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पवन शर्मा
Thursday , October 01, 2009 at 14 : 28

सियासत की भेंट चढ़ा आईआईएएम..


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जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रवाद की राजनीति इस कदर हावी हो गई है कि जम्मू और कश्मीर के नेता अपनी-अपनी रोटियां सेंकने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। बात चाहे अमरनाथ भूमि मुद्दे की हो या फिर सैंट्रल यूनिवर्सिटी की। हर पार्टी अपने वोट बैंक को लेकर राजनीति की विसात बिछाने में लग जाती है।

अभी एक साल पहले अमरनाथ की भूमि का मुद्दा जम्मू और कश्मीर में एक ज्वलंत मुद्दा बन गया था। दोनों ही जगहों के नेताओं ने अपने-अपने तरीके से लोगों को खूब भरमाया लेकिन विधानसभा चुनावों के बाद सब नेता भूल गए और तीन महीने चले आंदोलन के जख्म पीछे छोड़ गए।

जम्मू और कश्मीर में आंदोलन के दौरान कई जानें गईं। कई युवा पुलिस की गोली का शिकार बने और कईयों ने जज्बात में आकर आत्महत्या कर ली लेकिन आज इनके परिवारों को कोई नहीं पूछ रहा है।

अब सैंट्रल यूनिवर्सिटी का मुद्दा स्टूडेंट्स के लिए कक्षाओं के बहिष्कार का एक अहम शस्त्र बन गया था लेकिन मानव संसाधन मंत्रालय ने जब यह घौषणा की जम्मू और कश्मीर दोनों प्रातों को एक सैंट्रल यूनिवर्सिटी मिलेगी लेकिन राज्य के हिस्से में आईआईएएम नहीं बनेगा।

हर पार्टी ने इस घौषणा के बाद मिठाइयां बांटीं। वह चाहे कांग्रेस हो, नेशनल कॉन्फ्रेंस हो या फिर पीडीपी के साथ-साथ बीजेपी के समर्थन वाली यूनिवर्सिटी आंदोलन समिति लेकिन हर कोई यह भूल गया कि राज्य में पहले से कई-कई यूनिवर्सिटी हैं परंतु आईआईएएम नहीं है जिसकी जरूरत इस समय राज्य को थी क्योंकि यहां के स्टूडेंट्स को मैनेजमेंट की डिग्री के लिए राज्य के बाहर मोटी रकम खर्च कर जाना पड़ता है।

मुद्दा यह था कि 6 महीने पहले प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने जम्मू-कश्मीर के लिए सैंट्रल यूनिवर्सिटी देने की घोषणा की थी और यह यूनिवर्सिटी जम्मू में बनाने की बात कही थी लेकिन किन्हीं कारणों के चलते इस यूनिवर्सिटी को कश्मीर में खोलने की कवायद शुरू हो गई।

दरअसल राज्य की राजधानी मूवएबल है क्योंकि 6 महीने यह राजधानी कश्मीर और 6 महीने जम्मू में रहती है तो जाहिर सी बात थी इस समय राजधानी कश्मीर में थी और यूनिवर्सिटी की प्रकिया कश्मीर से ही शुरू हो गई परंतु नेताओं को यह एक मुद्दा मिल गया और फिर शुरू हो गया राजनीति का खेल।

दो महीने से लगातर जम्मू में प्रदर्शन और धरने की प्रकिया शुरू हो गई। स्टूडेंट्स के कई गुट बन गए और बीजेपी जो पहले ही अमरनाथ मुद्दे को भुनाकर अपने 11 विधायक बनाने में सफल रही थी ने इसे भी भुनाने की योजना बना डाली और यूनिवर्सिटी आंदोलन समिति का गठन कर दिया गया फिर क्या था बीजेपी को आगे आते देख कांग्रेस के मंत्री और नेता परेशान हो गए। वह इसमें कूद गए कि कहीं वोटबैंक बीजेपी ही न ले जाए।

राज्य की सत्ताधारी दोनों पार्टियों कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने एक ही सुर में सैंट्रल यूनिवर्सिटी जम्मू में खुलवाने के वायदे करने शुरू कर दिए। दोनों ही पार्टियों के नेता प्रदर्शन और धरने पर बैठने लगे। वहीं पीडीपी जिसने अमरनाथ मुद्दे पर कश्मीर में काफी वोट बैंक पक्का किया था वह भी इसके समर्थन में आ गई।

नौबत यह भी आ गई कि यूनिवर्सिटी संघर्ष समिति के बैनर तले सभी पार्टियों के नेता इकट्ठे होने लगे और एक ही सुर में जम्मू में ही यूनिवर्सिटी खुलवाने की मांग करने लगे। आखिर वो दिन आ गया जब राज्य के मुख्यमंत्री ने भी इसमें साफ कह दिया की अगर जम्मू में यूनिवर्सिटी खुलेगी तो हम समर्थन देते हैं लेकिन कश्मीर में आईआईएएम खुलेगा लेकिन केन्द्र सरकार ने हालात को समझते हुए राज्य के दोनों हिस्सों को एक-एक सैंट्रल यूनिवर्सिटी दे दी लेकिन आईआईएएम को वापस ले लिया और यह कह दिया कि आईआईएएम पर लगने वाला पैसा अब यूनिवर्सिटी पर लगेगा।

यहां यह बताना गलत नहीं होगा कि जम्मू में इस समय 4 यूनिवर्सिटी हैं जिसमें माता वैष्णो देवी यूनिवर्सिटी, बाबा गुलाम शाह बडशाह यूनिवर्सिटी, शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी और जम्मू यूनिवर्सिटी शामिल है लेकिन यहां पर कोई भी मैनेजमेंट इस्टीट्यूट नहीं है और यही हाल कश्मीर में भी है। वहां पर यूनिवर्सिटी तो बहुत हैं लेकिन मैनेजमेंट इस्टीट्यूट नहीं है और इस समय राज्य को एक मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट की ही जरूरत थी न कि 2 सैंट्रल यूनिवर्सिटी की लेकिन नेताओं को क्या है उनको अपना वोट बैंक पक्का करना था सो वह कर लिया वह चाहे कश्मीर में हो या फिर जम्मू में लेकिन नुकसान किसका हुआ। इस बारे में नेताओं ने न कभी पहले सोचा था और न ही अब सोचने की जरूरत समझी है।

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