23 जनवरी की सुबह-सुबह एक दोस्त का फोन आया। शिकायती लहजे में बोले, जो कुछ भी हो रहा है ठीक नहीं हो रहा, ऐसा नहीं होना चाहिए था। मैंने पूछा कि भाई, क्या हुआ, किससे शिकायत है? वो बोले, यार ये जो संघप्रमुख ने किया है, ठीक नहीं किया। या तो उन्हें पहले ही गडकरी को दोबारा अध्यक्ष बनवाने पर जोर नहीं देना चाहिए था, और यदि संघ ये चाहता ही था, यदि संघ को ये लगता है कि गडकरी को बेवजह इनकम टैक्स के मामले में फंसाया जा रहा है तो फिर उसे आडवाणी के सामने झुकना नहीं चाहिए था। मैं हैरान रह गया। मेरे ये दोस्त वो शख्स हैं जिन्होंने कक्षा 1 से 12वीं तक मेरे साथ संघ से जुड़े स्कूल में पढ़ाई की है और इन दिनों वो अपना बिजनेस कर रहे हैं। उन्होंने आजतक कभी राजनीति पर मेरे साथ चर्चा नहीं की। खैर,मैंने उन्हें कहा कि....
बीजेपी में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। जब सबको ऐसा लग रहा था कि तमाम आरोपों के बावजूद संघ अपनी पसंद नितिन गडकरी पर समझौता करने को तैयार नहीं और बीजेपी के अध्यक्ष वही होंगे, अचानक गडकरी बीजेपी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे देते हैं। जाहिर है इस इस्तीफे के साथ ही एक सवाल हवा में तैर गया है कि जीता कौन..आडवाणी या संघ? सवाल ये भी उठा कि बड़ा कौन है संघ या आडवाणी। प्रश्न ये भी है कि अपनी राजनीति के अंतिम पड़ाव पर खड़े आडवाणी ने क्या संघ प्रमुख के रुतबे को सीधी चुनौती दी है। इन सवालों का जवाब देने से पहले एक बार मुंबई चलते हैं और उस बैठक के बारे में बात करते हैं जिसके बाद गडकरी ने इस्तीफा देकर कहा कि उन्हें बीजेपी में दूसरा टर्म नहीं चाहिए। वो बैठक हुई थी संघ के दूसरे सबसे बड़े शख्स भैयाजी जोशी, बीजेपी के....
मैं दिल्ली में रहता हूं और यकीनन इस शर्मनाक हरकत ने मुझे ये सोचने पर मजबूर किया है कि आखिर कब तक सहेंगी लड़कियां। वो कोई भी हो सकती हैं, आपकी मेरी बहन, मां, बेटी, पत्नी, कोई भी। कल उस लड़की के साथ हुआ और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि दिल्ली में कोई भी लड़की सुरक्षित है। मुझे बताइए कि दिल्ली में रहने वाला वो कौन सा बाप होगा जो इस वक्त अपनी बेटी को लेकर चिंतिंत नहीं होगा, जिसे ये बात परेशान नहीं करती होगी कि उसकी बेटी अभी तक घर नहीं पहुंची। वो कौन सी मां होगी जिसे अपनी बेटी के घर पहुंचने से पहले नींद आ जाती होगी। दिल्ली में रहने वाले हर मां बाप के मन में हर वक्त एक अनजाना सा भय बना रहता है, कहीं उनकी बेटी के साथ कुछ हो न जाए...हर वक्त उनका मन एक ही प्रार्थना करता रहता....
