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रवींद्र आंबेकर
Monday , January 02, 2012 at 13 : 09

मुंबई में फ्लॉप क्यों हुए अन्ना...?


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अन्ना की बिगड़ती तबियत ने सभी को चिंता में डाल दिया है। देश की तबियत की भी अब चिंता होने लगी हैं। काफी बुरा लगा जब मुंबई में अन्ना के अनशन में लोगों की भीड़ नहीं हुई और कम भीड़ और बिगड़ती तबियत के कारण अन्ना को अनशन बीच में ही तोड़ना पड़ा। अनशन तोड़ने के पीछे कारण और भी हैं। टीम अन्ना की खराब रणनीति भी पहली बार उन्हें भारी पड़ी।

अन्ना की मांग और जनता के बीच आक्रोश को देखते हुए सरकार को संसद का सत्र तीन दिन तक बढ़ाना पड़ा। इसे अपनी जीत मानने की बजाए टीम अन्ना ने अपना हमला जारी रखने का फैसला लिया। आगे की लड़ाई लड़ने के लिए ताकत बटोरने और रणनीति बनाने की बजाए टीम अन्ना ने खाली वार करने का फैसला लिया। अन्ना पहले ही घोषित कर चुके थे कि वो पार्लियामेंट सेशन में चल रहे कामकाज को खुद देखेंगे और बाद में 30 तारीख से जेल भरो करेंगे। 27 तारीख से होने वाला अनशन उन्होंने स्थगित कर दिया था। लेकिन ये बात टीम अन्ना के हनुमान कहे जाने वाले अरविंद केजरीवाल के गले नहीं उतरी। जनसमर्थन एक नशे की तरह होता है, आदत लग गई तो लग गई। जब तक नशा नहीं उतरता तब तक सच नहीं दिखता। पहले से ही टीम अन्ना सरकार को चोर कहती आ रही थी, इसलिए सरकार धोखा ही देगी ये मानकर वो चल रहे थे। धोखा देने से पहले आंदोलन करना और बाद में करना इसमें काफी फर्क था।

आंदोलन के सर्वेसर्वा अन्ना ही हैं ऐसा कहने वाली टीम अन्ना के 'हनुमान' अरविंद केजरीवाल ने पुणे के एयरपोर्ट पर उतरते ही ऐलान कर दिया की अनशन टला नहीं हैं। पता नहीं ये बात अन्ना को मालूम थी या नहीं या केजरीवाल अपना एजेंडा सेट करके आए थे, रालेगन सिद्धि पहुंचते ही अरविंद केजरीवाल अन्ना से मिले और अन्ना ने भी 27 तारीख से तीन दिन के अनशन पर अपनी मुहर लगा दी। भले ही आप इसे मजाक समझें लेकिन मीडिया और अन्ना के कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले फॉलोअर्स को ये तारीखें पसंद नहीं आई थीं। बड़ी मुश्किल से साल में एक बार पूरे परिवार के साथ छुट्टी पर जाने का मौका मिलता हैं, वो भी अब आंदोलन छीनने जा रहा था। देश के लिए जान देने की बात करने वाले लोग छुट्टियों का त्याग करने के लिए तैयार होंगे कि नहीं ये भी एक बड़ा सवाल था। तीन दिन के अनशन के बाद नया साल जेल भरो से शुरू करने का आइडिया भी थोड़ा सा अटपटा था। केजरीवाल अपने ही कार्यकर्ताओं से फीडबैक लेते तो अच्छा होता।

