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मनोज शर्मा
Friday , October 30, 2009 at 13 : 25

शिव की अटल अनुभूति


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'हार नहीं मानूंगा...रार नहीं ठानूंगा...

काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं...

गीत नया गाता हूं'

अटल बिहारी वाजपेयी की उम्मीद से भरी दूसरी अनुभूति के साथ शिवराज सिंह चौहान की मध्य प्रदेश में दूसरी पारी शुरू हुई। जनता को आशा ही नहीं भरोसा हो चला था कि जैत का किसान पुत्र अटल बिहारी वाजपेयी की नई अनुभूति का ज़मीन पर अहसास करायेगा। दोबारा शिवराज को चुना।

जाहिर है मध्य प्रदेश की जनता की उम्मीदें भी बढ़ गई थीं। चुनावी सभाओं में भले ही मुख्यमंत्री का रिकॉर्ड लाड़ली लक्ष्मी पर फंसा रहा हो लेकिन दोबारा ताजपोशी कराने के बाद लोगों ने शिवराज की शख्सियत में लाड़ली लक्ष्मी से आगे कुछ देखना शुरू कर दिया।

दूसरी पारी की ओपनिंग शिवराज ने एक मंझे हुये कप्तान और मिस्टर रिलायेबिल (जिसपर भरोसा किया जा सके) की तरह की। जनाब ने छोटा सा मंत्रिमंडल बनाया। सिर्फ बाइस मंत्रियों का। जनता को अच्छा लगा। विपक्ष का मुंह बंद हुआ। जनता को अच्छा लगा कि मंत्रिमंडल से वो चेहरे बाहर थे जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप थे। जिनका और विवादों का चोली दामन का साथ हो चला था।

देखते ही देखते मिस्टर रिलायेबल शिवराज को क्रीज पर बल्लेबाजी करते दस महीने बीत गए। तरक्की का स्कोर बोर्ड आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहा। भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाने का राग तो अलापा जा रहा है लेकिन मंत्री उनको बना रहे हैं जिनकी नीयत पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। बकौल दिग्विजय सिंह, ये तो पुराने गैंग की वापसी है। हो सकता है कि दिग्गी राजा ने ये कहकर विरोध की खातिर विरोध किया हो लेकिन इसमें थोड़ी सी सच्चाई भी है।

मसलन मंत्रिमंडल में लिए गए कैबिनेट मंत्री अजय विश्नोई का मामला लीजिए। नवंबर में विधानसभा चुनाव के ठीक छह महीने पहले अजय विश्नोई के भाई और दूसरे करीबियों के यहां इनकम टेक्स विभाग के छापे पड़े। खूब हो हल्ला हुआ। कांग्रेस मुद्दे को लेकर सड़कों पर उतरी। आरोप लगा कि जनता की सेहत के नाम पर मंत्री जी ने अपनी और अपने करीबी लोगों की सेहत बनाई है। चुनाव के पहले मुद्दा जो मिल गया। इससे पहले कि मुद्दा घर-घर पहुंचता पार्टी ने स्वास्थ्य मंत्री अजय विश्नोई से इस्तीफ़ा ले लिया। मुख्यमंत्री को दिये गये विश्नोई के इस्तीफ़े का मजमून भी दिलचस्प था...

'कांग्रेसी नेताओं ने मुझ पर आरोपों की बौछार लगाई। कोई नई बात नहीं है। इस बार आरोपों के साथ आयकर विभाग ने मेरे भाई और मेरे दूसरे सहयोगियों के यहां भी छापे मारे। समाचार पत्रों में सच को दबाकर झूठ का बाजार गर्म हुआ है। आरोप निराधार हैं। सच्चाई से मैं आपको अवगत करा चुका हूं। सबूत भी मेरे पास हैं। मैदान से पलायन करना मेरा स्वभाव नहीं है। परन्तु मैं यह भी नहीं चाहता कि मेरी इस लड़ाई के छींटे सरकार या पार्टी पर पड़ें। इसलिए अनुरोध है कि स्थिति स्पष्ट होने तक मुझे मंत्री पद से अलग रखें। मंत्री पद से मेरा त्याग पत्र स्वीकार करें।'

मतलब अजय विश्नोई नहीं चाहते थे कि बदनामी के छींटे सरकार या पार्टी पर पड़ें। लेकिन फिर भी पार्टी ने अजय विश्नोई को दोबारा चुनाव लड़ाया। साबित हो गया कि पार्टी को अजय विश्नोई की लड़ाई के छींटों से फर्क नहीं पड़ता। विश्नोई फिर विधायक बन गये। लेकिन शिवराज सिंह चौहान ने अपने पहले मंत्रिमंडल में उनको बर्थ नहीं दी। ये सोचकर कि कहीं विश्नोई की लड़ाई के छींटे उनकी नई नवेली सरकार पर न पड़ जाएं। इनकम टैक्स की तलवार बदस्तूर लटकी थी। अब जनता सवाल पूछ रही है कि इनकम टैक्स की तलवार कब हट गई। क्या छींटे पड़ना बंद हो चुके हैं। अगर खतरा टल चुका है तो खुशी की बात है। लेकिन इसके बारे में मुख्यमंत्री ने जनता जनार्दन को क्यों नहीं बताया।

सियासी लिहाज से शिवराज के लिये भ्रष्टाचार से बड़ा मसला है उनके हाथों से निकलती मध्य प्रदेश की कमान। चाहे वो अजय विश्नोई हों, बाबूजी यानी सरताज सिंह हों, नरोत्तम मिश्रा हों, उमाशंकर गुप्ता हों या विजय शाह इनमें एक भी नाम ऐसा नहीं है जिसे मुख्यमंत्री की पसंद कहा जा सके।

