ऋषिकेश नारायण सिंह
Tuesday , June 18, 2013

‘विहार’ चाहिए, 90 का बिहार नहीं


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मार्च 1990 की कोई तारीख थी...याद नहीं, काफी बच्चा था। 'आज' अखबार में छपा कि लालू ने बिहार के मुख्यमंत्री के पद की शपथ ले ली। उस वक्त राजनीति इतनी समझ में नहीं आती थी। लेकिन जब घर से बाहर निकला तो जातिवाद समझ में आने लगा। ऐसा लगा मानों दलितों के उत्थान के लिए बहुत कुछ होने वाला है। अच्छा भी लगा कि चलो जिनके साथ खेलता हूं उनके साथ ही स्कूल जाऊंगा। धीरे-धीरे वक्त बीत गया और मेरा भ्रम भी टूट गया और साथ ही बदल गई अखबारों की सुर्खियां। हर महीने-हफ्ते खून से रंगी खबरें। कभी बारा नरसंहार तो कभी लक्ष्मणपुर बाथे। घर से बाहर निकलता तो लालू के कहे जुमले सुनने को मिलते.. 'भूरा बाल साफ करो'। 2005 तक यही सब चलता रहा। उस वक्त तक RJD सरकार ने दलितों को समाज की मुख्यधारा में कितना जोड़ा ये तो पता नहीं, लेकिन दलित हित के नाम....

Thursday , November 01, 2012

मैंने देखा है असल चक्रव्यूह


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प्रकाश झा की फिल्म चक्रव्यूह देखी। दोस्तों मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं लेकिन एक चीज दिमाग में अच्छी तरह से घुस गई। सारे राजनीतिक दल अल्पसंख्यक-अल्पसंख्यक और दलित-दलित का ढिंढोरा पीटते हैं। क्या इन्हें आदिवासी नहीं दिखते। ठीक है कि जहां आदिवासी रहते हैं वहां खनिज हैं। उससे देश की तरक्की होगी लेकिन बड़े कॉर्पोरेट घरानों को खनिज निकाल वापस लौटने को क्यों नहीं कहा जाता। वो खनिज भी निकालते हैं और आदिवासियों को भी। ऊपर से वहीं डेरा डंडा यानी फैक्ट्री लगाकर बैठ जाते हैं। बेहतर ये होता कि खनिज निकालो और शहर में अपनी फैक्ट्री बनाकर वहां ले जाओ फिर जो बनाना है बनाओ। अगर आदिवासियों को तरक्की नहीं दे सकते तो उनको बेघर तो न करो। नक्सलवाद पनपने का खुद ही मौका क्यों देते हो। असल दलित तो बेचारे आदिवासी हैं। भारत के मूल निवासी जो बाहर से आए कॉर्रपोरेट आर्यन और नक्सलियों के बीच पिस....

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