विमल कुमार
Thursday , February 21, 2013 at 16 : 34

हरभजन और कंगारू! अतीत से बेहतर होगा भविष्य?


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कर्टेले एम्ब्रोस और हरभजन सिंह में क्या समानता है? इस सवाल को सुनकर शायद कोई भी चौंक जाए। दोनों गेंदबाजों में कोई समानता नहीं है। एक महान तेज गेंदबाज, सिर्फ महान तेज गेंदबाज नहीं बल्कि कई दिग्गजों की सर्वकालिक महान टीम में शामिल होने वाला नाम। दूसरा एक बेहतरीन स्पिनर, महान कहने पर शायद बहुत लोगों को ऐतराज़ हो। और दुनिया की सर्वकालिक महान टीम की बात तो दूर, जब क्रिकेट की मशहूर वेबसाइट cricinfo.com ने भारतीय इतिहास की महानतम टीम चुनी तो उसमें भी ऑफ स्पिनर के तौर पर हरभजन का नाम ना होकर ईरापल्ली प्रसन्ना शामिल थे।

इसे इत्तेफाक कहें या कुछ और लेकिन सच्चाई ये है कि वेस्टइंडीज के पूर्व तेज गेंदबाज एम्ब्रोस से हरभजन ने सिर्फ 1 मैच ज्यादा यानि कि 99 मैच खेले हैं। और ये समानता सिर्फ मैचों की संख्या को लेकर सीमित नहीं है। एम्ब्रोस ने अगर इस दौरान 405 विकेट लिए तो हरभजन उनसे 3 ज़्यादा यानि की 408 विकेट ले चुके हैं। एम्ब्रोस ने एक पारी में 5 विकेट लेने का कमाल 22 बार और पूरे मैच में 10 विकेट लेने का कमाल 3 बार दिखाया तो हरभजन इन दोनों कसौटियों पर भी एम्ब्रोस से बीस साबित हुए हैं। एक पारी में 5 विकेट लेने का कमाल 25 बार और पूरे मैच में 10 विकेट लेने का कमाल 5 बार हरभजन ने कर दिखाया है। लेकिन, हमेशा की तरह यहां भी क्रिकेट में आंकड़े कामयाबी की अधूरी कहानी ही बताते हैं। जहां एम्ब्रोस की महानता को लेकर शायद ही कोई सवाल उठाए, वहीं हरभजन को उनके ही देश भारत में महान मानने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है। ये बात और अजीब तब लगती है जब आप ये ग़ौर करें कि मौजूदा समय में सक्रिय गेंदबाजों में 400 से ज़्यादा टेस्ट विकेट लेने वाले हरभजन इकलौते गेंदबाज हैं। इसके बावजूद हरभजन 2011 के इंग्लैंड दौरे के बाद से टीम इंडिया से बाहर रहे हैं। इंग्लैंड सीरीज के दौरान उन्हें 1 टेस्ट खेलने का मौका मिला लेकिन वो फिर बाहर कर दिए गए। अब ऑस्ट्रेलिया सीरीज़ के लिए उनकी गैरमामूली साख़ को ध्यान में रखते हुए चयनकर्ताओं ने उन्हें एक और लाइफलाइन दी है।

हालांकि, इससे पहले 2011-12 सीजन में ऑस्ट्रेलिया दौरे की अहमियत को ध्यान में रखते हुए और उनके अनुभव और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उनकी पुरानी यादों का आकलन करने के बावजूद चयनकर्ता उन्हें नजरअंदाज ही किया था। इसकी वज़ह थी उनके साथी खिलाड़ी आर अश्विन। उस सीज़न वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ तीन मैचों की सीरीज़ में अश्विन ना सिर्फ मैन ऑफ द सीरीज़ बने बल्कि हरभजन की तरह निचले क्रम में बेहतरीन बल्लेबाज़ी करते हुए मुंबई टेस्ट में शतक भी ज़ड़ डाला। ऐसा लगा मानो अश्विन हर लिहाज से भज्जी को टीम से दूर रखने की पूरी कवायद में जुटे थे। दूसरे स्पिनर प्रज्ञान ओझा ने भी शानदार गेंदबाज़ी की और हरभजन को ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए टिकट नहीं मिला।

