खालिद हुसैन
Monday , March 26, 2012 at 17 : 27

कश्मीर के युवाओं को ये हुआ क्या है...!


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घाटी में खुदकुशी की बढ़ती घटनाएं दिन-ब-दिन गंभीर शक्ल लेती जा रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 7 महीनों में 200 से अधिक लोगों ने खुदकुशी की है जिनमें से 60 फीसदी जवान लड़कियां और महिलाएं हैं। विशेषज्ञ इसे कश्मीर के हालात का नतीजा बता रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार घाटी में आतंकवाद शुरू होने से पहले खुदकुशी का अनुपात 0 से 5 तक का था लेकिन आज यह अनुपात हद से ज़्यादा बढ़ गया है। 1990 से आज तक 17 हजार लोगों ने खुदकुशी की कोशिश की है और खुदकुशी करने वालों में सबसे ज़्यादा संख्या 17 से 24 साल तक के लड़के और लड़कियों की है। मुख्यधारा के राजनेता इसका ज़िम्मेदार पाकिस्तान को ठहरा रहे हैं क्योंकि उन्होंने घाटी में बन्दूक भेजकर हालात को बिगाड़ा और यहां की युवा पीढ़ी मानसिक तौर पर बीमार हो गई। अलगाववादी कहते हैं कि यह सब हो रहा है क्योंकि यहां मौजूद सुरक्षाबल युवा पीढ़ी पर ज़ुल्म करते हैं और इस कारण वो मानसिक तौर बीमार हो गाए हैं। वहीं धार्मिक विशेषज्ञ भी अपनी दलील देने से पीछे कहां रहते और उनका कहना है कि लोग धर्म से दूर होते जा रहे हैं और इस्लाम में खुदकुशी गुनाह है इसलिए जब धर्म का असर ही ख़त्म हो गया है तो यह लोग ऐसा काम करते हैं।

हर कोई अपनी दलील देकर खुद को सही ठहराता है और इस समस्या का कोई इलाज नहीं ढूंढता है। सब एक दुसरे को गलत ठहराने में अपनी सारी ताकत लगा रहे हैं। वक़्त गुज़रता जा रहा है, हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे हैं। खुदकुशी के आंकड़ों में लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है पर इस सबके बावजूद कोई भी इसकी गंभीरता को महसूस नहीं कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार कश्मीर के 60 फीसदी लोग किस्सी ना किसी तरह मानसिक मरीज़ बन चुके हैं खासकर युवा पीढ़ी में खुदकुशी और नशाखोरी करने की आदतें तेज़ी से बढ़ती जा रही हैं और अगर कोई ठोस कदम न उठाया गया तो हर दिन दर्जनों खुदकुशी के मामले सामने आना मामूल बन जाएगा। युवा पीढ़ी खुद को नशे के हवाले करती दिख रही है। शिक्षा से रुचि कम होती दिख रही है। अगर इसे रोका ना गया तो जुर्म की दुनिया में रिकॉर्ड तोड़ इज़ाफा देखने को मिल सकता है।

कश्मीर के मानसिक रोग के अस्पताल के आंकड़े तो होश उड़ाने वाले हैं जिनके अनुसार हर रोज़ इस अस्पताल में 200 से ज़्यादा मानसिक रोग से पीड़ित मरीज़ पहुंचते हैं यानी हर साल 1 लाख के करीब कश्मीर में मानसिक रोगी अस्पताल का रुख करते हैं। मानसिक रोग से पीड़ित रोगियों की संख्या में इस भारी बढ़ोतरी से समाज में बेशुमार मसलों ने नया जन्म लिया है और अगर यही हाल रहा तो कश्मीर में ज़िन्दगी सामान्य ज़्यादा देर तक नहीं रह पाएगी। समाज के ठेकेदार और घाटी के लीडर इस बढ़ती समस्या पर इजलास, सेमिनार और बैठकें तो करते हैं लेकिन इस जमावड़े में केवल इस बढ़ती समस्या पर अफ़सोस जाहिर किया जाता है और खान-पान के बाद सब अपना-अपना रास्ता नापते हैं। क्या वो समझते हैं कि इस सबसे उनकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो जाती है या इस मुसीबत का हल निकलेगा? यह मामला अब नसीहत के दौर से काफी आगे निकल गया है और इसके लिए ज़मीनी सतह पर कुछ करने की ज़रूरत है क्योंकि यह पूरी कौम के भविष्य का सवाल है जो तबाही की और जा रहा है।

इसलिए इस मामले को देखने के लिए रिवायती तरीके से देखने और समझने की बड़ी ज़रूरत है। इसे दूरंदेशी और ठोस इरादों से समझा जाए और जज़्बा चाहिए जो वाकई ही कौम को डूबने से बचाने का हो। मुख्यधारा का हो या अलगावादी या धार्मिक विशेषज्ञ हो, कोई भी खुले मन से अपने फायदे को परे छोड़कर सामने आना नहीं चाहता। सही मायनों में इस अंधेरे के तूफ़ान को चीरकर इस कौम के हर ज़िम्मेदार आदमी को ही खुद चिराग रोशन करना होगा...

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