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आनंद मोहन श्रीवास्तव
Tuesday , February 23, 2010 at 14 : 07

अमर का नया पैंतरा


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अगर अपनी नई राजनीतिक दूकान चमकाना है तो उन सबको साथ लेकर चलना होगा जिन्हें कभी साथ लेकर नहीं चले। जब बेहतर ढंग से चलती-फिरती दूकान बंद हो जाये तो नई दूकान को चलाने के लिए बेजान हो चूके उन इलाकों के विकास के लिए गरजना होगा जिन्हें कभी देखकर भी अनदेखा कर दिया था। बेजान हो चूके उन इलाकों के विकास के लिए जब कुछ कर सकने की क्षमता थी, सभी संसाधन भी थे, तब कुछ नहीं किया और न उन इलाकों के लिए धरना-प्रदर्शन किया, न ही संसद और विधानसभा के सामने गरजे। दिल्ली में संसद के करीब लगभग कुछ ऐसा ही नज़ारा था, अपनी नई राजनीतिक दूकान का शटर खोले अमर सिंह गरज रहे थे, उनकी खुल चुकी नई दूकान से तेलंगाना, बुंदेलखंड और पूर्वांचल के दुख को बेचकर अपनी इस दूकान में चार चांद लगाने की कोशिश की जा रही थी।

इस दूकान में उन सब लोगों को इकट्ठा किया गया था जिन्हें पहले अमर सिंह लिफ्ट नहीं देते थे। लेकिन राजनीति की नई दूकान को चलाना है तो उन सबको साथ लेना पड़ेगा जो दूकान की शक्ति बढ़ा सकें। लोगों का भला हो या न हो इससे उनका कोई सरोकार नहीं लेकिन उनका राजनीतिक कद कैसे बढ़ेगा यही सवाल उन्हें परेशान कर रहा है।

दिल्ली में संसद से कुछ दूरी पर अमर सिंह गरज रहे थे कि तेलंगाना के लोग समस्याओ से जूझ रहें हैं, बुंदेलखंड के किसान भूखों मर रहे हैं, पूर्वांचल पिछड़ता जा रहा है, केंद्र एवं राज्य सरकारें राजनीती कर रहीं हैं, इन इलाकों के लोगों के साथ धोखा कर रहीं हैं। जब किनारे कर दिए गए तो दुःख क्या होता है? पिछड़ापन क्या है? लोगों का विकास कैसे होगा? सरकारें आम जनता के विकास के लिए काम नहीं कर रहीं? इन तमाम सवालों को अमर सिंह ने अपनी नई दूकान में सजा लिया है। अब वो इन्हीं सवालों को निचोड़कर कोई ऐसी जड़ी-बूटी बनाने के प्रयास में लग गए हैं जिससे उनका राजनीतिक कद बढ़ सके। चौंकाने वाली बात ये थी कि जिस पार्टी को अमर सिंह साम्प्रदायिक दल कहते थकते नहीं आज उसी दल के एक नेता को अपनी नई दूकान का हिस्सा बनाये हुए थे।

बुंदेलखंड के किसान भूखों मर रहे थे। साल 2004 से 2007 तक बुंदेलखंड के सैकड़ों किसान भूख के चलते आत्महत्या कर चूके थे। तब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार थी, उस समय इस सरकार ने किसानों को सूखा राहत के नाम पर तीन रुपये, पांच रुपये, दस रुपये और सत्रह रुपये के चैक दिए थे। किसान अनाज के एक-एक दाने के लिए तरस रहे थे। बुंदेलखंड में पलायन बढ़ गया, किसान अपना गांव छोड़कर काम की तलाश में शहर की ओर भाग रहे थे। तब अमर सिंह मुलायम सिंह के सबसे करीबी और समाजवादी पार्टी के संकट मोचक माने जाते थे।

जब मीडिया में ये सवाल उठने लगे तो यही अमर सिंह हैं जो कहा करते थे किसानों की दशा बिलकुल ठीक है, समाजवादी पार्टी की सरकार उन्हें सभी सुविधाएं दे रही है। तेलंगाना इलाके की स्थिति काफी सालों से ख़राब है। रोजगार की दृष्टि से और आर्थिक दृष्टि से तेलंगाना कल भी पिछड़ा था और आज भी है। जब दूकान पर भीड़ थी, शासन में थे, अपने नेता के करीबी थे, समाजवादी पार्टी के बड़े नेता थे, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के साथ-साथ देश के कई इलाकों में उनका अपना राजनीतिक अखाड़ा था लेकिन तब अमर सिंह को तेलंगाना के लोगों का दुख नहीं दिख रहा था, तब बुंदेलखंड के किसानों की फिक्र नहीं हुई और होती भी क्यों, उस समय शासन उनका था और उनका सब कुछ ठीक चल रहा था, उस समय उनकी राजनीतिक दूकान पर सबसे ज्यादा भीड़ होती थी। उस दौरान पूर्वांचल में हैजा फैला था, यूपी का यह इलाका तमाम समस्याओं से जूझ रहा था और आज भी जूझ रहा है। पूर्वांचल इलाके के विकास के मुद्दे पर काफी हो-हल्ला हुआ लेकिन अमर सिंह की राजनीतिक दूकान का शटर कभी इन इलाकों के लिए नहीं खुला जब कि उस समय अमर सिंह चाहते तो इन इलाकों के लिए बहुत कुछ कर सकते थे खासकर बुंदेलखंड के किसानों की समस्यायों को सुलझा सकते थे, पूर्वांचल की दशा को सुधारने की दिशा में काम कर सकते थे लेकिन अमर सिंह ने ऐसा नहीं किया और अमर सिंह द्वारा ऐसा नहीं करना इस देश की राजनीती में कोई नया नहीं है, मगर नेताओं के लगातार बदल रहे इन कदमों से देश की आम जनता को हर बार एक नयी चोट तो लगती ही है।

अपनी चलती फिरती राजनीतिक दूकान से अपना एवं अपनों का विकास होता रहे तो आम जनता से कोई सरोकार नहीं लेकिन जब अपनी दूकान बंद हो जाये, अपना राजनीतिक कद ख़त्म होने लगे तो एक नयी दूकान खोल कर बैठ जाओ और उन सबको शामिल कर लो जिनके सहारे अपनी नयी दूकान पर भीड़ इकट्ठा किया जा सके, नयी दूकान को चलाने के लिए संसद और विधानसभा के सामने फट पड़ो , आम जनता के दुख के बहाने ऐसा गरजो कि इस गरज से सत्ताधारी दल भी कुछ सोचने पर मजबूर हो जाये। भला हो अमर सिंह की नयी दूकान का।

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आनंद मोहन श्रीवास्तव के बारे में कुछ और

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और परास्नातक करने के बाद जयपुर से प्रकाशित दैनिक नवज्योति नामक डेली न्यूज़ पेपर से पत्रकारिता की शुरुआत। फिर दैनिक आज में काम किया। सबसे बेहतर और लम्बा अनुभव (आठ साल) दैनिक जागरण में काम करके मिला। आदिवासी समाज पर लगभग बीस एपिसोड लिखे। उसके बाद आईबीएन7 से जुड़े। बुंदेलखंड की भूख पर खास स्टोरियां कीं।
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