थॉमस पैन नाम के एक विचारक हुए जिन्होंने कहा कि \'किसी राष्ट्र की सत्ता का झुकाव सिविल सोसाइटी के पक्ष में होना चाहिए क्योंकि वो इंसान की स्वाभाविक सामाजिक अभिव्यक्ति है। कुछ बुद्धिजीवी समाज और सरकार को एक ही पक्ष समझते हैं जो कि सही नहीं है। समाज लोगों की ज़रूरतों से पैदा होता है जबकि सरकार जनता की आपसी होड़ या झगड़े से पैदा होती है। समाज लोगों के आपसी प्यार को जोड़कर खुशी को बढ़ावा देता है वहीं सरकार हमारे आपसी झगड़ों को दबाकर खुश करने की कोशिश करती है। पहला मेलजोल पर जोर देता है तो दूसरा भेदभाव बढ़ाती है। पहला रक्षक है तो दूसरा दंडक।\' इन थॉमस पैन को अमेरिकी क्रांति का जनक कहा जाता है। बात बात में पैन ने सरकार और सिविल सोसाइटी जैसे दो शब्दों की तुलनात्मक व्याख्या कर दी। बहरहाल, दूसरे पर बाद में आएंगे पहले सरकार पर आते हैं क्योंकि हमने समाज की एक इकाई के तौर पर इस व्यवस्था को चुना है और वो भी लोकतान्त्रिक किस्म की। अब ऐसी व्यवस्था पर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त एम वाई कुरैशी का कहना है कि जो लोग लोकतंत्र से प्यार करते हैं वो नेताओं से नफरत नहीं कर सकते। अब उनका ये बयान ऐसे दौर में आया जब नेता नाम की इस प्रजाति के बारे में बहुमत ऐसा बन गया है कि ज्यादातर लोग शब्द सुनकर ही नाक-भौं सिकोड़ लेते हैं। अब नेताओं का कहना है कि उन्हें जनता ने चुनकर उनकी किस्मत का फैसला करने के लिए भेजा है। लिहाज़ा 5 साल तक उन्हें ना छेड़ा जाये। वो जैसा चाहें कानून बनायेंगे क्योंकि वो जनता की इच्छा को अभिव्यक्ति देते हैं। जहां तक संसद की बात है तो ये कोई इमारत नहीं बल्कि ऐसी सार्वभौम संस्था है जिसमें नेता हैं। नेता ये भी पूछता है कि ये सिविल सोसाइटी कौन है? इसका कोई वजूद नहीं। जनता से संवाद और उसकी आवाज़ का एकमात्र माध्यम चुनाव है।
तो कौन है ये सिविल सोसाइटी जिसका जिक्र थॉमस पैन ने भी किया था? लोकतंत्र में इसका क्या रोल है? कहते हैं कि ये समाज के ऐसे समूह हैं जो शासन, बाज़ार और माफिया के अलावा जनता के बीच काम करते हैं। फ्रांसीसी क्रांति और फिर अस्सी के दशक में यूरोप से कम्युनिस्ट शासन को उखाड़ फैंकने में इस शब्द का एक अहम रोल है। शासन, बाज़ार, माफिया, सिविल सोसाइटी और आम जनता मिलकर एक समाज का निर्माण करते हैं। अब ये सिविल सोसाइटी जनता की दिक्कतों को जानकर उनका अध्ययन करने के बाद एक राय बनाते हैं और उस राय के मुताबिक प्रचार करते हैं और लोग उस विचार से जुड़ते जाते हैं। ये आवाज़ पांच साल के लिए चुने हुए प्रतिनिधियों तक पहुंचती है, कभी सीधी वार्ता से तो कभी धरने प्रदर्शनों के बाद। एक डेमोक्रेटिक सिस्टम में ये एक मज़ेदार कड़ी बनी हुई है। अब तक ये सब कुछ बिना किसी बहस के चल रहा था क्योंकि अभी तक छोटे-छोटे प्रेशर ग्रुप अपने समुदाय के लिए आवाज़ उठा रहे थे और