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पवन शर्मा
Thursday , April 01, 2010 at 11 : 25

जम्मू-कश्मीर का खजाना खाली!


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केन्द्र सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों के डीए को बढा़कर 8 फीसदी कर एक तरफ कर्मचारियों को खुश किया है तो वहीं जम्मू-कश्मीर सरकार ने अपने कर्मचारियों को निराश किया है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बजट सत्र में राज्य के वित्त मंत्री अब्दुल रहीम राथर ने जब विधानसभा में बजट रखा तो जम्मू-कश्मीर के अपने कर्मचारियों के लिए कुछ नहीं रखा। वजह साफ है कि जम्मू-कश्मीर का खजाना खाली हो चुका है। गौरतलब है कि राज्य सरकार के कर्मचारी पिछले काफी समय से अपने बकाया वेतन और डीए को बढ़ाने की मांग के लेकर धरना प्रदर्शन करते आ रहे हैं। कई बार इन कर्मचारियों ने सामूहिक हड़ताल भी की लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नही रेंगी।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जब वित्त मंत्री अब्दुल रहीम राथर यह कह रहे थे कि रियासत की माली हालत कर्मचारियों का बकाया वेतन, एरियर और भत्ता भुगतान करने की इजाजत नहीं देती, तब पौने पांच लाख कर्मचारी सिर पर हाथ रखकर बैठ गए। यह सभी कर्मचारी इस बार सरकार के बजट से कई उम्मीदें लगाए हुए थे कि शायद उनकी मांगों को सरकार नजर में रख कर कोई कदम उठाएगी लेकिन हुआ उसके विपरीत। सभी कर्मचारी अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं और वो भी अब जब केन्द्र सरकार ने केन्द्रीय कर्मचारियों को एक बड़ा तौहफा डीए के रूप में दे दिया है।

13वें वित्त आयोग ने अपनी अनुशंसा में साफ ताकीद की है कि छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद मुलाजिमों को देय 4,200 करोड़ रुपये का तत्काल भुगतान नुकसानदायी होगा। इसमें कोई शक नहीं है कि राज्य की माली हालत इस समय पतली हो चुकी है और इसकी वजह आतंकवाद है जिसके चलते कई उद्योग ठप्प पड़े हैं और पर्यटकों की संख्या में लगातार गिरावट आंकी जा रही है। कृषि क्षेत्र की बदहाली, कश्मीर आने वाले पर्यटकों की कम होती संख्या और भ्रष्टाचार ने केंद्रीय अनुदानों पर राज्य की निर्भरता बढ़ा दी है। चंद दिन पहले पास किए गए राज्य सरकार के बजट में वर्णित आंकड़े बता रहे हैं कि केंद्रीय अनुदान और केंद्रीय करों में हिस्सेदारी ही राज्य सरकार की आय का 70 फीसदी हिस्सा है। खर्च होने वाले एक रुपये में सिर्फ 30 पैसे राज्य सरकार की अपनी कमाई होती है।

विकास योजनाओं से लेकर वेतन तक के लिए राज्य सरकार को केंद्र की ओर टकटकी लगाकर देखना पड़ रहा है। हालांकि इसी सबके बीच राज्य सरकार को कई बार बैंकों व बोर्डों से मदद भी मिलती है। साफ तौर पर कहा जाए तो जम्मू-कश्मीर बैंक और माता वैष्णो देवी श्राईन बोर्ड ने कई बार राज्य सरकार के कर्मचारियों को वेतन देने के लिए मदद भी की है। यह बात अलग है कि यह पैसा उधार के तौर पर लिया गया है।

पिछले साल केंद्र सरकार ने 5,500 करोड़ रुपये अनुदान दिया था जिससे खर्चा-पानी चलता रहा और विकास बोर्डों की बैठकों में खुले हाथ से मुख्यमंत्री ने पैसे दिए। इस साल यह अनुदान बढ़कर 6,000 करोड़ रुपये हो जाने की उम्मीद है। राज्य की आमदनी बढ़ने के लिए सीधे-सीधे कर थोपने से बचते हुए राज्य सरकार ने वैट में एक फीसदी और सर्विस टैक्स में दो फीसदी का इजाफा कर दिया। जाहिर है, महंगाई और बढ़ेगी। फिलहाल मसला कर्मचारियों की मांगों को तवज्जो देने का है।

बजट में खाद और कीटनाशक दवाओं पर से टोल टैक्स हटाया गया है ताकि किसानों को फायदा हो। मगर यह किसी को याद नहीं कि हर साल कंडी क्षेत्र के किसान समय पर और पर्याप्त खाद न मिलने के कारण कराहते हैं। रियासत में 12 फीसदी कृषि भूमि बंजर पड़ी है। पर्यटन क्षेत्र से होने वाली आमदनी में भी गिरावट दर्ज की गई है। साल 1988 में जब आंतकवाद ने सिर नहीं उठाया था, तब कुल 59,938 पर्यटक कश्मीर आए थे। जबकि 2008 में 22,000 पर्यटकों ने ही यहां का रुख किया। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। ताजा बजट में भी होटल, लॉज और गेस्ट हाउसों को एक साल के लिए सेल्स टैक्स में रियायत दी गई है। लेकिन परिणाम आशाजनक होंगे, इसकी कोई गांरटी नहीं। हालांकि सरकार यही कह रही है कि इस बार पर्यटकों को यहां पर लाने के लिए कई योजनाए बनाएगी और पर्यटक स्थलों की देखरेख को ध्यान में रखेगी लेकिन इसके लिए भी बजट चाहिए होगा। साफ तौर पर कहा जाए की माली हालत कब सुधरेगी इसके बारे में कुछ भी पता नहीं लग पा रहा है।

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