अगर ऐसा होता तो पिछली बार बाबूजी की आंखों से आंसुओं की गंगा न बही होती। पिछले साल नवंबर में दोबारा विधानसभा चुनाव जीतने के बाद हर तरफ शिवराज का डंका बज रहा था। शिवराज को अपना मंत्रिमंडल बनाने की खुली छूट थी। फिर क्यों मुख्यमंत्री ने इन धुरंधरों को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया। दरवाजे की ओट से चेहरे पर लंबा घूंघट डालकर बताया गया कि वो चुनाव भले ही जीत गये हैं। लेकिन मंत्री बनने के काबिल नहीं क्योंकि थोड़ा तेज चलते हैं। (ये अलग बात है कि तेज़ क्या सरपट दौड़ने वाले दो तीन मंत्री उस वक्त भी जगह पा गये थे) तो क्या अब इन लोगों ने दस महीने में धीमे-धीमे चलना सीख लिया। या फिर मध्य प्रदेश के लिए कुछ कर गुजरने की शिवराज की तीव्र इच्छा शक्ति थोड़ी कमजोर हो गई है। या फिर मध्य प्रदेश बीजेपी के रीयल हीरो को दिल्ली की हाईकमान ने किडनेप कर लिया है।

ये हकीकत है मध्य प्रदेश के मंत्रिमंडल में दिल्ली का विस्तार हुआ है। किसी मंत्री के लिए अनंत कुमार ने जोर लगाया तो किसी ने सुषमा स्वराज से सिफारिश लगवाई। कोई अरुण जेटली से जोर लगवाता दिखा। वैंकेया नायडू ने भी विस्तार से चंद घंटों पहले एक फोन लगाकर अपना कोटा बरकरार रखा।

शिवराज सिंह चौहान के दायरे से ऊपर उठकर सोचें तो सूबे में दिल्ली का इतना ज्यादा असर भारतीय जनता पार्टी के लिए ज्यादा घातक है। राष्ट्रीय स्तर पर इस वक्त पार्टी द्वंद के दौर से गुजर रही है। कीमोथेरेपी के मशवरे दिये जा रहे हैं। मध्य प्रदेश और गुजरात दो बड़े सूबों पर बीजेपी का बादलों से भरा आसमान टिका है।

गुजरात में तेज-तर्रार नरेन्द्र मोदी के रहते दिल्ली के किसी नेता की अहमदाबाद में दाल गलने की गुंजाइश कम ही रहती है। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने इस बार दिल्ली के नेताओं को भोपाल में दाल गलाने का मौका दे दिया। और तो और तड़का भी वो ही लगाकर चले गये। लेकिन सवाल ये है कि ये दाल कितनी जायकेदार बनी है। क्योंकि इस दाल को खाना तो मध्य प्रदेश की जनता को ही है। और अगर लोगों को ये दाल स्वादिष्ट नहीं लगी तो उनकी नजर में तो ये शिवराज के खेत में उगी दाल है। जनता को नहीं पता कि बीज दिल्ली से आया है। अगले चार साल तो खाना मजबूरी है लेकिन इसके बाद जैत (शिवराज का गांव) की दाल खरीदना जनता की मजबूरी नहीं है। अगर बीजेपी शिवराज को फ्री हैंड नहीं देगी तो फिर जायकेदार दाल की अच्छी पैदावार कैसे होगी। जरा सोचिए इन्हीं शिवराज को बीजेपी की कमान देने की अटकलें भी गाहे बगाहे लगती रहती हैं।

पार्टी के केन्द्र, महाराष्ट्र और हरियाणा में मुंह की खाने के बाद राजनैतिक स्तर पर मध्य प्रदेश में बीजेपी सरकार के मंत्रिमंडल का विस्तार बड़ा मायने रखता है। लगातार हारने के बाद पार्टी क्या सबक ले रही है। अगर इस विस्तार को देखें तो पार्टी ने हार से कोई सबक ही नहीं लिया। पार्टी विद आ डिफ़रेंस...एक अलग पार्टी का मंत्रिमंडल...इस तरह का कोई पैगाम शिवराज दे नहीं पाए। या फिर ये कहें हाई कमान शिवराज से दिला नहीं पाया। मध्य प्रदेश में कुशाभाऊ ठाकरे ने जो बीज बोए थे उनकी फसल आज तक बीजेपी काट रही है।

बीजेपी का हिन्दुस्तान का सबसे अच्छा संगठनात्मक ढांचा मध्य प्रदेश में है। शिवराज की दूसरी जीत पर बहुत हद तक इसी मज़बूत संगठनात्मक ढांचे की जीत थी। लेकिन मध्य प्रदेश जैसे मजबूत राज्य में बीजेपी के गवर्मेंट विद आ डिफरेंस का संदेश नहीं दे पाने से हिमायती यहां तक कह रहे है अब जो बीज बोये जा रहे हैं जिनमें घुन लगा है। आने वाले सालों में बंपर फसल होना मुनासिब नहीं है। मुखिया को हर मंत्री को ये तो साफ करना ही होगा कि सरकार उन्हें लूट का लाइसेंस नहीं जनता की सेवा करने का सुनहरा मौका दे रही है। क्योंकि अगर चार साल और लाइसेंस राज की तरह बीत गए तो फिर बीजेपी को मध्य प्रदेश में भी अटल बिहारी वाजपेई की मशहूर कविता की पहली अनुभूति का अहसास होना लाज़मी है...


'बेनकाब चेहरे हैं...


दाग बड़े गहरे हैं...


टूटता तिलस्म आज


सच से भय खाता हूं...


गीत नहीं गाता हूं...'

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