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Friday , February 12, 2010 at 12 : 30

आई एम हर्ट, वी ऑर आल्सो हर्ट...


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\"मुझे इस बात से तकलीफ पहुंची कि 2008 में देश का सबसे सीनियर चीफ जस्टिस होने के बावजूद मुझे सुप्रीम कोर्ट नहीं भेजा गया।\" सत्रह साल तक हाईकोर्ट के जज रहने के बाद पद पर अपने आखिरी दिन दिल्ली के चीफ जस्टिस अजित प्रकाश शाह ने ये बात कही। इस बयान में सिर्फ उनका दुख नहीं झलकता, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत के जज बनने के पैमानों पर भी बड़ा सवाल उठता है। कई बार देश के अलग-अलग हलकों से सुप्रीम कोर्ट का जज बनने यानि कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल उठता रहा है। लेकिन देश के बेहतरीन जज कहे जाने वाले जस्टिस शाह की पीड़ा इस सवाल को और ज्यादा गंभीर बना देती है। जस्टिस शाह ने यहां तक कहा कि अगर किसी जज को सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बनाया जाता, तो कॉलेजियम को कम से कम उन कारणों को जरूर बताना चाहिए जिसकी वजह से जज की पदोन्नति नहीं हुई।

ऐसा नहीं है कि जस्टिस शाह की काबलियत पर कभी कोई सवाल उठा हो। महाराष्ट्र के शोलापुर जिले में जन्मे जस्टिस शाह के दादा, पिता और चाचा न्यायिक क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। उनके पिता भी मुंबई हाईकोर्ट के जज रह चुके हैं। करीब 15 साल तक मुंबई हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने के बाद वो साल 1992 में मुबई हाईकोर्ट के जज बने। 17 साल के बतौर जज अपने कैरियर में वो मुंबई के बाद मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और फिर दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहे। इस दौरान उन्होंने कई ऐतिहासिक फैसले दिए, जिन पर पूरे देश की निगाहें ठहरी हुई थीं। क्या कभी कोई सोच सकता था कि भारत जैसे देश में समलैंगिक संबंधों को कभी कानूनी मान्यता मिल सकेगी। लेकिन ये हुआ और जस्टिस ए.पी. शाह की कानूनी काबलियत के कारण हुआ। खुद जस्टिस शाह के शब्दों में ये केस पब्लिक मोरेलिटी और न्याय के बीच संघर्ष का बेहतरीन उदाहरण था। लेकिन उन्होंने वही किया जो संवैधानिक दृष्टि से सही था। उनके इस फैसले ने देश के तीस लाख समलैंगिकों को एक पहचान दी। ऐसी पहचान जिसके लिए वो अब तक तरस रहे थे।

यही नहीं, खुद हाईकोर्ट के जज रहते हुए उन्होंने देश के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को आरटीआई कानून के दायरे में ला खड़ा किया। अपने इस ऐतिहासिक फैसले में उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी जरूरत पारदर्शिता है और जजों को भी पारदर्शिता बरतनी होगी। जस्टिस शाह ने कहा कि सूचना के अधिकार का कानून देश की सभी पब्लिक अथॉरिटिज पर लागू है और देश की सर्वोच्च अदालत यानि सुप्रीम कोर्ट भी पब्लिक अथॉरिटी है क्योंकि वो भी इसी देश के संविधान के तहत बनी है। इस फैसले का असर है कि आज देश के सुप्रीम कोर्ट और तीन हाईकोर्ट के जजों ने अपनी संपत्ति का विवरण वेबसाइट पर डाल दिया है। कई अन्य हाईकोर्ट भी इस प्रक्रिया में लगे हुए हैं। इन फैसलों से ये तो साफ है कि जस्टिस शाह अपने समकालीन जजों में सर्वश्रेष्ठ कहे जा सकते हैं। देश के बेहतरीन वरिष्ठ वकील फली एस. नरीमन के शब्दों में वो देश के वर्तमान जजों में सर्वश्रेष्ठ हैं। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण कहते हैं कि ये देश का दुर्भाग्य है कि जस्टिस ए.पी. शाह जैसे जज सुप्रीम कोर्ट नहीं जा पाए।

अपने कैरियर के अंतिम दौर में जस्टिस शाह को पता था कि वो सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सकेंगे। लेकिन कभी इसका असर उनके काम पर देखने को नहीं मिला। दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहते हुए उन्होंने आर्बिट्रेशन सेंटर की शुरुआत की, जहां व्यावसायिक विवादों का हल होता है। देश के बड़े व्यावसायिक संगठन एसोचैम ने दिल्ली हाईकोर्ट के आर्बिट्रेशन सेंटर के साथ समझौते पत्र पर हस्ताक्षर किए। इस आर्बिट्रेशन सेंटर के कारण अदालतों पर पड़ने वाले कामकाज का बोझ काफी हद तक कम हुआ। पीरामल ग्रुप आफ इंडस्ट्रीज की स्वाति पीरामल का कहना है कि दिल्ली हाई कोर्ट के आर्बिट्रेशन सेंटर से वो इतना प्रभावित हैं कि अपनी कंपनी के किसी भी विवाद के लिए वो कभी देश की किसी अदालत में नहीं जाएंगे। उनकी कंपनी के सभी केस आर्बिट्रेशन सेंटर में ही आएंगे। जस्टिस शाह सिर्फ एक अच्छे जज नहीं, बल्कि दूरदर्शी भी हैं। रिटायरमेंट से करीब डेढ़ महीना पहले ही उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में ई-कोर्ट शुरू की। आज दिल्ली हाईकोर्ट में दो ई-कोर्ट चल रही हैं और तीसरी शुरू होने वाली है। यही नहीं, निचली अदालत में भी प्रयोग के तौर पर एक ई-कोर्ट शुरू की गई है। इन ई-कोर्टों में कागज का इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि कंप्यूटर के जरिए ही वकील अपनी दलीलें पेश करते हैं और कंप्यूटर के जरिए ही जज अपने निर्देश लिखवाता है। इस ई-कोर्ट के कारण ना सिर्फ कागज की बचत होगी, बल्कि रिकार्ड को संभाल कर रखना बेहद आसान हो जाएगा और समय की बचत होगी, वो अलग।

जस्टिस शाह से आखिर मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि उनके सुप्रीम कोर्ट ना पहुंचने से सिर्फ उन्हें ही तकलीफ नहीं पहुंची है, मुझ जैसे आम आदमी समेत इस देश के करोड़ों लोगों को दुख पहुंचा है। बतौर चीफ जस्टिस आपने अपने आखिरी दिन कहा कि अब आप कोई पद स्वीकार नहीं करेंगे और सामाजिक कार्यों में अपना समय देंगे। ऐसे में उम्मीद यही है कि आपका ये सफर किसी पद का मोहताज भी नहीं है और न्यायिक क्षेत्र को आपके अनुभव का लाभ मिलता रहेगा।

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विक्रांत यादव के बारे में कुछ और

दिल्ली विश्वविद्यालय से साल 1995 में बी-कॉम (पास) स्नातक। दो साल तक दिल्ली से प्रकाशित एक मैगजीन "एक्सप्रेस न्यूज" में बतौर रिपोर्टर काम किया। साल 1999-2000 तक भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। उसके बाद छह महीने तक अमर उजाला नोएडा में काम किया। जनवरी 2001 से जनवरी 2005 तक दैनिक जागरण दिल्ली के लिए रिपोर्टिंग की। फरवरी 2005 से पहले चैनल 7 और अब आईबीएन 7 में रिपोर्टिंग टीम का हिस्सा हूं।
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