छुट्टियों की बात छोड़ दीजिए। इतने सीरियस मुद्दे पर ये बात थोड़ीसी मजाकिया किस्म की लगेगी। कारण कई औऱ भी हैं। एक तरफ संसद लोकपाल पर बहस करने वाली थी। ऐसे में टीम अन्ना को चाहिए था कि वो गैलरी में बैठें और संसद की कार्यवाही देखें। उसपर अपना दबाव बनाए रखें, लेकिन टीम अन्ना ने दिल्ली से दूर मुंबई में अनशन का फैसला लिया। जब कुछ गलत होने लगता है तो फिर सब कुछ गलत होता है। रामलीला मैदान की सफलता के बाद भीड़ को लेकर कॉन्फिडन्ट टीम अन्ना ने मुंबई में भी भव्य शो करने का फैसला लिया। अन्ना अब उस हैसियत पर पहुंच गए हैं कि वो जहा खड़े हो जाएं लाइन वहीं से शुरू हो जाए, लेकिन टीम अन्ना को इस अनशन को इवेंट करना था। उनके लिए आजादी की जंग के इतिहास से जुड़ा आजाद मैदान ठीक नहीं था। ये ग्राउंड छोटा था, उसके बाद मुंबई पुलिस ने सुरक्षा इंतजामों का वास्ता देकर एमएमआरडीए ग्राउंड का सुझाव दिया। टीम अन्ना इस ग्राउंड को देखकर खुश हुई। लेकिन उसका किराया देखकर मूवमेंट फिर जाग उठा...इंडिया अगेन्स्ट करप्शन के कार्यकर्ताओं ने बॉम्बे हाईकोर्ट में ग्राउंड का किराया कम करने के लिए गुहार लगाई। दुसरा गलत कदम...। बॉम्बे हाई कोर्ट ने टीम अन्ना को लताड़ दिया। पूरा उबाल निकल गया। आम आदमी और मीडिया के कुछ सैक्शन को लग रहा था की टीम अन्ना का कुछ ज्यादा ही हो रहा है। हाई कोर्ट की फटकार के बाद लोग खुलकर बोलने लगे। अच्छी बात तो ये है कि अन्ना ने इन संकेतों को तुरंत पकड़ लिया और कहा की कोर्ट में जाना गलती थी, लेकिन गलती को दुरुस्त करने का प्रयास नहीं किया। अन्ना ने रालेगन में साफ कर दिया की उन्हें रियायत की जरूरत नहीं, आंदोलन के पास पैसा है कि वो एमएमआरडीए ग्राउंड को किराए पर ले सकते हैं। अन्ना एक फकीर का जीवन जीते हैं, उनके मुंह से पैसों की ये भाषा सुनकर अजीब लगा। मैंने अपने छोटे से करिअर में कई आंदोलन देखे। उनसे जुड़ने की कोशिश भी की, लेकिन ऐसी भाषा मैंने किसी के मुंह से नहीं सुनी।

अन्ना की भाषा सुनने के बाद मुझे महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री जिनका विकेट अन्ना ने लिया था, उन सुरेश दादा जैन की याद आई। अन्ना के खिलाफ सुरेश दादा जैन ने एक फाइव स्टार अनशन किया था। आजाद मैदान में ही। ठीक अन्ना के पंडाल के सामने। एसी पंडाल, आने जाने वाले लोगों के लिए तीन वक्त का खाना, कोल्ड्रिंक का बंदोबस्त। जैन भी कुछ ऐसी ही मगरूरी वाली भाषा बोलते थे, कहते थे मेरा पेट भरा है, मुझे पैसों की कमी नहीं है।

अन्ना को भूख की आदत हैं और उन्हें पैसों की भी जरूरत नहीं हैं। आप उस कद तक पहुंच गए हो की आपको एक आवाज पर लोग करोड़ों रुपए लाकर देंगे लेकिन क्या आंदोलन ऐसे चलेगा? आंदोलन के लिए पैसे देने वालों की नहीं वक्त और जीवन देने वालों की जरूरत होती है।

