भूपेश कुमार
Wednesday, December 15, 2010 at 17 : 36

पंजाब टू डेल्ही वाया लंदन


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\'धरती पर ऐसी कोई ताकत नहीं है जो उस विचार को रोक सके जिसका वक्त आ गया हो\' - मशहूर चिंतक विक्टर ह्यूगो ने ये विचार जिस भी संदर्भ में रखे हों लेकिन वित्तमंत्री के रूप में अपने पहले बजट भाषण में मनमोहन सिंह ने जब इन शब्दों को संसद में रखा तो संदर्भ और मकसद बिल्कुल साफ था। वो एक ऐसे दौर की तरफ इशारा कर रहे जहां सरकार अपने आपको व्यापारी या कारोबारी की वजाय नीति निर्माण और उनके सुचारू संचालन तक ही सीमित रखेगी। वो उस वक्त की राजनीति को ये समझाने में कामयाब भी हुए। धनकुबेरों की तिजोरियां खुलने लगीं और देश की आधारभूत संरचना के कायाकल्प का काम जोर पकड़ने लगा। फिर वो चाहे सड़क हो या पानी, रेल हो या हवाई जहाज, संचार हो या टेक्नॉलोजी, स्वास्थ्य हो या फिर शिक्षा, पैसा पानी की तरह बहने लगा। नतीजा सामने है, चंद्रशेखर के जमाने में विदेशी कर्ज चुकाने के लिए जिस भारत को 67 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था मनमोहन सिंह के जमाने में वही भारत 200 मीट्रिक टन सोना खरीदकर ये बता रहा था कि वो खुले बाजार के आसमान में ऊंची उड़ान भर रहा है।

करीब साढ़े आठ फीसदी की वृद्धि दर, करीब सवा अरब उपभोक्ता, तेजी से बढ़ता मिडिल क्लास, अनिश्चित कानून, लचीला लोकतंत्र और संभावनाओं का एक बड़ा क्षेत्रफल जहां विकास अभी भी सिर्फ एक नारा है, ये कुछ ऐसे कारक हैं जो एक सौदागर के लिए मुफीद भी हैं और चुनौती भी। मुफीद इसलिए कि खरीददारों की भीड़ है तो बिक्री भी खूब होगी और चुनौती ये कि दुकानों की भीड़ में अपनी दुकान को न सिर्फ अव्वल रखना है बल्कि सिकुड़ती जगह में उसे फैलाना भी है। तब एक नई व्यवस्था जन्म लेती है- एनक्रोचमेंट यानी येन केन प्रकारेण अपनी हदों को फैलाने की व्यवस्था और बाजार के सारे प्रतियोगी इस व्यवस्था के अंदर अपना खेल खेलते हैं। खुली अर्थव्यवस्था में ये खेल राष्ट्र के जल, वायू और जमीन पर कब्जे को लेकर है और इस खेल में जीत उसी की होती है जो एक अदृष्य मंडली से पार पा ले। खादी, व्हाइट कॉलर, काला कोट, खाकी और कलम(कैमरा) की अदृष्य मंडली। अब व्यापारी अपना सामान बेचे या फिर इन सबसे निबटे ये एक बड़ा सवाल है। इस सवाल का जवाब है मिडलमैन - सौदागर और मंडली के बीच सौदा कराने वाला सौदेबाज। यही व्यवस्था नीरा राडिया को जन्म देती है।

पंजाब की नीरा शर्मा से लंदन की नीरा राडिया और भारत में आकर अपने नाम के अंग्रेजी हिज्जे में एक अतिरिक्त आई (NIIRA) जोड़कर दिल्ली की सत्ता के गलियारे और मुंबई के कॉरपरेट क्लाउट में कलाबाजी दिखाने की कहानी जितनी मैली है उतनी ही अद्भुत भी। ये कहानी सिर्फ नीरा की नहीं है बल्कि एक ऐसी कड़ी की है जो सामाजिक सत्ता के अलग-अलग किरदारों को आपस में जोड़ती है और एक रिश्ते में पिरोती है।

