टीवी पत्रकारिता में बिताए पिछले कुछ सालों ने मुझे बहुत हद तक मज़बूत बनाया है। मज़बूत इतना कि किसी हस्ती के इंतकाल की खबर तक मेरे लिए महज़ एक खबर से ज्यादा कुछ नहीं रह गई। अक्सर अचानक खबर आती है किसी बड़ी हस्ती के चले जाने कि तो मैं भी उसको एक खबर कि नज़र से देखते हुए उसे एक बेहतर कवरेज देने की कोशिश में जुट जाता हूं। पर उस दिन बहुत अलग महसूस किया जब रूहानी आवाज़ के मालिक मशहूर ग़ज़ल गायक मेहदी हसन साहब के इंतकाल की खबर मिली। बदकिस्मती ऐसी कि मैं खुद उस दिन शिफ्ट में था और एक खबर की तरह उसे देखने पर मजबूर था। कुछ पलों के लिए डबडबा आई मेरी आंखों को दोबारा पोंछ कर उस इंसान के मरने की खबर बनाने के लिए मजबूर हुआ जो मेरे ग़मों और यादों का हमेशा साथी रहा। यह बात और....
मेरा जन्म सन 1983 में हुआ था। स्वाभाविक सी बात है कि मेरे लिए हमेशा से इस साल की एक खास अहमियत रही है पर होश संभालने पर मुझे मालूम हुआ कि यह साल सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, बल्कि उन सभी भारतवासियों के लिए खास था जो क्रिकेट को एक धर्म का दर्जा देते हैं। यह वही साल था जब भारत के ग्यारह महानतम खिलाड़ियों ने मिलकर भारत को पहली बार विश्व कप दिलाया था। आने वाले सालों में मैंने कपिल देव द्वारा लॉर्ड्स के मैदान पर वर्ल्ड कप ट्रॉफी को उठाकर चूमते हुए शॉट्स को कई बार देखा पर अंदर ही अंदर हमेशा ऐसा लगा की काश मैं भी यह लम्हा उस वक्त देखकर वही अहसास कर पाता जिसकी अनगिनत कहानियां सुनते हुए मैं बड़ा हुआ था। पर मेरा अपने होशो हवास में भारत को दुबारा वर्ल्डकप की ट्रॉफी पाते देखना एक अधूरा सपना सा ही बन कर....
अक्सर कहा जाता है कि जीवन और मृत्यु ईश्वर के हाथ में है। एक तरह से देखा जाए तो यह कथन सही भी है। औरों की तरह मैं भी इसमें विश्वास रखता था। पर जापान की विनाशलीला देखने के बाद दिमाग में उठते कई विचारों के बीच यह तय कर पाना कि इस कथन में कितनी सच्चाई है, थोड़ा कठिन सा जान पड़ता है। इसमें दो राय नहीं कि जापान में आई इस भयानक तबाही को रोक पाना किसी भी मनुष्य के हाथ में नहीं था, लेकिन जो कुछ जापान में उसके बाद हुआ उसमें मानव का कितना दोष था इस बारे में मन में एक द्वंद्व सा छिड़ गया। इस भीषण त्रासदी के एक सप्ताह बाद जीवित बच गए लोग अब भी यह समझने में असमर्थ हैं कि वो खुद को कितना भाग्यशाली मानें। वजह है इस प्राकृतिक आपदा के लगभग तुरंत बाद ही पैदा हुआ परमाणु....
कई किलोमीटर दूर तक फैले मलबे के ढेर, खिलौनों की तरह पलटी हुईं गाड़ियां, टूटे हुए जहाजों के टुकड़े, गायब हो चुकी सड़कें और पानी में मिल चुके लोगों के शव। एक वक्त यहां पर सजीव रहे जीवन के यही कुछ बचे-खुचे अंश जापान के कई इलाकों में आई सुनामी के बाद देखे जा सकते हैं। अब तक पत्रकारिता में बिताए हुए पिछले कुछ सालों में मैंने कई तरह के हादसे देखे। मानव जीवन को मिटा डालने वाली लगभग हर वो कोशिश देखी जो खुद इंसान ने ही की हो या किसी प्राकृतिक आपदा की देन हो। लेकिन शायद ही कभी दिल दहला देने वाली ऐसी कोई तस्वीरें मैंने आज तक देखी हैं। जीवन का मूलभूत आधार कहलाने वाला पानी ही जीवन के लिए श्राप कैसे बन सकता है यह पहली बार देखा। कई मीटर ऊंची आई सुनामी की इन लहरों के सामने बौने से दिखते इंसान कितने बेबस हो....









