प्रकाश झा की फिल्म चक्रव्यूह देखी। दोस्तों मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं लेकिन एक चीज दिमाग में अच्छी तरह से घुस गई। सारे राजनीतिक दल अल्पसंख्यक-अल्पसंख्यक और दलित-दलित का ढिंढोरा पीटते हैं। क्या इन्हें आदिवासी नहीं दिखते। ठीक है कि जहां आदिवासी रहते हैं वहां खनिज हैं। उससे देश की तरक्की होगी लेकिन बड़े कॉर्पोरेट घरानों को खनिज निकाल वापस लौटने को क्यों नहीं कहा जाता। वो खनिज भी निकालते हैं और आदिवासियों को भी। ऊपर से वहीं डेरा डंडा यानी फैक्ट्री लगाकर बैठ जाते हैं। बेहतर ये होता कि खनिज निकालो और शहर में अपनी फैक्ट्री बनाकर वहां ले जाओ फिर जो बनाना है बनाओ। अगर आदिवासियों को तरक्की नहीं दे सकते तो उनको बेघर तो न करो। नक्सलवाद पनपने का खुद ही मौका क्यों देते हो। असल दलित तो बेचारे आदिवासी हैं। भारत के मूल निवासी जो बाहर से आए कॉर्रपोरेट आर्यन और नक्सलियों के बीच पिस....




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