अप्रैल 1993 में नरेश गोयल की नव निर्मित कंपनी जेट एयरवेज के पहले दो विमान जब भारत पहुंचे तो उनको लेने जेआरडी टाटा गोयल के साथ एयरपोर्ट पहुंचे। ऐसा लगा कि टाटा ने 1932 में टाटा सन्स(1938 में टाटा एयरलाइंस) के साथ भारतीय आसमान में जिस दौड़ का आगाज किया था उसका वेटन अब नरेश गोयल को थमा दिया था। टाटा एयरलाइंस, जिसको अब तक एयर इंडिया का सरकारी नाम मिला चुका था उसका भारतीय आकाश पर एकछत्र राज था। वित्त वर्ष 1990-91 में एयर इंडिया करीब साढ़े 4 करोड़ डॉलर($4.27 मिलियन) के फायदे में चल रही थी। 1991 में नरसिम्हा राव सरकार ने एविएशन सेक्टर को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने का फैसला किया। दमानिया एयरवेज और ईस्ट-वेस्ट एयरलाइंस जैसी प्राइवेट कंपनियां मैदान में उतरी लेकिन प्रभाव न जमा सकी. तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री माधव राव सिंधिया ओपन स्काई पॉलिसी लेकर आए और विदेशी निवेश के लिए भी रास्ता साफ हो गया। ऐसे में एनआरआई नरेश गोयल 1993 में जेट एयरवेज लेकर आए वो भी 40 फीसदी विदेशी हिस्सेदारी के साथ और साझेदार थे कुवैत एयरवेज और गल्फ एयर। पहले ही साल में (1994-95) करीब 60 लाख डॉलर($6 मिलियन) के मुनाफे के साथ गोयल ने बता दिया कि वो यहां लंबे समय के लिए हैं। नब्बे के दशक के मध्य तक करीब 8 प्राइवेट एयरलाइंस बाजार में आ चुकी थीं। अब ताकतवर विदेशी एयरलाइंस की नजर भी भारतीय आकाश पर थी। ऐसे में सिंगापुर एयरलाइंस की पीआर कंसल्टेंट बनकर नीरा राडिया ने भारत में कदम रखे।

नीरा लंदन के गुजराती मूल के व्यापारी जगत राडिया से शादी रचाकर नीरा राडिया बनी थी। उनको तीन बच्चे हुए और उसके बाद तलाक भी। इधर सिंगापुर एयरलाइंस भारत में संभावनाएं टटोल रही थी कि ऐसे में नरसिम्हा राव ने रतन टाटा को प्राइवेट एयरलाइंस के लिए न्योता दिया। जवाब में टाटा ने सिंगापुर एयरलाइंस के साथ मिलकर लाइसेंस के लिए आवेदन किया भी, लेकिन तत्कालीन उड्डयन मंत्री गुलाम नबी आजाद ने ये कहकर टाटा पर विराम लगा दिया कि हमारे पास अतिरिक्त एयरलाइंस के लिए आवश्यक जगह और आधारभूत सुविधाएं नहीं है जबकि जेट एयरवेज और मोदीलुफ्थ एयरलाइंस जैसी 6-7 एयलाइंस को इजाजत दे दी गई थी। यहां असल खेल राजनीति का था। गुलाम नबी आजाद तब शरद पवार के करीबी माने जाते थे और पवार-गोयल की दोस्ती जगजाहिर थी। गोयल नहीं चाहते थे कि टाटा जैसा बड़ा नाम अपनी दुकान खोले और उनके बढ़ते मुनाफे पर सेंध लगाए। इसी दौरान बतौर सिंगापुर एयरलाइंस की कंसलटेंट नीरा राडिया की पहचान टाटा ग्रुप से हुई।

