Wednesday, June 27, 2012 at 18 : 22

बड़ा राजा, बौनी पार्टी


0IBNKhabar

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से जब मनाली की तरफ निकलो तो रास्ते में या तो टूरिस्टों का सामान लदी गाड़ियां मिलती हैं या फिर कलिंकर की कालिख पुते ट्रक। ये ट्रक दिन रात कानों के परदे फाड़ देने वाली आवाज़ के साथ दौड़ते रहते हैं। रास्ते में छोटे-छोटे ढाबों, जहां-तहां साफ़ सफाई करते ट्रक ड्राइवरों और छोटे-छोटे सर्विस स्टेशनों को देखते निहारते दाड़लाघाट पहुंचते हैं। यहां अचानक ट्रकों से हमारा सफ़र अलग हो जाता है। ट्रक दायें मुड़कर एक नालेनुमा इलाके में गुम हो जाते हैं और मनाली की ख़ूबसूरती में लम्हे बिताने की बेताबी इन ट्रकों की कालिख और भारी आवाज़ को हमारे ज़ेहन से निकाल देती है। ऐसा शायद ही कभी किसी के दिमाग में आया होगा कि ट्रकों की ये भारी भरकम आवाज़ लुटियंस में सुनायी देगी। क्लिंकर की ये कालिख पचास साल पुरानी एक बेदाग़ सियासी इमारत की दीवार को काला कर देगी। मगर ऐसा हुआ और पांच बार सूबे के सीएम रहे केंद्रीय मंत्री वीरभद्र सिंह को मंत्रिमंडल से जाना पड़ा।

दरअसल, दाड़लाघाट के जिस नालेनुमा इलाके में कलिंकर के ट्रक गुम होते थे वो एक सीमेंट कंपनी का इलाका है। यहां देश के निर्माण को मजबूती देने के लिए गुजरात की ये कंपनी सीमेंट बनाती है। मगर आरोप है कि कांग्रेस की तरफ से 5 बार सीएम रहे राजा वीरभद्र सिंह ने अपनी सियासी इमारत में तीन लाख का ये सीमेंट इस्तेमाल किया था। अब करीब बीस साल में ही ये साफ़ होने लगा कि ये सीमेंट काला है। धर्मशाला की तरफ से आयी मनकोटिया नाम की तेज़ बौछारों ने इस कालिख को सबके सामने ला दिया और सियासत में पचास साल पुरे करने के ठीक एक दिन बाद ही वीरभद्र सिंह को 'हिमाचल की तकदीर' से हिमाचल की जनता का आरोपी बना दिया।

मई 2007 में मनकोटिया के हाथ एक सीडी लगी जिसमें लेन-देन की बात करते कुछ लोगों की आवाजें हैं। दावा किया गया कि ये आवाजें 1989 की हैं जब तत्कालीन वीरभद्र सरकार चुनाव में जाने वाली थी। दावा है कि इनमें जो आवाजें दर्ज हैं वो मरहूम मोहिन्द्र लाल जो उस वक़्त उद्योग विभाग में निदेशक थे, वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह और खुद तत्कालीन सीएम वीरभद्र सिंह की हैं।

आरोप है कि दाड़लाघाट में इस सीमेंट कंपनी का जो प्लांट लगना था उसकी मंज़ूरी के लिए मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने चार मंत्रियों की उपसमिति में से दो की राय ही नहीं ली और इसके लिए कंपनी के मालिक नरेश तेओतिया से तीन लाख की डील की गयी। इसके अलावा सोलन नंबर वन जैसा देसी ब्रांड और ओल्ड मोंक रम बनाने वाली कंपनी मोहन मिकिंस से भी सोलन प्लांट के लिए 2 लाख की रिश्वत लेने के आरोप हैं। कांग्रेस के पूर्व मंत्री विजय सिंह मनकोटिया ने 2007 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ये सीडी बम फोड़ा था। तब भी हालांकि कांग्रेस हार गयी थी मगर इस सीडी की वजह से हारी ऐसा कहना गलत होगा। तब इसका इतना ज्यादा असर नहीं हुआ जितना अब हो रहा है। पांच साल बाद फिर बाहर आये इस सीडी के जिन्न ने विरोधियों को भ्रष्टाचार से घिरी मनमोहन सरकार को घेरने का मौका तो दे ही दिया चुनावी साल में पहले से ही नेताओं के अहंकार में डूबी हिमाचल कांग्रेस के 'मिशन डिफीट' की हवा निकलने का इंतजाम कर दिया है। वीरभद्र सिंह कांगेस के लिए सियासत की वो हड्डी जो ना तो उगलते बनेगी न निगलते। हिमाचल में कांग्रेस वीरभद्र से ही शुरू होती है और वहीँ ख़त्म होती है। ऐसे में अगर उन्हें चुनाव की कमान देते हैं जैसा कि वो मांग कर रहे हैं तो कांग्रेस का सबसे बड़ा मुद्दा, धूमल सरकार का भ्रष्टाचार, औंधे मुंह गिर जाएगा और अगर राजा साहब को किनारे लगाया जाता है तब तो लुटिया डूबना तय ही है। इसकी बानगी शिमला नगर निगम चुनाव में देखने को मिली जहां दस जनपथ के खासमखास केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा की पसंद के उम्मीदवार उतारे गए। नतीजा, कांग्रेस छब्बीस साल बाद कुर्सी से बेदखल।

