विमल कुमार
Friday , February 01, 2013 at 20 : 03

माइकल क्लार्क का एक और भारत दौरा


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अक्टूबर 2003, दिल्ली का पालम क्रिकेट मैदान। भारत दौरे पर ट्राएंग्युलर सीरीज़ खेलने आई ऑस्ट्रेलियाई टीम में एक से बढ़कर एक धुरंधर नाम शामिल हैं। एडम गिलक्रिस्ट, मैथ्यू हेडेन, रिकी पॉन्टिंग, डेमियन मार्टिन, एंड्रयू साइमंड्स और माइकल बेवन जैसे बल्लेबाज़ अगर किसी टीम में शामिल हों तो वहां पर किसी भी युवा खिलाड़ी को दौरे पर कैसे मौका मिल सकता है, जब तक कि इनमें से कोई एक खिलाड़ी अनफिट हो जाए या फिर दौरे पर बहुत ही ज़्यादा उनका फॉर्म बिगड़ जाए।

लेकिन, पालम के इस मैदान पर ऑस्ट्रेलिया के एक युवा बल्लेबाज़ को नेट पर बल्लेबाज़ी करते देखते हुए अच्छा लगता है। अच्छा लगने की वजह उसकी बल्लेबाज़ी से ज़्यादा है उसका स्वभाव। दरअसल, हुआ यूं कि मैदान में बड़े शॉट्स खेलने का अभ्यास करते हुए इस बल्लेबाज़ की एक गेंद सीधे एक निजी टीवी चैनल के कैमरे पर लगती है और इसका थोड़ा नुकसान भी उस कंपनी को होता है। गलती निश्चित तौर पर चैनल की थी, जिन्होंने अपना कैमरा बाउंड्री के थोड़ा अंदर लगा रखा था, ये सोचकर कि ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज बल्लेबाज़ अपना अभ्यास ख़त्म कर चुके हैं और अब रिजर्व खिलाड़ी अभ्यास कर रहे हैं। माइकल क्लार्क की प्रतिभा को कम आंकने की जो भूल उस कैमरामैन ने की, मैं नहीं करना चाहता था।

ऑस्ट्रेलियाई टीम के तत्कालीन मीडिया मैनेजर जोनेथन रोज़ को मैंने क्लार्क का इंटरव्यू करने का आग्रह किया तो वो चौंक गए। \"आप कलार्क का इंटरव्यू करना चाहते हैं, पक्का? \". रोज़ को ऐसा लगा कि वाह भारत जैसे मुल्क में ही ऐसा मुमकिन है कि सिर्फ 1 वन-डे मैच खेलने वाले क्लार्क के लिए टीवी चैनल इंटरव्यू करने के लिए इतने उत्साहित हों। ख़ैर, जब तक क्लार्क मेरे सामने आते मुझे इस बात की जानकारी मिल चुकी थी। भारत दौरे पर आने से ठीक एक दिन पहले ऑस्ट्रेलिया के एक दिग्गज गेंदबाज़ एलन डेविडसन ने उन्हें रिकी पॉन्टिंग की बराबरी की प्रतिभा वाला खिलाड़ी बताया था।

मेरा पहला सवाल भी यही था और इसे सुनकर क्लार्क खुश भी हुए और थोड़ा सा झेंप भी गए। लेकिन उनके जवाब में ईमानदारी थी, ऊर्जा थी,नयापन था और सबसे अच्छी बात ये कि वो हर सवाल पर सहज़ थे। क्लार्क का जवाब आज भी मुझे पूरी तरह से याद है। \"अगर मैं अपने करियर में रिकी की आधी कामयाबी भी हासिल कर पाया तो मैं अपने को बेहद खुशनसीब समझूंगा\"। क्लार्क को उस पूरे भारत दौरे पर एक भी वन-डे मैच खेलने का मौका नहीं मिला, लेकिन ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट से जुड़े हर किसी ने कहा कि ये लड़का ना सिर्फ आगे जाकर ऑस्ट्रेलिया के लिए खेलेगा, बल्कि कप्तानी भी करेगा। एक युवा खिलाड़ी जिसने अभी सिर्फ 1 वनडे खेला हो, उसे भविष्य का कप्तान बनाने की बात सिर्फ ऑस्ट्रेलियाई सिस्टम ही शायद कर सकता था।

