कर्नाटक में खून की होली के लिए कौन जिम्मेदार है- तस्लीमा नसरीन, फंडामेंटलिस्ट या फिर वह आर्टिकल छापने वाला अखबार? होली रंगों का त्योहार होता है। लोग एक दूसरे के ऊपर रंग फेंक कर अपनी मोहब्बत का इज़हार करते हैं लेकिन कर्नाटक में इस बार की होली सभी जल्द से जल्द भूलाने की कोशिश करेंगे, क्योंकि यह होली रंगों की नहीं बल्कि खून की होली थी, मोहब्बत की नहीं बल्कि नफरत की।
होली के दो दिन पहले पूरी दुनिया में ईद मिलाद मनाया जा रहा था। दोनों समुदाय के लोग एक दूसरे को होली और ईद-मिलाद की मुबारकबाद देते थे लेकिन सोमवार को कुछ और ही देखने को मिला। लोग होली के जश्न में डूबे थे। एक दूसरे पर रंग लगा रहे थे कि इस बीच मुस्लिम समुदाय के लोग इन्हीं सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे क्योंकि राज्य के एक स्थानीय अखबार ने बांग्लादेशी लेखक तस्लीमा नसरीन का एक लेख छापा था जिसमें तस्लीमा ने लिखा था की हजरत मुहम्मद भी बुर्के के खिलाफ थे और बुर्का महिलाओं की आजादी में एक बाधा है। ऐसे में सवाल उठता है कि एक स्थानीय अखबार को यह लेख छापने की क्या ज़रूरत थी?
विरोध प्रदर्शन कर्नाटक के शिमोगा जिले में शरू हुआ और देखते ही देखते हासन, हुबली व बेलगांव में फैल गया। शिमोगा में पुलिस ने स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए गोली चलाई जिस में एक युवक की मौत हो गई। शिमोगा में तुरंत कर्फ्यू लगा दिया गया और बाकी इलाकों में धारा 144 लगा दी गई। तुरंत हर एक टीवी चेनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ आ गई- कर्नाटक में हिंसा, 2 लोगों की मौत, तसलीमा नसरीन के लेख पर विवाद।
सभी चैनलों पर टीआरपी की जंग शरू हो गई। किसी ने कहा, शूट एट साइट के निर्देश दिए गए तो किसी ने कहा 4 लोगों की मौत हुई। कहीं चैनल में सवाल उठाया गया कि क्या भारत में किसी को अपनी राय या विचार रखने की आजादी नहीं, क्या मुस्लिम फंडामेंटलिस्ट ने इस मामले को ज्यादा उछाला।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने तुरंत मुस्लिम धर्म के नेताओं से मिलकर मुस्लिम समुदाय को अमन रखने की अपील की और उक्त अखबार के खिलाफ कारवाई करने का आश्वासन भी। पूरे कर्नाटक में पुलिस को एलर्ट कर दिया गया और सांप्रदायिक हिंसा को आगे न बढ़ने के लिए सख्त कार्रवाई करने की हिदायत दी गई।
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि मीडिया ने दोनों समुदायों के लोगों को इस खूंरेज़ी के लिए जिम्मेदार माना। किसी भी चैनल ने यह सवाल नहीं पूछा कि आखिर ऐसा विवादास्पद लेख छापने की जरूरत क्या थी और वह भी उस समय जब दोनों समुदाय अपने त्योहार मना रहे थे। इस घटना ने एक बार फिर हमारे सामने एक सवाल रखा है क्या आज का मीडिया लोगों के लिए है या फिर टीआरपी के लिए।














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