हर माता-पिता अपने बच्चे के बेहतर कल के लिए उसे ठीक से शिक्षित करना चाहते हैं। हर कोई अपने बच्चे को अव्वल देखना चाहता है। मन में इन लक्ष्यों के साथ माता-पिता अपने बच्चों को प्रतियोगिताओं में बचपन से ही डाल देते हैं जहां विफलता बर्दाश्त नहीं होती और अंत में यह तनाव का एक प्रमुख कारण बन जाती है। स्कूलों में बेहतर परिणाम के लिए बच्चों पर और दबाव डाला जाता है। बच्चों के आराम को दांव पर लगाकर अच्छे परिणाम और रिकॉर्ड के लिए ऐसा हो रहा है। अंत में यह सब आज स्कूल जाने वाले बच्चों में मानसिक तनाव को जन्म देता है।
भारी स्कूल बैग बच्चों के लिए शारीरिक बोझ बन चुके हैं। शासन द्वारा एक बच्चा केवल उसके शरीर के वजन के 10 से 15 फीसदी बोझ ही ले सकता है लेकिन बच्चे हर दिन स्कूल बैग के रूप में अधिक से अधिक बोझ झेल रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अगर एक बच्चा नियमित रूप से ऐसे बोझ सहन करने के लिए मजबूर होता है तो उसे पीठ दर्द, सिर दर्द जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। बेहतर प्रदर्शन के लिए बच्चों पर लगातार बढ़ते दबाव के कारण हम इस स्थिति में आ चुके हैं। जहां छात्र अब आत्महत्या करने तक पहुंच गए हैं क्योंकि वे अपने माता-पिता की अनुचित उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाते हैं।
हमें गंभीरता से इन सबका समाधान सोचना होगा। असल में दोष हमारे शिक्षा तंत्र में है जिसके कारण छात्रों में तनाव और मानसिक दबाव बढ़ता जा रहा है और छात्रों के बीच निराशा पैदा होने लगती है। हमारे परीक्षा तंत्र का ही मामला लें तो ये छात्रों के बीच खौफ को जन्म देता है। कम नम्बर आने के डर से वो असल से भी दूर हो जाते हैं और यह सब प्राइमरी ग्रेड से ही देखने को मिलता है। कोशिश रहती है कि बच्चा सबसे आगे हो।
जम्मू-कश्मीर में प्राइवेट स्कूल भी इस दौड़ में लगे हैं और हर स्कूल ने अपने टीचर को यह आदेश दिया हुआ है। किसी भी तरह स्कूल के बच्चे बाकी स्कूलों से अच्छे हों और बेशक वे कामयाब भी होते हैं लेकिन बच्चों की दिमागी हालत को बिगाड़ कर। संदेश साफ है। नंबर वन रहना ज़रूरी है वो भी अपनी मर्ज़ी के विपरीत। इस रवैये से बच्चे एक ही बात समझ पाते हैं कि केवल अंक ही ज़रूरी हैं और कुछ नहीं।
यहां तक कि हमारे कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में भी टीचर यह जानने की कोशिश नहीं करते हैं कि छात्र की क्षमता क्या है, किसमें वो बेहतर कर सकता है। पिछली परीक्षाओं में छात्र के अंक से उसे जाना जाता है। माता-पिता भी अपने बच्चों को बिना समझे उन्हें टॉप पर पहुंचना चाहते हैं। बजाय इसके कि किस क्षेत्र में रुचि है ये जानें। इस तरह का रवैया छात्र के आत्मविश्वास को नष्ट कर देता है। अगर वो अच्छे अंक न लाए तो हमारा शिक्षा तंत्र छात्र की क्षमता को नज़रअंदाज़ कर देता है। यह रवैया बदलने की जरूरत है। शिक्षा विशेषज्ञों, शिक्षकों और माता-पिता के इस रवैये में बदलाव की जरूरत है। माता-पिता को भी अपने बच्चों को एक इंजीनियर या डॉक्टर बनाने आईएएस ऑफिसर बनाने के इस भ्रम से बाहर आना होगा। ज़रूरी है अपने बच्चे की रुचि को जानने की। उसे किसमें दिलचस्पी है। तब जाकर हम एक बेहतर समाज की बुनियाद को मज़बूत कर सकते हैं।














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