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Monday , April 20, 2009 at 21 : 00

अब मत कहना मुस्लिमों को वोट बैंक!


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भारतीय मुसलमान की हालत फिल्म के पर्दे और राजनीति के मैदान में एक सी है। फिल्मी परदे पर उसका किरदार एक साधारण इंसान का नहीं होता। कभी वो बेइंतेहा रुमानी शायर तो कभी बेवजह अपनी देशभक्ति की मिसाल देता पुलिस अफसर नजर आता है। जिस तरीके से हम बॉलीवुड के परदे पर एक सामान्य मुसलमान की कल्पना नहीं करते उसी तरह राजनीति के मानसपटल पर भी हम एक सामान्य मुसलमान को नदारद पाते हैं।

भारतीय राजनीति में मुस्लिमों को हम देश की बाकी जनता से अलग करके देखते हैं। हर कोई मान कर चलता है कि राजनीति का सामान्य नियम मुसलमान पर लागू नहीं होता। ये विचार सिर्फ बाहरी लोगों का फैलाया हुआ नहीं है। खुद मुसलमान नेता और जनता भी ये यकीन करती है कि हो न हो वो कुछ अनूठे हैं। यहीं से भारतीय राजनीति में मुसलमानों को बंधक बनाने की कड़ियां शुरू होती हैं। मिथकों का एक ऐसा सिलसिला शुरू होता है, जहां मुस्लिम वोटर की अपनी स्वतंत्र पहचान खो जाती है। वो एक अकेला वोटर नहीं रह जाता, वो एक भीड़ में तब्दील हो जाता है। अपने आप को असाधारण मानते-मानते वो दूसरों की निगाह में असामान्य दिखने लगा है और राजनीति के मिथकों का पात्र बनने के लिए अभिशप्त है। आइए उन मिथकों की एक बानगी देखते हैं, जो मुसलमान को बाकी लोगों की तरह एक आम वोटर स्वीकार नहीं करते।

सबसे पहले है देश की राजनीति में उनकी भागीदारी का सवाल। माना जाता है की मुसलमान राजनीति में ज्यादा शिरकत करते हैं। वो देश के बाकी वोटरों से इतर बड़ी संख्या में वोट डालते हैं। ये सच है कि जिन लोकसभा क्षेत्रों में मुस्लिमों की आबादी ज्यादा है, वहां औसत से ज्यादा वोट पड़ते हैं। लेकिन इसकी वजह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण में छिपी है। जिसके चलते इन इलाकों में हिंदू और मुस्लिम दोनों खुलकर अपने वोट का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन ऐसे लोकसभा क्षेत्र बहुत गिने-चुने हैं। हमारे देश में मुस्लिमों की आबादी महज 13.4 फीसदी है। मतदाता सूची में यह आंकड़ा और सिकुड़ जाता है। देश के अधिकांश चुनाव क्षेत्र ऐसे हैं, जहां मुस्लिम वोटर 10 फीसदी भी नहीं हैं। नेशनल इलेक्शन स्टडीज के जुटाये आंकड़ों से साफ है कि मुसलमानों की चुनाव और देश की राजनीति में भागीदारी बाकी समुदायों से अलग नहीं है।

पिछले चार लोकसभा चुनावों में 59 फीसदी मुसलमानों ने वोट डाले। इसके मुकाबले पूरे देश में औसतन 60 फीसदी लोगों ने अपने वोट का इस्तेमाल किया। दरअसल, अगर कोई फर्क है तो उल्टा है। साल 2004 के लोकसभा चुनाव में मुसलमान वोटरों ने औसत के कहीं कम वोट डाले। अगर हम चुनावों में प्रचार जैसी ज्यादा सक्रिय भूमिका को देखें तो मुस्लिम और हिन्दुओं में कोई बहुत फर्क देखने को नहीं मिलता। इतना ही नहीं, ये आंकड़ा बाकी अल्पसंख्यक समुदायों से अलग नहीं बैठा। शिक्षा और हैसियत जरूर राजनीति में हिस्सेदारी पर असर डालती दिखती हैं, लेकिन मजहब से कोई फर्क नहीं पड़ता।

शायद सबसे प्रचलित मिथक ये है कि सभी मुसलमान मिलकर किसी भी एक पार्टी या उम्मीदवार को वोट डालते हैं। यानी कि मुसलमान एक वोट बैंक हैं। लेकिन आम चुनावों में मुस्लिमों के वोट का रुझान यह साबित नहीं करता कि वो एक वोट बैंक की तरह काम करते हैं। पिछले आम चुनाव में पूरे देश भर में 37 फीसदी मुसलमान वोट कांग्रेस को पड़े। और 17 फीसदी कांग्रेस के सहयोगी दलों को। समाजवादी पार्टी को 16 फीसदी वोट मिले। तो बीजेपी को भी सात फीसदी मुसलमान वोट मिले। इसे वोट बैंक का नमूना कैसा बताया जा सकता है।

बेशक, अगर हम इस पहलू को राज्य की जमीं पर टटोलें तो साफ हो जाता है कि यहां मुस्लिम मतदाता कहीं ज्यादा एकतरफा व्यवहार करता है। लेकिन इसके बावजूद वो वोट बैंक की तरह काम नहीं करते। सिर्फ विकल्पहीनता की हालत में ही वो एकतरफा वोट डालते हैं। खासतौर से जब उसे कांग्रेस और बीजेपी में से किसी एक को चुनना पड़ता है। अगर उन्हें कोई तीसरी पार्टी मिल जाती है तो कांग्रेस की ओर उनका झुकाव कम हो जाता है। या फिर जहां बीजेपी और उसकी किसी सहयोगी की गैरमौजूदगी में दूसरी पार्टियों में मुकाबला सामने आता है। कुल मिलाकर राज्य में मुसलमान वोटर का व्यवहार बहुत हद तक सामान्य जातियों की तरह ही है। आजकल खासतौर पर बिहार और उत्तर प्रदेश में मुसलमान समाज के भीतर जात बिरादरी का फर्क भी उनकी राजनीतिक पसंद नापसंद पर असर डालने लगा है।