आजतक मैंने एमएमआरडीए ग्राउंड पर पैसे भरकर अनशन करने वाले लोग नहीं देखे। भीड़ इकट्ठा करना आपका मकसद कब से बन गया। क्या अन्ना अकेले अनशन पर बैठ जाते तो उन्हें देखने या मिलने आने वाले लोगों को रोकने की हिम्मत सरकार करती? चाहे वो रालेगन सिद्धि में बैठे, रामलीला पर, जंतर-मंतर या फिर आजाद मैदान..। एमएमआरडीए ग्राउंड पर आईएसी के कार्यकर्ताओं से अनशन के ठीक एक दिन पहले मीडिया का भारी झगड़ा हुआ। मीडिया अरेंजमेंट देखनेवालों ने कहा कि आपको केवल निर्धारित जगह पर ही अपना तामझाम खड़ा करना होगा क्योंकि भारी संख्या में लोग आएंगे तो आप लोगों को दिक्कत होगी। मैनेज करना मुश्किल हो जाएगा। दूसरे दिन जहां मन चाहे वहां मीडिया कवरेज के लिए खड़ी थी..लोग भटके ही नहीं।

भीड़ का क्या, भीड़ तो आप जहां बैठे वहीं चली आती। क्या रालेगन में रोजाना 300-400 लोग अन्ना को देखने नहीं पहुंचते? क्या अन्ना उन्हें पैसे देते हैं...नहीं! वो तो बस देश के दूसरे गांधी के रूप में उस व्यक्ति को देखने आते हैं जिसने इस देश में फिर से देशप्रेम का अलख जगाया है।

मैं इस आंदोलन को फेल नहीं मानता। लेकिन इस आंदोलन ने कुछ गलतियां की हैं ऐसा मुझे लगता हैं। जनता का समर्थन कब नशा बन जाए कोई कह नहीं सकता। हम नेताओं को गालियां देते हैं, लेकिन उन्हें भी सत्ता का नशा इसलिए चढ़ता है क्योंकि जनता उनके साथ हैं। आप शरद पवार को लाख गालियां दो लेकिन देश के सबसे ज्यादा बहुमत पाकर जीतने वाले नेताओं में से वो एक हैं। आप लालू, मुलायम या फिर सोनिया गांधी को भी भला बुरा कह सकते हो, लेकिन क्या ये लोग अपनी दबंगई से संसद में पहुंचे हैं? क्या जनता उन्हें वोट नहीं करती है? अगर उन्हें भी इस बात का गुमान हो गया तो? आपकी रैली में 50-60 हजार लोग आए तो आप जनता की आवाज हो गए, लेकिन जिन्हें 1-2 लाख वोटों की केवल बढ़त मिलती हैं वो क्या हैं फिर? हमें इस देश के संविधान के तहत चुने हुए जनप्रतिनिधियों पर अंकुश रखना हैं। हम मालिक हैं, ये बात भी सही है, हम अपने अधिकारों के प्रति देर से जागे ये भी बात सही है। हमें जगाने में अन्ना की भूमिका को कोई भी नहीं नकार सकता, लेकिन आप समानान्तर संसद लगाकर नहीं बैठ सकते। अगर देश की संसद पर हम अपना अंकुश चाहते हैं तो हमें देश की जनता के पास पहुंचना पड़ेगा। एसएमएस, ई मेल्स, सोशल नेटवर्किंग साइट्स का उपयोग कर आप इंडिया का समर्थन जुटा सकते हैं। ये इंडिया लाखों की संख्या में जेल भरो के लिए खुद को एनरोल भी कर सकता है लेकिन सड़क पर उतरने वाला भारत भी आपको जोड़ना होगा। एक दिन मोबाइल का नेटवर्क जाम हो गया तो वर्च्युअल वर्ल्ड में जीने वालों को लगा की शायद आज देश में कुछ नहीं हो रहा हैं। फेसबुक, ट्विटर बंद हो गया तो आधी जनता खुद को अपाहिज समझने लगी। आईएसी कार्यकर्ताओं का मन लगना बंद हो गया।