मशहूर कामेंटेटर हर्षा भोगले 2011 के इंग्लैंड दौरे पर ना सिर्फ हरभजन का बचाव करते रहे बल्कि उन्होंने हरभजन, एम्ब्रोस और यहां तक कि वसीम अकरम के एकदम समान टेस्ट रिकॉर्ड की भी चर्चा की। लेकिन, सच्चाई ये है कि अब हरभजन के लिए टेस्ट क्रिकेट में खुद को फिर से साबित करने की ज़रूरत आ पड़ी है। अश्विन से बेहतर साबित करने की नहीं बल्कि अनिल कुंबले से, मुथैया मुरलीधरन से खुद को आगे ले जाने की जरूरत। 300 टेस्ट विकेट लेने के बाद कुंबले भी लगभग ऐसे ही दोराहे पर खड़े थे। 2004 के ऑस्ट्रेलिया दौरे में कुंबले को काफी मुश्किल से टीम में जगह मिली लेकिन वो ब्रिसबेन में पहला टेस्ट नहीं खेल पाए। हरभजन उस दौरे पर अनफिट हुए और दूसरे टेस्ट में इकलौते स्पिनर के तौर पर मुरली कार्तिक खेलते अगर वो वक्त रहते ऑस्ट्रेलिया पहुंच जाते। लेकिन, उसके बाद जो हुआ वो एक चैंपियन ही कर सकता था। कुंबले ने उस सीरीज़ के 3 मैचों में 25 विकेट लिए और एडिलेड में यादगार जीत में भी अहम भूमिका निभायी। इसके बाद उसी सीज़न में पाकिस्तान दौरे पर भी वो नम्बर 1 स्पिनर साबित हुए और उसके बाद उनकी गाड़ी ऐसी चली कि बस 619 विकेट के बाद ही रुकी।

हरभजन के सामने कुंबले की ये कहानी प्रेरणा के काम आ सकती है। वैसे भी, कुंबले ने हमेशा ही हरभजन को एक चैंपियन गेंदबाज माना है। संघर्ष के इस दौरे में भी टीम इंडिया के एक और पूर्व कप्तान सौरव गांगुली को भज्जी के जल्द से जल्द टीम में लौटने का यकीन है। खुद अश्विन के कोच सुनील सुब्रमण्यम ने भी अतीत में लेखक से कहा था कि मीडिया बेवजह पूरे मुद्दे को हरभजन बनाम अश्विन बना रही है। सुब्रमण्यम के मुताबिक- \\\"हरभजन ने टेस्ट क्रिकेट में जो कामयाबी हासिल की है वो ना सिर्फ अश्विन बल्कि किसी भी स्पिनर के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। हरभजन की ऊंचाइयों को छूना अश्विन का लक्ष्य होना चाहिए। मैंने एक रिसर्च की है जिसमें ये उभर कर आया है कि जिन मैचों में प्रसन्ना और आर वेंकटराघवन एक साथ खेले, दोनों स्पिनर्स का खेल बेहतर हुआ। भविष्य में भज्जी और अश्विन इस कहानी को दोहरा सकते हैं\\\"।

ऐसा भरोसा दिखाने वाले अश्विन के कोच ही नहीं बल्कि क्रिकेट के पुराने दिग्गज भी हैं। आने वाले कुछ हफ्ते या महीने हरभजन को ये सोचने और समझने का मौका देंगे कि आखिर उनसे चूक कहां हुई। हरभजन को क्रिकेट एक्सपर्ट के ज्ञान और सलाह की ज़रूरत नहीं है क्योंकि अगर वो ईमानदारी से अपना आकलन करेंगे तो उन्हें ये पता चल जाएगा कि आलोचकों की बातों में कुछ तो दम है और आलोचकों को ग़लत साबित करना उनकी सबसे बड़ी कामयाबी रही है। कुंबले की तरह अगर भज्जी टेस्ट क्रिकेट में अपनी \\\"दूसरी पारी\\\" को यादगार बनाने में कामयाब रहे तो शायद जब वो टेस्ट करियर को अलविदा कहेंगे कि ना सिर्फ वो एम्ब्रोस से विकेट के मामले में काफी आगे रहेंगे बल्कि शायद उनका मौजूदा औसत(32.22) और स्ट्राइक रेट (68.1) एम्ब्रोस के करियर औसत(20.99) और स्ट्राइक रेट(54.5) के बराबर या उनसे बेहतर भी हो सकता है।

अगर सब कुछ ठीक रहा तो भज्जी उसी विरोधी के खिलाफ अपना सौवां टेस्ट खेलेंगे जिसके खिलाफ उन्होंने खुद को पूरी दुनिया के सामने एक बेहतरीन गेंदबाज़ के तौर पर पेश किया। अगर भज्जी मौजूदा सीरीज में अपने अतीत को दोहराने में कामयाब होते हैं तो उनका भविष्य और बेहतर होगा।

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विमल कुमार के बारे में कुछ और

विमल कुमार करीब दशकभर से क्रिकेट रिपोर्टिंग से जुड़े हैं। आईबीएन7 से जुड़ने से पहले वे टीडब्लूआई और आज तक जैसे संस्थानों में काम कर चुके हैं। Twitter ID@Vimalwa
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