सिंगापुर एयरलाइंस छोड़कर राडिया ने सहारा एयर का रुख किया और बतौर लेजन ऑफिसर उनकी पहचान एमडी उत्तम कुमार बोस से हई। लेकिन बोस का सहारा छिन गया और राडिया ने उनको लपक लिया। फिर शुरू हुई बंद पड़ चुकी मोदीलुफ्त को मैजिक एयर में बदलने की नाकाम कोशिश। कहते हैं कि नरेश गोयल ने प्रधानमंत्री को डोजियर तक दिया था जिसमें नीरा के लंदन की कंपनियों के साथ कामकाज में घपले का कच्चा-चिट्ठा था। अब राडिया ने एयक्राफ्ट लीजिंग कंपनियों से कम दरों पर विमान लीज पर लेने शुरू किए और नवगठित सरकारी एजेंसी एयरपोर्ट ऑथोरिटी ऑफ इंडिया से पॉर्किंग और पीक ऑवर का फ्लाइट टाइम भी आरक्षित कर लिया। लेकिन यहां भी उनको हर कदम पर रोड़े अटकाए गए।

कमोबेश यही हाल टाटा का भी था। बहरहाल 1996 में संयुक्तमोर्चा सरकार के दौर में टाटा ने सिंगापुर एयरलाइंस के साथ मिलकर फिर से नई कोशिश की। इस बार चिदंबरम के मातहत आने वाले FIPB के चेयरमैन नीलमाधव मोहंती ने तमाम दबाव के बावजूद क्लीयरेंस भी दे दी लेकिन उड्डयन मंत्री सी. एम. इब्राहीम ने ये कहकर मना कर दिया कि विदेशी एयरलाइंस का निवेश मंजूर नहीं। अंतिम वक्त पर विदेशी एयरलाइंस के निवेश सबंधी शर्तें जोड़ी गई। मजबूरन कुवैत एयरलाइंस और गल्फ एयर को भी जेट एयरवेज में अपना हिस्सा छोड़ना पड़ा। सरकार बदली तो गुजराल प्रधानमंत्री बने और उन्होंने इब्राहीम के पर कतरने के लिए तमिल मनीला कांग्रेस की जयंति नटराजन को उड्डयन मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाकर भेजा। टाटा ने अबकी बार सिंगापुर एयलाइंस की बजाय सिंगापुर इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन और अमेरिकन कंपनी AIG को 40 फीसदी का हिस्सेदार चुना लेकिन बात नहीं बनी।

गुजराल सरकार भी ज्यादा नहीं चल पाई। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की नई सरकार बनी और कर्नाटक के ही अनंत कुमार ने उड्डयन मंत्रालय की कमान संभाली। अनंत के रूप में नीरा राडिया को सरकार में एक ऐसा दोस्त मिल गया जिसकी प्रधानमंत्री तक अच्छी पहुंच थी। यहां नीरा 1 लाख रुपए के शुरुआती बजट में क्राउन एयर नाम से एक नई एयरलाइन लाने की तैयारी में लग गई तो उधर टाटा ने भी हार नहीं मानी। उन्होंने 1475 करोड़ रुपए की प्रस्तावित एयरलाइन का आवेदन सरकार के पास फिर से भेजा। राजनीति ऐसी गर्माई कि अलग-अलग पार्टियों के 50 सांसदों ने प्रधानमंत्री को इस प्रस्ताव के खिलाफ पत्र लिखे। यहां भी गोयल एंगल ने अपना काम किया क्योंकि प्रमोद महाजन की गोयल से मित्रता जगजाहिर थी और इसी मित्रता के चलते राहुल महाजन तमाम खामियों के चलते जेट एयरवेज में पायलेट भी बने रहे। अनंत कुमार तो प्रमोद के शिष्य थे तो भला वो उनसे अलग कैसे सोच सकते थे लेकिन महाजन का प्रभाव इतना था कि अनंत कुमार FIPB की मंजूरी के बावजूद क्राउन एक्स्प्रेस को टेक ऑफ न करा सके।