सामुदायिक हितों पर टिकी हमारी राजनैतिक व्यवस्था के लिए ये फायदे का सौदा था। लिहाज़ा किसी नेता ने ये नहीं कहा कि दलितों का प्रेशर, गुज्जर-मीणा का प्रेशर, गन्ना किसानों का प्रेशर, अल्पसंख्यकों का प्रेशर और इन जैसे ना जाने कितने प्रेशर संसद की सार्वभौमिकता को चुनौती है। लेकिन अब कुछ ऐसे लोग चुनौती दे रहे हैं जिनका कोई एक समुदाय नहीं है और वो राजनैतिक लिहाज़ से पोलेराइज नहीं हो सकते। तो अब दिक्कत आ गई और कह दिया कि ये संसद की सर्वोच्चता को चुनौती है। जनता के प्रतिनिधि के अधिकार में दखल है। सवाल ये कि क्या वाकई जिस प्रतिनिधि को एक बार पांच साल का मेंडेट दे दिया वो जनता की भावनाओं को अभिव्यक्ति देता है? क्या ऐसे प्रतिनिधियों के जमावड़े (संसद) को सिर्फ अपने विवेक का इस्तेमाल करने के लिए सर्वोच्च शक्ति देना जायज़ है?
अगर इन सवालों का उत्तर हां है तो फिर ऐसा क्यों है कि 2009 के आम चुनाव में उतारे गए कुल 387 सीटिंग एमपी में से 203 हार गए। ज़ाहिर है वोटर उनसे नाराज़ था। अब ये आकलन कौन करेगा कि वो पहले साल में नाराज़ हुआ या फिर बाकी के सालों में। अगर पहले ही साल में एंटी इनकंबेंसी आ गई थी तो इस बात का क्या जवाब है कि बाकी के 4 सालों में उसने लोगों की इच्छा के खिलाफ कानून बनाए।
अब बात जनता के विवेक पर। भारत जैसे जाति समुदाय में बंटे हुए समाज में जहां वोटर का एक बड़ा हिस्सा अनपढ़ और अभावग्रस्त है, पढ़ा-लिखा वोटर छुट्टी मनाता है वहां आम जनता के विवेक पर कितना भरोसा किया जा सकता है? इंग्लैंड जैसे देश तक ने सार्वभौमिक मताधिकार देने से पहले सैकड़ों सालों तक विचार किया था। हमने तो गणतंत्र बनते ही सबको वोट देने का हक दे दिया और जो चुनकर गया वो पांच साल तक बिग बॉस बन गया। क्या हम नहीं जानते कि धनबल और बाहुबल का कितना असर है। अभी 543 सांसदों में से 160 ऐसे हैं जिन पर एक या एक से ज्यादा क्रिमिनल केस हैं। वहीं 408 सांसदों के खजाने में 5 लाख से 5 करोड रुपए तक की दौलत है और 112 सांसद 5 करोड़ से ऊपर के मालिक हैं।
कुरैशी की बात में दम है क्योंकि लोकतंत्र में राजनीति का अहम रोल है और राजनीति नेताओं के ज़रिए की जाती है। लिहाज़ा नफरत के लिए गुंजाइश नहीं है। वहीं पैन की बात से पूरी तरह सहमत तो नहीं हुआ जा सकता लेकिन इतना ज़रूर है कि लोकतंत्र में सिविल सोसाइटी के प्रति स्टेट की जवाबदेही हो। सिर्फ चुनकर आना ही काफी नहीं है। चुनने के बाद सिविल सोसाइटी के ज़रिए जनता से संवाद कायम रखा जा सकता है। अगर चेक और बेलेंस लोकतंत्र में ज़रूरी है तो सत्ता पर लगाम लगाने के लिए ये बेहतर ज़रिया है। विपक्ष सत्ता पक्ष पर नज़र रखेगा और सिविल सोसाइटी दोनों पर। वैसे भी तीन के बजाय चार स्तंभों पर खड़ी इमारत का बेलेंस भी बेहतर होता है और मजबूती भी।








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