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राज शेखर
Friday , December 28, 2012 at 14 : 44

अभिजीत-राहुल क्यों, शर्मिष्ठा-प्रियंका क्यों नहीं?


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सांसद अभिजीत मुखर्जी का मलाल जायज है। प्रदर्शनकारी महिलाओं को \'डेंटेड\' और \'पेंटेड\' तो उन्होंने बताया, मीडिया बार-बार उनके \'प्रेसीडेंट\' पापा को क्यों बीच में घसीट रहा है। और नाश हो इस सोशल मीडिया का जहां ऐसे-ऐसे जुमले भी उछले कि \' डैडी मुझसे बोला तू .....\'। अगर आपने आमिर खान की \'डीके बोस\' वाली क्रांतिकारी फिल्म देखी है तो बताने की जरूरत नहीं कि इसके आगे के अल्फाज क्या हैं।

लेकिन अभिजीत बाबू मीडिया क्या करे आप जैसों का, जिनकी उपलब्धि ही उनका युवराज होना है। जितना दयनीय आपका बयान था उससे दयनीय थी आपकी सफाई। यूपी-बिहार का \'थेथर से थेथर\' नेता भी सफाई में आपसे बेहतर बयान देता। बावजूद इसके कि वो माफी ही मांग रहा होता। ऐसे में सिर्फ सांसद अभिजीत मुखर्जी कह कर आपका परिचय कराना बे-मानी है। ये तो बताना ही पड़ेगा कि दरअसल आप श्रीमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के सुपुत्र हैं। मैं उन लोगों से असहमत हूं जो कहते हैं कि प्रणब दा राजनीति में इस कदर मशगूल रहे कि बच्चों को वक्त ही नहीं दे पाए। अगर ऐसा ही होता तो जिस समझदारी से आपकी बहन ने आपके बयान से लगे \'डेंट\' को \'पेंट\' किया वो संभव नहीं था। यहां तक कि आपकी ओर से माफी भी मांग ली। और ये कहकर प्रेसीडेंट पिता की प्रतिष्ठा भी बचाई कि \'पापा भी इससे शर्मसार होंगे\'।

शर्मिष्ठा में आपके मुकाबले संवेदनशीलता भी ज्यादा है और समझदारी भी। वो नौजवानों के इस गुस्से को शुरू से समझ रही हैं और अपने दायरे में एड्रेस भी कर रही हैं। आपके डेंटेड बयान के बाद भी उन्होंने माना कि ये बहुत दिनों से पकता गुस्सा था जो लावे की तरह फू़ट पड़ा है। लेकिन मेरा सवाल और है। एक ओर आप हैं जो एक ओछा बयान देकर कायदे से उस पर सफाई भी नहीं दे पाते, और दूसरी ओर एक बहन है जो आपके बयान के ओछेपन पर माफी भी मांगती है और जनता के गुस्से को जायज ठहरा कर उससे सरोकार भी कायम करती है।

फिर क्या ये प्रणब बाबू की गलती नहीं जो उन्होंने जांगीपुर की अपनी संसदीय सीट विरासत में आपको सौंप दी? जब शर्मिष्ठा राजनीति में बाकायदा उतरे बगैर आपसे बेहतर हैं तो आपकी जगह वो क्यों नहीं? अभिजीत बाबू कानून तो शायद हम आप जैसे सांसदों से बदलवा भी लें, आपकी सोच को कैसे बदलेंगे? और ये सोच, ये मर्दवादी जेहनियत हमारी पूरी सियासी जमात की बीमारी है; जिसकी जड़ें हमारे समाज के भीतर गहरी पैठी हैं। विरासत बेटे को ही फिर वो चाहे कितना ही बीमार क्यों न हो। और सुनिए अभिजीत बाबू , आप अकेले युवराज नहीं हैं। आपसे पहले तो कांग्रेस के युवराज हैं। पार्टी की चाटुकार चेतना उन्हें यूथ आइकन मानती है और दिल्ली की सड़कों पर प्लेकार्ड लिए नौजवान पूछते फिर रहे हैं कि देश का युवा यहां है, राहुल गांधी कहां है?

राहुल बाबा अन्ना के आंदोलन में आपकी गैरमौजूदगी इतनी नहीं अखरी थी जितनी इस बार अखरी (वैसे क्रिसमस और न्यू ईयर की छुट्टियां कहां बिता रहे हैं। गुजरात दौरे की थकान भी काफी होगी न!) अन्ना के आंदोलन के पीछे राजनीति थी मान लिया, लेकिन इस स्वत: स्फूर्त आंदोलन में तो राजनीति करने और सीखने के पूरे अवसर थे राहुल बाबा। इस भीड़ का कोई नेता नहीं था, आप ही बन जाते! आप भी मां सोनिया की तरह खुद को सरकार से \'डिटैच\' कर त्वरित कार्रवाई की मांग लेकर सड़क पर उतर जाते।

आपके बस का नहीं है... ठीक है, मगर जिसके बस का है उसे तो करने दो बाबा! बहुत छोटे-छोटे मौकों पर बहन प्रियंका ने अहसास कराया है कि वो आपसे बेहतर राजनीति कर सकती हैं। विरोधियों को आपके मुकाबले ज्यादा बेहतर जवाब दे सकती हैं। आपसे बेहतर ढंग से जनता के जख्मों को सहला सकती हैं। ये वो भावुक प्रलाप नहीं है कि प्रियंका में दादी इंदिरा की छवि दिखती है। मोदी ने कांग्रेस को 125 साल की बुढ़िया कहा-प्रियंका ने तमक कर पूछा मैं बुढ़िया दिखती हूं? वरुण के साथ रिश्ते का अहसास है - इसलिए बहन का बड़प्पन दिखाते हुए \'भड़काऊ बयान\' पर उन्हें गीता पढ़ने की नसीहत दी। अरे पिता की पीठ में छुरा भोंकने की अपील कर कैसे अमेठी और रायबरेली में चुनावी हवा बदली दी, भूल गए क्या?

इसे ही तो राजनीति कहते हैं राहुल बाबा, और लगता नहीं कि ये आपके बस का है! मगर यहां भी सवाल सोच का ही है। जो आपके बस का नहीं है उसका फंदा बार-बार आपके गले डाला जा रहा है। और जिसकी नसों में बहता लहू शुद्ध सियासी है उसे एक अदद \'बहन\' और \'बीवी\' बन कर सिर्फ बच्चे पालने पड़ रहे हैं। उसकी सियासत सिर्फ अमेठी और रायबरेली तक महदूद कर दी गई है। मां और भाई के दफ्तर की \'केयर टेकर\' यही न!

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