मुंबई में आंदोलन होकर भी मुंबई इस आंदोलन से दूर रही। मोर्चा, धरना-प्रदर्शनों औऱ आंदोलनों का एक समृद्ध इतिहास इस शहर का है। अगर यहां मिल वर्कर सड़क पर उतरता है तो सारी राजनीतिक पार्टियां उनके समर्थन में सड़क पर उतरती हैं। अगर अंबेडकर स्मारक का मुद्दा उठता हैं तो सभी पार्टियां, सभी समाजसेवी संस्थाएं सड़क पर होती हैं। यहां मानवाधिकार से लेकर सरकार विरोधी आंदोलनों की अपनी एक ताकत है। डिब्बेवालों से लेकर मिल वर्कर, ट्रेड युनियन, आम जनता...इतना जागृत समाज यहां पर होते हुए भी अन्ना के अनशन में लोग नहीं पहुंचे। क्या टीम अन्ना इस बात पर विचार नहीं करेगी। अन्ना के अनशन के पहले दिन स्टेज पर से लोकपाल की बजाए मुंबई की झुग्गी बस्तियों पर भाषण हो रहे थे, क्यों..? क्योंकि मेधा पाटकर की वजह से मुंबई के गोलीबार नगर में जिनकी झुग्गियां टूटी हैं वो झुग्गीबस्तीवाले वहां पर आए थे। लेकिन बाकी के संगठन गायब रहे। दूसरे दिन मेधाताई भी स्टेज पर नहीं थीं और न ही गोलीबार नगर के लोग मैदान में। इस आंदोलन को राजनीतिक समर्थन नहीं मिलेगा ये पहले ही साफ हो चुका था। अन्ना के शरद पवार के ऊपर दिए बयान के बाद एनसीपी ने अन्ना से कन्नी काट ली थी, शरद पवार के करीबी दोस्त शिवसेनाप्रमुख बाल ठाकरे ने भी अन्ना का खुलेआम विरोध कर दिया। महाराष्ट्र में दलित मूवमेंट काफी प्रभावी हैं। अन्ना संविधान में संशोधन चाहते हैं औऱ टीम अन्ना के सदस्यों द्वारा संविधान के बारे में दिए गए कुछ कथित बयानों की वजह से दलित समुदाय ने तो अन्ना से दूर रहने का फैसला लिया। अन्ना को तो काले झंडे भी दिखाए गए। वहां संसद में भ्रष्टाचार के मुद्दे को आरक्षण के पेच में फंसाकर लालू ने सरकार का बोझ हल्का कर दिया। मुंबई में आने के बाद केजरीवाल मुस्लिम नेताओं से मिलने भागे। पिछले अनशन के वक्त दलित और मुस्लिम बच्चों के हाथों अनशन छुड़वाने का फंडा हो या फिर रामलीला मैदान में स्टेज पर रोजा-इफ्तारी औऱ नमाज ने इस लडाई को धार्मिक रंग भी दे दिया। आरएसएस के साथी ना होने की बात जताने के लिए पूरा मूवमेंट जो तोड़ कोशिश कर रहा था। जो बात राजनीतिक पार्टियां करती हैं वो तमाम काम इंडिया अगेन्स्ट करप्शन के नेता कर रहे थे। आपने भले ही तिरंगा हाथ में लिया लेकिन धर्म के प्रभाव से नहीं बच पाए।

