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रवींद्र आंबेकर
Tuesday , April 14, 2009 at 18 : 07

जागते रहो....


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बढ़ती गर्मी के साथ चुनावी माहौल भी गर्मा रहा है। शिवसेना-भाजपा अपना पूरा जोर लगा रही हैं। इस गठबंधन के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं अपनी इज्जत बचाना। फिलहाल बीजेपी अंदरूनी कलह से जूझ रही हैं। पार्टी नेताओं में घमासान मचा हुआ है। संघ से जुड़े हुए नेताओं का पार्टी में वजन बढ़ गया है वहीं गोपीनाथ मुंडे जैसे जनाधार वाले नेता को सीधे-सीधे साइडलाइन किया गया। महाराष्ट्र में बीजेपी की नींव रखने वाले महाजन परिवार की वारिस पूनम महाजन को दरकिनार किया गया। जो मुंडे-महाजन परिवार आज तक दूसरों के टिकट तय करता था, उसे एक टिकट के लिए अपनी इज्जत दांव पर लगानी पड़ी।

गोपीनाथ मुंडे तो पहले से ही नाराज हैं, ऐसे स्टार प्रचारक को बाजू में रखकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर प्रचार का जिम्मा सौंपा गया। मोदी का महाराष्ट्र में घूमना कितना खतरनाक साबित हो सकता हैं शाय़द इसका अंदाजा बीजेपी को नहीं है। ये वो राज्य है जहां मोदीत्व कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा। अगर कोई शक है तो पूछिए शिवसेना नेता मनोहर जोशी से। जोशी ने सार्वजनिक तौर पर ये बात कही है कि मोदी की सभा के वजह से उन्हें हारना पडा।

मोदी स्टार प्रचारक जरूर हैं वो बात भी विकास की करते हैं लेकिन गुजरात दंगे उनके साथ परछाईं की तरह चिपक गए हैं। उस एपिसोड को बाजू में रखकर कोई मोदी को देखना नहीं चाहता। कम से कम महाराष्ट्र में तो ये स्थिति है। बीजेपी के पास दूसरे जो नेता हैं वो खुद विधानसभा का चुनाव तक जीतने की ताकत नहीं रखते हैं। नितिन गडकरी और विनोद तावड़े बीजेपी के अपर हाउस वाली छवि का प्रतिनिधित्व करते हैं।

वहीं शिवसेना के पास अभी भी इक्का बाकी हैं। बुढ़ा हुआ तो क्या शेर की दहाड़ आज भी कायम है। लेकिन पहले डर था आज लोग इस शेर के पास सहानुभूति से देखते हैं। बालासाहब ठाकरे की बढती उम्र, बिगड़ी हुई तबीयत उन्हें प्रचार के मैदान में उतारने से रोक रही हैं, लेकिन वो विडियो कॉन्फ्रेंन्सिंग के माध्यम से लोगों के बीच जाएंगे।

एक करिश्माई नेता का ये हाल देखकर उनके कार्यकर्ताओं में एक सहानुभूति का माहौल बन रहा है। शिवसेना को इससे ज्यादा कुछ चाहिए भी नहीं। क्योंकि उनका वोटर कमिटेड वोटर है। शिवसेना के पास कोई स्टार प्रचारक नहीं है। अकेले उद्धव ठाकरे बचे हैं। उनके तेवर भी आजकल बदले बदले से हैं। उद्धव ने पार्टी में अपना स्थान बना लिया हैं। पकड़ कायम की है। मुंबई महानगरपालिका चुनाव और उसके बाद हुए स्थानीय निकाय चुनावों में उन्होंने दिखा दिया है कि पार्टी खत्म नहीं होगी।

उद्धव के पास युवा नेताओं की प्रभावशाली फौज नहीं हैं। बालासाहब के साथी रहे नेताओं की पार्टी में आज भी जगह कायम है। मनोहर जोशी हों या फिर बाकी नेता पिछली पीढ़ी की आवाज हैं। उद्धव बिना किसी स्टार प्रचारक के चुनाव के मैदान में हैं, अपने कमिटेड वोटर और गांव-गाव तक पहुचें कैडर (शाखा) के बलबूते पर।

