बुरा लगता है जब किसी बच्चे के पास अकूत प्रतिभा हो और वो गलत रास्ते पर चला जाए। अफसोस होता है जब किसी में बिना शर्त आगे बढ़ने का जज्बा हो और वो रास्ते से भटक जाए। दुख होता है जब किसी में तरक्की-उन्नति की लाख संभावनाएं मौजूद हों और वो नकारात्मकता के बीहड़ में उतर आए। मन कचोटता है जब किसी एक के भाग्य से करोड़ों के विकास का सिरा गुंथा हो और वो सालों से अपनी जगह पर ठहरा और ठिठका हुआ है। हां, दुख होता है! अफसोस होता है! दर्द होता है! बुरा लगता है! कुछ दिन पहले ही झारखंड में तीसरी बार जनता का भरोसा टूटा। सवाल उठता है कि क्या राज्य में योग्य नेतृत्व का अभाव है? यहां के नेता इतने नाकारा हैं कि जनता का भरोसा पांच साल भी सहेज कर नहीं रख सकते? क्या जनप्रतिनिधियों में 12 साल बाद भी परिपक्वता नहीं....
झारखंड राज्य की स्थापना एक शब्द की बुनियाद पर हुई थी। जी हां...महज एक शब्द 'उम्मीद'। 'उम्मीद' कि जल, जंगल और जमीन का ये प्रदेश अपने आंचल में भरे अकूत संसाधनों का अपने हक में दोहन करेगा। 'उम्मीद' कि इस धरती पर सालों-साल से समाज के मुख्यधारा से वंचितों को समाजिक न्याय मिलेगा और इन सबसे बढ़कर 'उम्मीद' कि एकलव्य, बिरसा मुंडा और सिद्धू-कान्हू के वंशज अपनी सदियों पुरानी व्यथा को गठरी में बांधकर विकास की पटरी पर सरपट दौड़ लगाएंगे,मगर स्थापना के एक दशक बाद झारखंड की इस उम्मीद को आदिवासी कवि अनुज लुगुन की कलम कुछ ऐसे तोड़ती है,
'शिकारी शिकार बन रहे हैं
शहर में,
अघोषित उलगुलान में,
लड़ रहे हैं जंगल,
लड़ रहे हैं ये,
नक्शे में घटते अपने घनत्व के खिलाफ
जनगणना में घटती संख्या के खिलाफ गुफाओं की तरह टूटती अपनी ही जिजीविषा के खिलाफ'
झारखंड की इस उम्मीद को उसके अपनों....