वीरभद्र सिंह भले ही बीजेपी को इस सब के लिए ज़िम्मेदार ठहराए मगर काली भेड़ें उनके खुद के ही झुण्ड में हैं। दरअसल, हिमाचल कांग्रेस में कई ऐसे लोग हैं जो राजा वीरभद्र सिंह की 'सियासी लाश' देखने के लिए बेताब हैं। मगर कई बार लाश जिंदा आत्माओं से ज्यादा तकलीफ देती है खासकर तब जब उसे बिना ठिकाने लगाए सड़ने के लिए छोड़ दिया जाये। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कॉल सिंह का सवाल है कि आखिर उनमें क्या कमी है, वो भी तो सूबे की कमान संभालने की काबिलियत रखते है? तो जवाब ये है कि वो अपनी खुद की, द्रंग विधानसभा, सीट को बचा लें तो बड़ी उपलब्धि होगी। नेता विपक्ष, विद्या स्टोक्स, को तो चुनाव लड़ने के लाले पड़े हैं। वो ये तय नहीं कर रहीं कि ठियोग से लड़ें या मौजूदा कुमारसेन सीट से और हाल ही में वीरभद्र से उनकी नजदीकियों से ये लगने लगा था कि वो हकीक़त से समझौता कर चुकी हैं। मगर बदले हालात क्या गुल खिलाते हैं कुछ कहा नहीं जा सकता। पूर्व परिवहन मंत्री जीएस बाली 'सुग्रीव' की तरह केंद्र के 'रामबाण' का इंतजार कर ही रहे थे। प्रदेश में घूम-घूम कर परिवर्तन रैलियों के ज़रिये वीरभद्र को खुली चुनौती दे रहे हैं। मगर कांगड़ा की एक दो सीटों को छोड़ दें तो बाली का बल कहीं नहीं ठहरता। इतना ज़रूर है कि बाकियों के मुकाबले उनमें ज्यादा दम है। वीरभद्र की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं केंद्रीय वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा। जनाधार देखें तो शायद अपने खुद के गांव में प्रधान पद के लिए भी एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़े। मगर इससे क्या फर्क पड़ता है? अगर आप दस जनपथ का रास्ता जानते हैं तो अपने घर का एड्रेस रखने की आपको ज़रूरत नहीं पड़ती। आपको 'पेराशूट' के ज़रिये आपके कमरे में उतारा जाता है। फिर आनंद शर्मा के तो दस जनपथ जाते-जाते जमाना हो गया हैं।

शास्त्री से लेकर सोनिया तक सियासत की धुप में बाल सफ़ेद कर चुके वीरभद्र को इस बात का पूरा एहसास है। वो कहते भी हैं कि उनका इस्तेमाल किया जाएगा और फिर चाय में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंक दिया जायेगा। लिहाज़ा वो चाहते हैं कि कमान उनके हाथ में हो और अगला सीएम उन्हें प्रोजेक्ट किया जाये। अब अगर कांग्रेस ऐसा नहीं करती है तो कांग्रेस, कांग्रेस ही रहेगी इसमें शक है। पहले ही कयास हैं कि बीजेपी से अलग हुए राजा महेश्वर सिंह की नयी पार्टी हिमाचल लोकहित पार्टी को राजा वीरभद्र सिंह का परोक्ष समर्थन है। इस बात की क्या गारंटी है कि छठी बार कुर्सी पाने के लिए वो प्रत्यक्ष तौर पर सूबे में तीसरे विकल्प की संभावना न टटोलें। वो भी तब जब लाहौल से ऊना तक, किन्नौर से कांगड़ा तक और सिरमौर से मंडी तक वीरभद्र की आवाज़ आज भी एक जैसा असर रखती है। पुत्रमोह एक रोड़ा हो सकता है क्योंकि ढलती उम्र में बेटे के लिए सियासी ज़मीन तैयार करने की भी चुनौती है। कुछ भी हो, मगर कांग्रेस फंस चुकी है। भ्रष्टाचार के आरोप झेल रही और आपसी कलह से जूझ रही बीजेपी के लिए कोर्ट का ये फैसला संजीवनी बनकर आया है। अब देखना ये है कि- 'राजा नहीं फकीर है, हिमाचल की तकदीर है'- का नारा बुलंद होता है या फिर दस जनपथ का फरमान।

IBN7IBN7

Previous Comments

IBN7IBN7
IBN7IBN7

के बारे में कुछ और

IBN7IBN7

IBN7IBN7
IBN7IBN7