कांग्रेस और राष्ट्रवादी की स्थिति इसके विपरीत है। राष्ट्रवादी के पास सबसे ज्यादा युवा नेताओं की फौज है। एक पवार को छोड़ दें तो पार्टी में बुजुर्ग नेता एकाध ही होगा। कांग्रेस में नेताओं की भरमार है, लेकिन कौन क्या कर रहा है किसे पता। हमेशा की तरह इस बार भी इस पार्टी का काम भगवान भरोसे चल रहा हैं। नारायण राणे के बेटे निलेश राणे को टिकट मिला है। उनका ज्यादा ध्यान फिलहाल वहीं लगा हुआ है।

विलासराव देशमुख पार्टी के एकलौते ऐसे नेता हैं जिनकी रैलियों के लिए सबसे ज्यादा मांग है। विलासराव फिलहाल कांग्रेस कार्यकर्ताओं के दिल की बात जो बोलते हुए घूम रहे हैं। विलासराव एनसीपी के साथ समझौते से नाराज हैं लेकिन विलासराव के भाषणों से दुखी एनसीपी कांग्रेस का पत्ता साफ करने के हिसाब से ही काम कर रही है।

वहीं राज ठाकरे अपनी अलग दुकान डाल बैठे हैं। इस बार उनका किसी से घोषित रूप से समझौता नहीं हैं, लेकिन अघोषित रूप से वो शिवसेना को नुकसान पहुंचाने की सुपारी लेकर काम कर रहे हैं। वो जीतेंगे तो नहीं पर दुसरों के जीत या हार के समीकरणों में भूमिका जरूर अदा करेंगें। मुंबई, नासिक, पुणे और विदर्भ के कुछ इलाकों में राज अपनी कैंची से कुछ लोगों को घर का रास्ता दिखा सकते हैं।

राज के बाद सबसे खतरनाक खिलाडी मैदान में है बीएसपी। नीले हाथी ने विदर्भ में पिछले चुनाव में कांग्रेस के नाक में दम कर दिया था। विधानसभा चुनावों में वो ही प्रदर्शन कायम नहीं रख पाए। इस बार उनके हाथ अच्छे उम्मीदवार तो नहीं मिले हैं, लेकिन स्थानीय प्रभाव तो बना रहेगा ही।

कुल मिलाकर एनसीपी-कांग्रेस, शिवसेना और बीजेपी इन प्रमुख चार पार्टियों के यानी दो गठबंधनों के बीच की ये लड़ाई है। शिवसेना और एनसीपी का अंदरूनी समझौता बताया जाता हैं। दोनों ही पार्टीयां 22-22 सीटें लड़ रही हैं और 22 में से दोनों ही पार्टियां 13 सीटों पर एक दूसरों के खिलाफ लड़ रही हैं।

वहीं बीजेपी शिवसेना पर पुरा भरोसा रखने के लिए तैयार नहीं हैं और यहां कांग्रेस को एनसीपी के चरित्र पर शक हैं। दोनों ही शादियां शक के बुनियाद पर कायम हैं। दोनों गठबंधन बाहरी लोगों से भले ही लड़ रहे हों, लेकिन असली लडाई घर के अंदर ही चल रही है।

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रवींद्र आंबेकर के बारे में कुछ और

रवींद्र आंबेकर पिछले 10 सालों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कार्यरत हैं। इलेक्ट्रॉनिक मिडिया में आने से पहले रवींद्र ने फ्री प्रेस जर्नल के नवशक्ति अखबार, लोकमत और वृत्तमानस अखबार में दो साल तक काम किया। फिलहाल आईबीएन7 के मुंबई ब्यूरो में सीनियर एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं। इसके साथ ही रवींद्र मुंबई टीवी जर्नालिस्ट असोशिएशन के लगातार दो साल तक अध्यक्ष भी रहे हैं।
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