एक दशक बाद उस लम्हें को याद करता हूं तो ऐसा लगता है कि मानो क्लार्क की कामयाबी की स्क्रिप्ट पूरी तरह से लिखी हुई थी। लेकिन, हकीकत में ऐसा नहीं है। खेल में कभी भी किसी भी खिलाड़ी की पटकथा पहले से नहीं लिखी होती है। खिलाड़ी चाहे सचिन तेंदुलुकर हों या फिर ब्रायन लारा हों, उसे अपने दौर की चुनौती और कठिनाइयों से गुज़रना पड़ाता है और उस इम्तिहान को पास करने के बाद ही उस पर महानता की मुहर लगती है। क्लार्क ने भी बीते एक दशक में अपने करियर में कई उतार-चढ़ाव देखे और ये कहा जा सकता है कि जब वो क्रिकेट को अलविदा कहेंगे तो उनकी गिनती भी महान खिलाड़ियों में होगी।

टेस्ट क्रिकेट में अपने महानता की झलक क्लार्क ने अपने पहले ही टेस्ट में दिखा दी। भारत के ख़िलाफ़ 2004 बैंगलोर टेस्ट में क्लार्क ने स्टेडियम में मौजूद अपने परिवारवालों के सामने एक ऐसा शतक लगाया जिसे भारतीय ज़मीं पर किसी विदेशी बल्लेबाज़ के बेहतरीन शतकों में से एक गिना जाएगा। अनिल कुंबले और हरभजन सिंह जैसे गेंदबाज़ों के सामने क्लार्क ने जिस खूबसूरती से अपने कदमों का इस्तेमाल किया वो आज भी क्रिकेट जानकारों को रोमांचित कर देता है। 35 साल बाद ऑस्ट्रेलिया ने भारत में सीरीज़ जीत के सूखे को ख़त्म किया तो इसके एक बड़े नायक क्लार्क ही रहे।

बैंगलोर टेस्ट में मैन ऑफ द मैच बनकर ऑस्ट्रेलिया को 4 मैचों की सीरीज़ में 1-0 से आगे करने वाले इस बल्लेबाज़ ने नागपुर टेस्ट की दोनों पारियों में बेहतरीन बल्लेबाज़ी के ज़रिए अपनी टीम को अपराजेय बढ़त दिलाते हुए सीरीज़ जीत पक्की करा दी। अगर कोई उपमहाद्वीप का खिलाड़ी ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड या साउथ अफ्रीका में पहली सीरीज़ में अपने बल्ले के बूते टीम को टेस्ट सीरीज़ जिता दे तो आप उसे क्या कहेंगे। क्लार्क का भारत में अपनी पहली सीरीज़ में खेल उसी कसौटी पर तौला जाना चाहिए।

खैर, जल्द ही क्लार्क का सामना नाकामी से भी हुआ। 2005 एशेज़ में इंग्लैंड के ख़िलफ जब पूरी ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ी संघर्ष कर रही थी, क्लार्क भी लेपेटे में आए। लेकिन, क्लार्क ने अपनी गलतियों से सीखा और भविष्य के लिए अपनी तकनीक पर काम किया। क्लार्क एक बल्लेबाज़ के तौर पर ऑस्ट्रेलियाई ढांचे में तो ढल रहे थे लेकिन एक कप्तान के तौर पर वो कितने फिट होंगे इस बात को लेकर ऑस्ट्रेलिया में बहस शुरू हो गई थी।

क्लार्क का एक मशहूर मॉडल के साथ लंबा अफेयर चला और उसके बाद लगातार पेज थ्री और फैशन की दुनिया में उनकी चर्चा होना कई क्रिकेट पंडितों को नागवार गुज़र रहा था। क्लार्क की जीवन-शैली भी ऐसी रही कि वो मैच ख़त्म होने के बाद बहुत ज़्यादा देर तक टीम की पार्टी में शरीक नहीं होते थे। ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट में जीत की जितनी बड़ी परंपरा है, उतना ही पुराना इतिहास खिलाड़ियों की \"मैटशिप\" यानि की मैच ख़त्म होने के बाद यारी दोस्ती और दोस्ताने लम्हों में झूमने का। लेकिन, क्लार्क ऐसे स्वभाव के नहीं थे। इसी की चलते एक बार उनकी अपने साथी खिलाड़ी साइमन कैटिच से जमकर तू-तू मैं-मैं भी हुई। बात इस हद तक बिगड़ी कि मामला एक-दूसरे के गिरेबां तक भी पहुंच गया। इस घटना के बाद क्लार्क की कप्तानी महत्वाकांक्षा को लेकर गंभीर सवाल भी उठे।

