कि आतंकियों का एक ग्रुप श्रीनगर शहर में दाखिल होने में कामयाब हुआ है। और इसके बाद पूरे शहर में खतरे की घंटी बज गई है। जगह-जगह अचानक तलाशियां फिर से शुरू कर दी गई हैं। देर रात सड़कों पर फिर नाके लगने लगे हैं। आने-जाने वाली हर गाड़ी की तलाशी की जाती है। क्योंकि आतंकियों का श्रीनगर में एक भी हमला बहुत बड़ी कामयाबी है। क्योंकि जो पब्लिसिटी श्रीनगर में आतंकियों को मिलती है वो कश्मीर में किसी भी जगह हमला करने पर हासिल नहीं होती और आतंकी इस साल की शुरुआत से ही श्रीनगर को निशाना बनाया हुआ है।

लाल चौक के हमले के बाद वो कोई बड़ा हमला तो नहीं कर सके लेकिन श्रीनगर मे वो 'हिट एंड रन' रणनीति अभी भी अपनाए हुए हैं। और इसमें वो सुरक्षाकर्मी को मारे या फिर एक आम शहरी को उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, उसे तो गरज़ है अपनी पहचान की, अपनी खबर की। हालांकि यह लोग दावा तो करते हैं कि यह लड़ाई आम आदमी की है, तो फिर आम आदमी निशाना पर क्यों? अगर यह लड़ाई आम आदमी की है तो ऐसा तरीका भी होना चाहिए जिससे किसी आम आदमी की जान ना जाए। कश्मीर में कई ऐसी जगह हैं जहां सुरक्षाकर्मी तैनात हैं और यह लोग उनके साथ जंग कर सकते हैं तो फिर भीड़ वाले इलाकों मे हमले क्यों?

कुछ साल पहले जब कश्मीर मे आतंकवाद तेजी पर था तब भी ऐसे हमले देखने को मिले और तब अलगावादी नेताओं ने सामने आकर इन लोगों से अपील की थी कि ऐसे हमले रोके जाएं। लेकिन आज फिर ऐसे हमलों मे तेज़ी क्या इशारा करती हैं। विशेषज्ञों की मानें तो पिछले कुछ सालों में जो खामोशी और शांति लौटी थी उससे लोगों के दिलों से आतंकवाद का डर निकल गया था, लोग अपने काम काज मे जुट गए थे। और इस बात को यह लोग भी खूब समझते हैं और यह भी समझते हैं कि अपनी पकड़ और अपनी मौजूदगी और अपनी पहचान बनाए रखने के लिए अपनी कार्रवाईयां तेज़ करनी होंगीं। यह कार्रवाईयां जंगलों और पहाड़ी इलाकों में तेज़ करने से अपनी खोई पहचान कहिए या फिर कम हुई पकड़ कहिए। उसे वापस लाने में वक़्त लगेगा। इसलिए यह कार्रवाईयां यह लोग शहरों में करने की फिराक में हैं खासकर श्रीनगर में जिससे यह लोग आपनी पकड़ को जल्द से जल्द वापिस ला सकें।

लेकिन बीस साल पहले और आज के हालातों में काफी फर्क है और यह बात भी आज़माई हुई है कि लोगों के सहयोग के बगैर कोई भी विरोध ज़्यादा देर नहीं चल पाता है। क्योंकि कश्मीर की जनता ने पिछले 20 सालों में बहुत कुछ खोया है जान-माल, इज्ज़त-आबरू ही नहीं बल्कि अपना माज़ी, अपना मुस्तकबिल हर चीज़ दांव पर लगाया है। इसलिए अब यह जनता हर बात को सोच कर हर कदम उठाएगी। अब आबादी वाले इलाकों मे हमले कर आतंकी अपनी पहचान बनाने में फिर कामयाब होते हैं या लोग इसे नजरअंदाज कर अपना मुस्तकबिल सोचेंगे। यह समय ही तय कर पाएगा। लेकिन फिलहाल स्थिति नाज़ुक ज़रूर बनी हुई है।

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