दिल्ली के जामा मस्जिद पर बकरे बिक रहे थे। एक से एक मोटे ताज़े। सबकी अलग-अलग कीमत थी। किसी का नाम शाहरुख़ खान किसी का नाम सलमान खान। खूबसूरत और हट्टे कट्टे। पैरों में घुंघरू और दाढ़ी में रंग लगे बकरों की कीमत कसाब यानी कसाई लोग चीख-चीख कर बता रहे थे। कई जगह एक से ज्यादा खरीदार होते तो बोली लगती कुछ कुछ आईपीएल की तरह। कई जगह लोग एक से ज्यादा बकरे भी खरीद रहे थे कि दो-दो बकरों की लड़ाई करवायेंगे। मज़ा आयेगा और कुछ पैसे भी बन जायेंगे। 10 हज़ार एक, दस हज़ार दो, और दस हज़ार तीन। ये लो साहब चर्बीदार 80 किलो का शाहरुख़ खान आपका हुआ। अमीर मालिक के हाथों खरीदे जाने पर बकरा भी खुश होता कि मालिक अमीर है जब तक लड़वायेगा तर माल भी खिलायेगा।
रामपुर और मुल्तानपुर के बकरों की कीमत सबसे ज्यादा थी। रामपुर वाले बिक गए और मुल्तानपुर वाले नहीं बिके। मुल्तानपुर का कसाब नाराज़ हो गया। अगली बार से दिल्ली न आने की धमकी देने लगा। लोगों ने समझाया कि मियां आप हैं तो मुल्तानपुर के लेकिन ज़बान आपकी बड़ी ख़राब है। ये जो आप बात बात में गाली देते हैं और चाकू निकाल लेते हैं, गोली और बम मारने की बात करते हैं, इसलिए वर्ल्ड चैम्पियन होने के बावजूद आपके बकरों को कोई खरीदार नहीं मिल रहा। इसलिए मियां पहले ज़बान सुधारो और उसके बाद देखो कि तुम्हारे बकरे भी कैसे बिकते हैं। लेकिन वो नहीं माना। कहने लगा कि सवाल ही नहीं पैदा होता है। अब दिल्ली नहीं आऊंगा, दिल्ली वालों को बकरों कि समझ ही नहीं है, बुलाकर बेइज्ज़ती करते हैं। जब खरीदना ही नहीं था तो बुलाया क्यों। कहने लगा कि अब तो मैं यहां मुर्गे भी नहीं बेचूंगा और जो मुर्गे आने वाले थे उन्हें रास्ते में ही रोक दूंगा। हमारे रिश्ते ऐसे नहीं सुधर सकते जब तक हमारे बकरों और मुर्गों की बाज़ार में इज्ज़त नहीं। कसाब यानी कसाई जोर से चिल्लाकर बोला अगली बार कश्मीर जाकर बेचूंगा। वहां बिक जायेंगे!
लोग सुनकर अवाक रह गए। सूफियों की एक धरती से सूफियों की दूसरी धरती पर जाकर ये माहौल ख़राब करेगा। लोग बोले भाई ये तो बाज़ार है इसमें लोग अपनी पसंद से सामान खरीदते हैं तुम उनपर ये जोर कैसे डाल सकते हो कि हमारा सामान ही खरीदो? कहने लगा कि पड़ोसी हूं मेरा हक बनता है।
लोगों ने समझाया कि ये तो धंधा है मियां धंधे में मुनाफा देखा जाता है इस तरह से बाज़ार में दहशत फैलाओगे तो खरीदने वाला डर जायेगा। आखिर जो तुमसे बकरे खरीद रहा है उसे भी तो बकरों की लड़ाई करवानी है और पैसा कमाना है। तुम दहशत फैलाते हो और फिर कहते हो कि बकरे नहीं बिक रहे और फिर धंधेबाज़ तो यही देखेगा न कि उसे मोटी कमाई कहां से हो रही है! या फिर यह देखेगा कि पड़ोसी मेरा भूखा है सबसे पहले उसका पेट भर देते हैं।
लोगों ने कहा कि ऐसा करो इन धंधेबाजों को छोड़ो और सरकार के पास जाओ। कहो कि बकरों कि एक निष्पक्ष प्रदर्शनी लगाई जाए। पूरी तरह से सरकारी। इसका नाम रखो दोस्ती सिरीज़। ऐसा पहले हो चुका है हालांकि उसके बाद भी तुम्हारी ज़बान ठीक नहीं हुई। लेकिन एक बार फिर कोशिश करने में क्या हर्ज है। जब बकरों के न बिकने पर रिश्तों की बात करने लगे हो तो अपनी तरफ से पहल करो और सरकारी क़दम उठाओ। लोगों का भरोसा जीतो।
जानवरों की खरीद तो फरोख्त तुम्हारा खानदानी पेशा है। तुम्हारे परदादा की पाली हुई बकरियों का दूध तो गांधी से लेकर सीमान्त गांधी तक सब पीते थे। लेकिन फिर उसके बाद न जाने क्यूं कठमुल्लों के कहने पर तुम जिन्नातों पर यकीन करने लगे और एक बार किसी एक जिन्न के चक्कर में पड़ कर तुम हमसे अलग हो गए और फिर सारे रिश्तों को ख़राब कर डाला।
तुम्हारे एक चाचा ने एक बार कारगिल में जंगली भैंसे भेज दिए और उसने बर्फ से ढंके खूबसूरत पहाड़ों को गन्दा कर दिया। एक बार तुम्हारे मामा घोड़े बेचने दिल्ली आये थे लेकिन संसद भवन पर घोड़ों ने लीद कर दी। उस लीद को अभी तक साफ़ नहीं किया जा सका है। तुम्हारे एक मौसेरे भाई ने तो हद ही कर दी। वो जंगली भेड़ियों का धंधा करने लगा और हाल ही में समुन्दर के रास्ते मुंबई पहुंच गया। कुछ होटलों में घुस गए कुछ मकानों में कुछ रेलवे स्टेशन पर। क्या कोहराम मचाया था उन जंगली भेड़ियों ने। ऊपर से तुम्हारे मौसा कहते हैं कि क्या करूं जी बेटे ने जंगली भेड़िये पाल लिए हैं, बड़ी तेज़ी से बच्चे पैदा कर रहे हैं और हमारे काबू से बाहर हो रहे हैं, कभी भी कहीं भी घुस जाते हैं, एक बार फिर घुस जाएं तो ताज्जुब मत करना।
अब बताओ कोई कैसे भरोसा करेगा। इसलिए पहले कुछ ऐसा करो कि भरोसा बढ़े। और हां, 28 फरवरी से दिल्ली में जो मुर्गों की लड़ाई का वर्ल्ड कप होने वाला है उसमें अपने मुर्गों को आने देना नहीं तो अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारोगे।














कमेंट्स
5