क्या किसी राज्य की पहचान धरने व प्रदर्शन होंगे? ऐसा शायद कहीं भी नहीं होगा लेकिन जब से जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस की गठबंधन सरकार बनी है तब से यहां पर हर रोज धरने व प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। इसकी वजह क्या है, आखिर क्यों हर रोज ऐसा हो रहा है। इसका जबाव वर्तमान सरकार नहीं दे पाई है।
अगर आंकड़ों पर गौर किया जाए तो इस समय 10 गैरसरकारी संगठन और राज्य सरकार के लगभग सभी विभागों की यूनियनें इन धरनों व प्रदर्शनों में शामिल हैं। शहर का कोई भी चौक ऐसा नहीं है जिस पर हर रोज पुतले न जलते हों। बेरोजगार इंजीनियर डिप्लोमा होल्डर, कृषि विभाग से निकाले गए कर्मचारी, होम गार्ड कर्माचारी, स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी और खासकर राज्य परिवहन निगम के कर्मचारी पिछले 4 महीने से लगाकर सड़कों पर उतर रहे हैं। आए दिन उन पर लाठीचार्ज होता है लेकिन इन सबकी सुनवाई अभी तक नहीं हो रही है।
जम्मू शहर में 9 नवंबर को सचिवालय लगेगा। अगर यूं कहा जाए कि अब सरकार का दरबार इस जम्मू शहर में लगने जा रहा है तो ठीक होगा। सभी कर्मचारी यूनियनें और सगठन अब इंतजार कर रहे हैं कि जम्मू सचिवालय लगते ही उसका घेराव किया जाए और सरकार तक अपनी मांगें पहुंचाई जाएं। कश्मीर से कई यूनियनों के कर्मचारी पैदल कूचकर जम्मू पहुंच चुके हैं।
जब से राज्य की बागडोर नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दल्ला ने संभाली है तब से यह धरने व प्रदर्शन तेज हुए हैं हालांकि इससे पहले गुलाम नबी आजाद और मुफ्ती मोहम्मद सईद भी गठबंधन में मुख्यमंत्री रह चुके हैं लेकिन उनके समय में कुल 24 कर्माचरी संगठनों का प्रदर्शन एक साथ हुआ था जिसमें से लगभग सभी को शांत किया गया था। हालांकि कुछ संगठनों ने लंबी हड़ताल की भी की थी। डोडा से आए विस्थापितों ने तो एक अपना अलग रिकार्ड बना दिया है। वह पिछले तीन साल से लगातर जम्मू डिविजनल कमिश्नर कार्यालय के बाहर टैंट लगाकर बैठे हैं। हर रोज कुछ लोग समय पर आकर बैठ जाते हैं और शाम होते ही चले जाते हैं।
हाल ही में डॉक्टरों ने हड़ताल की। सरकार और डाक्टरों की लड़ाई की बीच आम लोग पिस गए। कई लोगों की जान चली गई। कई लोग अपने बीमार सगे सबंधियों को लेकर दिल्ली व पंजाब के अस्पतालों में इलाज के लिए चले गए लेकिन कई दिन बीतने के बाद सरकार और डॉक्टरों का समझौता हुआ और हड़ताल खत्म लेकिन जिस जनता ने अपने वोटों से नई सरकार का गठन करवाया उसके बारे में किसी ने नहीं सोचा। वह चक्की के बीच पिसते चले गए।
अब राज्य परिवहन निगम जो पहले से ही करोड़ों रुपए घाटे में चल रहा है। उसके कर्मचारी पिछले कई महीनों से हड़ताल पर हैं। सभी बसें खड़ी हैं। किसी भी रूट पर राज्य की सरकारी बस नहीं चल रही है। हर रोज लाखों रुपए का घाटा निगम को हो रहा है लेकिन वेतन विसंगतियों को लेकर कर्मचारी हड़ताल पर हैं। सरकार का रैवया इनके प्रति क्या है इसका अदांजा इसी से लगाया जा सकता है कि 600 से ज्यादा कर्मचारी जोकि कश्मीर के रहने वाले हैं वह पैदल चलकर जम्मू में सरकार के खिलाफ आंदोलन करने के लिए पहुंच चुके हैं। सारी बैठकें बेनतीजा खत्म हो गई हैं। अब भी सरकार झुकने को तैयार नहीं है। इनकी मांगें नहीं मानी जा रही हैं। निगम का घाटा दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।
राज्य सरकार के कई विभागों की यूनियनों को अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिला हुआ है। सियासत ने सब को बांटकर रख दिया है। अगर कोई प्रदर्शन और हड़ताल अलग से खड़ा हो जाता है तो राजनीतिक दबाव भी उसे मसल कर रख देता है। लोग परेशान होते जा रहे हैं लेकिन सरकार के कान पर जूं तक रैंगती नहीं दिख रही है।
क्या सरकार का फर्ज नहीं बनता कि आंदोलनकारी कर्मियों से एक मंच पर लाकर बात की जाए। इनका कोई हल निकालने के प्रयास किए जाएं। राज्य के मुख्यमंत्री को दो-दो सलाहकार हैं, क्या किसी ने भी इन लोगों से मिलने का प्रयास किया है, फिलहाल ऐसा नहीं लग रहा है। क्या यह शहर इसी तरह धरने व प्रदर्शनों को सहता रहेगा।














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