2001-02 में जहां नरेश गोयल की जेट एयरवेज करीब साढ़े 12 करोड़ रुपए के फायदे में थी वहीं एयर इंडिया करीब 200 करोड़ रुपए और इंडियन करीब 160 करोड़ रुपए का सरकारी नुकसान भुगत रही थीं। ऐसे में एनडीए सरकार ने एयर इंडिया की हिस्सेदारी बेचने की सोची। ब्रिटिश एयरवेज, एयर फ्रांस और रिचर्ड ब्रांसनन की गैलैक्टिक एयरवेज ने इच्छा जताई और टाटा ने पुराने पार्टनर सिंगापुर एयरलाइंस के साथ 40 फीसदी हिस्सा खरीदने के लिए आवेदन किया। राजनीतिक और मीडिया के विरोध को वजह बताते हुए सिंगापुर एयरलाइंस ने हाथ खीच लिए और टाटा को फिर टाटा कहना पड़ा। कहते हैं कि शरद पवार ने अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिखकर नरेश गोयल को अकेले बोली लगाने की इजाजत देने की गुजारिश की थी।

नीरा राडिया ने पब्लिक रिलेशन के क्षेत्र में पैर पसारने की सोची और 2001 में वैष्णवी कम्युनिकेशन नाम की कंपनी बनाई। ये वो दौर था जब टाटा ग्रुप बुरे दौर से गुजर रहा था। टाटा फाइनेंस में एक बड़ा घोटाला सामने आया और टाटा ग्रुप की इमेज को गहरा झटका लगा। इसे सुलझाने के लिए टाटा ने नीरा राडिया की सेवाएं ली और नीरा ने बेहतरीन ढंग से इस मामले को संभाला। नीरा और टाटा के बीच ये पहली सीधी डील थी। टाटा नीरा से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने टाटा ग्रुप की सभी कंपनियों के पब्लिक रिलेशन का काम वैष्णवी कम्मयुनिकेशन को सौंप दिया। नीरा के कद की लंबाई महसूस की जाने लगी थी।

बहरहाल एनडीए सरकार गई और यूपीए के प्रफुल्ल पटेल ने राजीव भवन की कमान संभाली। नीरा राडिया ने एक बार फिर मैजिक एयर नाम से घरेलू विमानन कंपनी के लिए 60 फीसदी हिस्सेदारी के साथ आवेदन किया। एएआई के चेयरमैन एस.के. नरुला से अच्छे संबंधों के बावजूद योजना को इसलिए खारिज कर दिया गया कि वो भारतीय मूल की विदेशी(पीआईओ) हैं और वो विदेशियों की तरह सिर्फ 49 फीसदी निवेश ही कर सकती हैं। राजनीति ने यहां भी लॉजिक को मात दे दी। इंडस्ट्री में राडिया के पहले से ही दुश्मन थे लेकिन टाटा के साथ आने से ये दुश्मनी और मजबूत हो चुकी थी। तो यहां पर भी पवार और पटेल ने राडिया के मैजिक को नहीं चलने दिया। बहरहाल टाटा और राडिया ने तो आकाश में उ़ड़ान भरने के अपने सपनों को विराम दे दिया लेकिन सरकारी कंपनियों एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का नुकसान हद से बाहर होता जा रहा था। नौबत यहां तक आ गई कि घाटे को कम करने के लिए कंपनियों को अपने जहाज तक बेचने पड़े। सरकार ने 2007 में दोनों कंपनियों का विलय करके नेशनल एविएशन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटिड नाम से नई कंपनी तो बना दी लेकिन महाराजा की किस्मत नहीं बदली। 2009-10 में कंपनी साढ़े 5 हजार करोड़ रुपए के नुकसान के साथ चल रही थी। प्रफुल्ल पटेल पर ये आरोप लगते रहे कि प्राइवेट लॉबी के साथ मिलकर वो सरकारी कंपनी को बर्बाद करने पर लगे हैं। एक बार फिर टाटा को इससे जोड़ने की कोशिशें जारी हैं लेकिन इस बार शायद वो ज्यादा सतर्क है या फिर दिल के कोने कहीं एक टीस है जो कभी कभार बाहर निकल आती है और कहती है कि 'एक आदमी ने मेरी सपनों की उड़ान को चकनाचूर कर दिया\' ।

.....जारी है

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