एक मिथक ये भी है कि मुसलमान एक रणनीति के तहत आखिरी घंटों तक अपने फैसले को टालते रहते हैं। कुछ इलाकों में ऐसा होता भी है। लेकिन पूरा देश एक स्तर पर आंकड़े की बात की पुष्टि नहीं करता। अगर 33 फीसदी हिन्दू चुनाव के दिन या एक दिन पहले अपना वोट तय करते हैं तो मुसलमानों में यह आंकड़ा महज 31 फीसदी था। एक और मिथक ये भी है कि मुसलमान अपना फैसला खुद नहीं लेते। इनका फैसला पारंपरिक नेताओं और मौलवियों के जरिए होता है। ऐसा भी कहा जाता है कि मुस्लिम वोटर का फैसला रोजमर्रा के जरूरी मुद्दों की बनिस्पत इस्लाम की सोच और समुदाय के मुद्दों पर ज्यादा टिका होता है। लेकिन मुस्लिम वोटर को लेकर बनी इस धारणा में भी कोई दम नहीं है। वोटिंग पर किए गए शोध ये दिखाते हैं कि बाकी हिन्दुस्तानी वोटर की तरह वो भी पहले पार्टी देखता है, फिर उम्मीदवार और आखिर में जात। मुसलमान पुरुष हो या महिला-ये दोनों ही मौलवी या किसी धार्मिक नेता से उतना ही प्रभावित होते हैं, जितना किसी दूसरे समुदाय के वोटर।

अमेरिका से चली ये धारणा हमारे देश में भी फैल रही है कि इस्लाम और लोकतंत्र का छत्तीस का आंकड़ा है। इसी सोच का एक और सिरा भारत में उभार लेता है। इसके मुताबिक भारतीय मुसलमान खुद का राजनीतिक ढांचे से अलगाव महसूस करता है। लेकिन हाल ही में दक्षिण एशिया के पांच देशों में किए एक सर्वे के नतीजे साबित करते हैं कि लोकतंत्र मे सहयोग देने को लेकर मुस्लिम और हिन्दुओं में कोई फर्क नहीं है। मुसलमान लोकतान्त्रिक राजनीति से खुद को अलग नहीं कर रहे हैं।

भारतीय मुसलमानों की राजनीतिक तस्वीर को समझने के लिये जरूरी है कि इन टूटते मिथकों के साथ-साथ हम दो बड़े सच को भी जोड़ लें। सच्चर कमिटी की रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिम न सिर्फ हाशिये पर हैं, शिक्षा रोज़गार, आवास और आर्थिक तौर पर भी उनसे भेदभाव किया जाता है। दूसरा एक बड़े सच से रूबरू कराया है प्रोफेसर इकबाल अंसारी ने। इन्होंने मुस्लिम सांसदों और विधायकों का आकलन किया। इनके मुताबिक राज्य स्तर पर भी मुस्लिम का प्रातिनिधित्व अपनी आबादी के अनुपात से आधे से भी कम था।

अगर हम इन मिथकों और सच को एक साथ रख लें तो हम मुसलमानों की राजनीतिक त्रासदी से रूबरू होते हैं। भारत के मुसलमान की हालत अमेरिका में अश्वेतों की तरह है। रिपब्लिकन उनके बारे में इसलिये नहीं सोचते क्योंकि वो जानते हैं कि उनका वोट उन्हें नहीं मिलेगा। डेमोक्रेट इसलिये उन्हें भाव नहीं देते क्योंकि उन्हें भरोसा है कि वो उन्हें ही वोट देंगे। मुस्लिम के आस पास बुने इस मिथकों के मकड़जाल ने उन्हें राजनितिक बंधक बना दिया है। पहले कांग्रेस उन्हें बंधक मानकर चलती थी, आज कांग्रेस के साथ-साथ समाजवादी पार्टी और आरजेडी जैसी पार्टियां भी यही सोचती हैं। दरअसल,मुसलमान को साधारण बताने और उनको बंधक बताने के बीच गहरा रिश्ता है। मुसलमान वोटर की राजनितिक मुक्ति के लिये उन्हें मिथकों के इस मकड़जाल से बाहर निकल कर देखना होगा। एक आम हिन्दुस्तानी वोटर की तरह।

इन सब के बीच मौजूदा चुनाव मुसलमानों के लिये राजनीतिक मुक्ति का एक नया दरवाजा खोलता है। अब मुस्लिम वोटर पहले से मौजूद पार्टियों से इतर नए विकल्प तलाश सकता है। असम मे एयूडीएफ कांग्रेस को चुनौती दे रही है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के सामने मिल्ली काउंसिल है। बिहार में पसमांदा मुस्लिम राजनीति आरजेडी के लिये परेशानी का सबब है। केरला मे इंडियन मुस्लिम लीग के सामने पीडीपी है। इसमें कोई शक नहीं है कि ये चुनौती कमोबेश सांप्रदायिक राजनीति के भीतर से आ रही हैं। ये विकल्प अक्सर बहुत मौकापरस्त पार्टियों के जरिए आ रहे हैं। बहुत दिन तक बने रहने की संभावना नहीं है लेकिन ये नए विकल्प दीर्घकाल में मुसलमान वोटर को बाकी समुदायों की तरह इस लोकतान्त्रिक मुकाबलों मे अपने पांव पर खड़े होने में मदद जरूर करेंगे।

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