अन्ना की तबियत अनशन के पहले ही बिगड़ गई थी। फिर भी अनशन के मुद्दे पर कायम रहने का फैसला आत्मघाती था। टीम अन्ना को थोड़ा मानवीय दृष्टिकोण भी अपनाना होगा। अन्ना के देश के लिए जान देने की भावना पर कोई सवाल नहीं खड़ा कर सकता, लेकिन कभी कभी आंदोलनों में दो कदम पीछे हटने में भी समझदारी होती है। इसे हार के तौर पर नहीं देखना चाहिए। खराब तबियत के बावजूद अन्ना का रालेगन से आलंदी और आलंदी से मुंबई की 6 घंटे की थका देने वाली यात्रा..उसके तुरंत बाद पश्चिमी उपनगर में रहने वाले कैण्डलछाप लोगों की मांग पर सांताक्रूज जुहू से कड़ी धूप में करीब तीन घंटे लंबी रैली..किसी बुजुर्ग आदमी पर आप कितना जुल्म करोगे? क्या आप तपतपाते शरीर से ऐसी यात्रा कर सकते हैं? अगर नहीं तो फिर अन्ना से ये अपेक्षा क्यों..? क्या अन्ना कोई खिलौना हैं जिसे आप अपनी मर्जी के हिसाब से चाबी देकर चलाएंगे...? अन्ना के गांववालों से एमएमआरडीए ग्राउंड पर मुलाकात हुई। पता चला उन्हें अन्ना से मिलने की इजाजत नहीं थी। क्यों भाई...? रालेगन के लोग अन्ना से मिलकर क्या आपकी रणनीति बिगाड़ेंगे ऐसी आपको आशंका है। फिर अनुपम खेर औऱ सेलिब्रिटी टाइप लोग किस हैसियत से अन्ना से मिलते हैं, उनका क्या योगदान है। नाना पाटेकर जैसे अन्ना के पुराने साथी इस बार एमएमआरडीए ग्राउंड के आसपास भी नहीं भटके, इस बात की समीक्षा भी करनी होगी। महाराष्ट्र की जनआंदोलनों की पूरी मूवमेंट इस आंदोलन से नदारद रही। दिल्ली में आए हुए कई लोग इस आंदोलन में गायब रहे। अन्ना और भ्रष्टाचार के खिलाफ का आंदोलन किसी की प्रोप्रायटरी है क्या। आप चाहोगे वैसे ही होगा। टीम अन्ना अगर आम जनता के प्रति ऐसी भावना रखती है तो फिर नेताओं को गाली देने का आपको नैतिक अधिकार कहां बचता है। अन्ना आम जनता की आवाज हैं...लोकपाल के बारे में आम जनता भले ही कुछ कम जानती हो लेकिन रोज की जिंदगी में वो भ्रष्टाचार से पीड़ित है और यही पीड़ित जनता इस आंदोलन की ताकत है। आलीशान स्टेज बांधने के लिए पैसा देने वालों के गाने आप आम जनता को स्टेज पर से सुना सकते हैं। वो अन्ना से मिल सकते हैं फिर अन्ना को आपसे भी पहले से जानने वाले लोगों को स्टेज पर आने से क्यों रोका जाता हैं। क्या इस जनता के पास पैसा नहीं है इसलिए ये आपकी स्टेज पर नहीं आ सकती...?

मुंबई में आंदोलन के साथ जो लोग थे उनमें हाई-प्रोफाइल लोगों को ज्यादा तवज्जो थी। महंगी कारों में कार्यकर्ता इंतजाम देखने आ रहे थे। पैदल चलनेवालों से कनेक्शन टूटा हुआ दिखा। मुंबई के इतिहास की नब्ज नहीं समझते ऐसा नहीं हैं। तमाम बड़े आंदोलनों को मुंबई या महाराष्ट्र के मीडिया, पत्रकारों ने दिशा दी है, यहां का इतिहास ये बताता हैं कि कुबेर की इस नगरी में फकीर के पीछे आनेवाले लोग कम नहीं हैं। लेकिन जब फकीर के झोले में पैसों का बोझ बढ़ जाए तो लोगों का विश्वास उठना शुरू हो जाता हैं। अन्ना को अब पैसों की मदद देनेवालों की नहीं समय देनेवाले कार्यकर्ताओं की खोज करनी चाहिए।

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रवींद्र आंबेकर के बारे में कुछ और

रवींद्र आंबेकर पिछले 10 सालों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कार्यरत हैं। इलेक्ट्रॉनिक मिडिया में आने से पहले रवींद्र ने फ्री प्रेस जर्नल के नवशक्ति अखबार, लोकमत और वृत्तमानस अखबार में दो साल तक काम किया। फिलहाल आईबीएन7 के मुंबई ब्यूरो में सीनियर एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं। इसके साथ ही रवींद्र मुंबई टीवी जर्नालिस्ट असोशिएशन के लगातार दो साल तक अध्यक्ष भी रहे हैं।
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