बहरहाल, ऑस्ट्रेलियाई सिस्टम की इस बात के लिए तारीफ होनी चाहिए कि वो पॉन्टिंग जैसे युवा खिलाड़ी जो कि शराब की बुरी लत के चलते परेशान थे, भरोसा नहीं खोते हैं। उस खिलाड़ी को अधर में छोड़ने के बजाए वो उससे कप्तानी की ज़िम्मेदारी देकर उसकी शख़्सियत को ही बदल देते हैं। क्लार्क के साथ एक बार चयनकर्ताओं ने वही पोटिंग वाला भरोसा दिखाया। पोटिंग ने जिस जिस फॉर्मेट में कप्तानी छोड़ी, क्लार्क ने ये ज़िम्मेदारी ली। ज़िम्मेदारी के बाद क्लार्क और भी बेहतरीन बल्लेबाज़ बनकर उभरे। पिछले साल भारत के ख़िलाफ़ टेस्ट सीरीज़ में तिहरा शतक और दोहरा शतक लगाकर अपनी टीम की जीत में अहम भूमिका निभाई। साउथ अफ्रीका के ख़िलाफ़ तीन मैचों की सीरीज़ में 2 दोहरे शतक लगाकर क्लार्क ने कई रिकॉर्ड तोड़े और बनाए। लेकिन सबसे अहम बात ये रही कि उन्होंने दुनिया की नंबर 1 टीम के साथ पूरी सीरीज़ में कई मर्तबा ऑस्ट्रेलियाई टीम में जीत की उम्मीद जगाई।

क्लार्क भले ही ऑस्ट्रेलिया को पॉन्टिंग या उससे पहले स्टीव वॉ वाले दौर में ले जाने में कामयाब ना हों, क्योंकि उनके पास वैसे खिलाड़ी भी नहीं हैं। लेकिन क्लार्क एक मायने में एलन बॉर्डर की तरह कप्तान साबित हो सकते हैं जिन पर फिर से ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट को शिखर पर ले जाने की चुनौती थी। बॉर्डर ने ये काम अपने युवा खिलाड़ियों के ज़रिए बखूबी अंज़ाम दिया। ज्यॉफ मार्श, डेविड बून, डीन जोंस, क्रेग मैकडरमॉट सरीखे खिलाड़ियों ने बॉर्डर के सपने को हकीकत में तब्दील किया। बॉर्डर उस टीम के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज़ थे। क्लार्क मौजूदा टीम के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज़ हैं। देखने वाली बात ये होगी कि क्या पीटर सिड्ल, नैथन ल्योन, जेम्स पैटिंसन, एड कॉवेन और डेविड वार्नर वही खेल दिखाएंगे जो कभी मार्श, जोंस, बून और मैकडरमॉट ने दिखाया था।

चलते चलते एक बात और जो मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूं कि क्लार्क स्वभाव से अब भी वही नम्र और दूसरों की परवाह करने वाले इंसान हैं। 2010 में भारत में टेस्ट सीरीज़ के दौरान इत्तेफाक से बैंगलोर टेस्ट के दौरान क्लार्क से बाउंड्री के बाहर एक बार फिर उसी अंदाज़ में मुलाकात हुई जैसी कि पहली हुई थी। नैट प्रैक्टिस के दौरान क्लार्क के एस शॉट्स से स्टेडियम में काम कर रहे एक शख़्स को थोड़ी चोट लग गई थी। बल्लेबाज़ी के बाद जब वो वापस लौटे तो उन्होंने ना सिर्फ उस बंदे का हाल पूछा, बल्कि अपनी टीम के फिजियोथेरेपिस्ट से स्प्रे भी मंगाकर दिया। क्लार्क को जब मैंने 2003 वाली घटना याद दिलाई तो वो बस मुस्करा गए और मुझे अफसोस सिर्फ इस बात का रहा कि इस बार मुझे इंटरव्यू नहीं मिला।

2013 में क्लार्क एक बार फिर भारत दौरे पर आएंगे। इस बार उन पर सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी होगी कप्तान के तौर पर भारत में टेस्ट सीरीज़ जीतने की। पिछले 4 दशक से भी ज़्यादा समय में सिर्फ एक मौके यानी 2004 में ऑस्ट्रेलिया ने भारतीय ज़मीं पर टेस्ट सीरीज़ जीतने में कामयाबी हासिल की थी। क्लार्क को ये साबित करना होगा कि उनकी टीम सिर्फ घरेलू पिचों पर शेर नहीं है। भारत को पिछली सीरीज़ में 4-0 से हराने वाले क्लार्क अगर टीम के लिए 1-0 से भी सीरीज़ जीतें तो ये उनके करियर की सबसे बड़ी कामयाबी साबित हो सकती है।

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विमल कुमार के बारे में कुछ और

विमल कुमार करीब दशकभर से क्रिकेट रिपोर्टिंग से जुड़े हैं। आईबीएन7 से जुड़ने से पहले वे टीडब्लूआई और आज तक जैसे संस्थानों में काम कर चुके हैं। Twitter ID@Vimalwa
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