कानपुर का दिव्या रेप और कत्ल मामला भला किसे याद नहीं होगा। इस केस को लेकर न जाने कितने मोड़ आए। कभी इंसाफ की मांग कर रही भीड़ पर लाठियां बरसाईं गईं तो कभी दिव्या के घर आने जाने वाले शख्स मुन्ना को ही उसका कातिल बताकर जेल में ठूंस दिया गया। बहरहाल ताजा जानकारी ये है कि दिव्या के कत्ल के मामले में यूपी के डीजीपी द्वारा सीबीसीआईडी को जांच सौंपे जाने के बाद स्कूल के ही प्रबंधक के बेटे के की भूमिका पाई गई है और मुन्ना को जेल से रिहा कर दिया गया है। अब सवाल ये उठता है कि इस मामले में उन पुलिसवालों के खिलाफ क्या कार्रवाई होनी चाहिए जिन्होंने एक आम आदमी की जिंदगी बर्बाद करने की पूरी तैयारी कर ली थी। आइए परत दर परत इस मामले में पुलिस अधिकारियों की भूमिका की तहकीकात करते हैं। कानपुर के दिव्या हत्याकांड में सबसे पहली....
सवाल ये नहीं है कि किसकी गलती थी, सवाल ये है कि आखिर क्यों तुरत-फुरत IPS और हिसार के एसपी रहे सुभाष यादव को न सिर्फ सस्पेंड कर दिया गया बल्कि उनके खिलाफ व्यक्तिगत तौर पर हत्या का मामला भी दर्ज कर लिया गया। सवाल ये है कि क्या हरियाणा सरकार ये मान चुकी है कि एसपी सुभाष यादव ने ही हरियाणा में प्रदर्शन के दौरान मारे गए युवक का कत्ल किया था? क्या ये प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ नहीं है? जाहिर तौर पर मारे गए युवक के परिवार से सबको हमदर्दी है और सब चाहते हैं कि उसके परिवार को इंसाफ मिले लेकिन कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब अगर इस वक्त हरियाणा सरकार से नहीं मांगा गया तो हर वारदात के बाद IPS अधिकारियों के खिलाफ सस्पेंशन और हत्या का मुकदमा दर्ज होने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। जो लोग इस पूरे मामले से वाकिफ....
मैं हैरान हूं, परेशान हूं और दुखी हूं। रुचिका के लिए आज पूरे देश से आवाज उठ रही है। लोग हरियाणा के पूर्व डीजीपी राठौर के लिए कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं। मैं भी चाहता हूं कि राठौर को ऐसी सजा मिले जो आने वाले वक्त में एक नजीर बन जाए लेकिन मैं हैरान इसलिए हूं क्योंकि जबसे मीडिया ने रुचिका को इंसाफ दिलाने के लिए मुहिम छे़ड़ी है ऐसे-ऐसे बयान आ रहे हैं कि मन करता है कि क्यों न उन अधिकारियों और राजनेताओं को इस मामले में आरोपी बनाया जाए, क्यों न उनके खिलाफ भी मुकदमा चलाया जाए। एक बानगी देखिए- सीबीआई के एक बड़े अधिकारी जो उस वक्त इस मामले की जांच कर रहे थे, अचानक कहां से उनका मन बदला और वो कहते हैं कि राठौर ने उन्हें लालच देने की कोशिश की। जनाब कहते हैं कि वह दबाव में नहीं आए....
अमिताभ बच्चन कहते हैं- हिंदुस्तानी फिल्मों के लिए सबकुछ नहीं है ऑस्कर। हालांकि उसकी अपनी अहमियत है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि जिसे ऑस्कर मिल गया वो महान फिल्म हो गयी और जिसे नहीं मिला वो बेकार फिल्म है। ये अमिताभ के विचार हैं और मैं जानता हूं कि अब जो मैं कहने जा रहा हूं उसके बाद हो सकता है कि मुझे दकियानूसी और न जाने क्या-क्या कहा जाएगा। लेकिन कुछ सवाल जो हमें खुद से पूछने चाहिए, वो ये कि अगर सदी के महानायक ने स्लमडॉग मिलेनियर के बारे में अपने ब्लॉग पर कुछ कमेंट डाले तो क्या उन्हें इसका हक नहीं है। अगर उनके ब्लॉग पर इस फिल्म के बारे में कुछ लिखा हुआ है तो इसमें गलत क्या है। हालांकि वो ये बात साफ कर चुके हैं कि वो लेख उनका नहीं था वो कुछ पाठकों के कमेंट थे जिन्हें उन्होंने अपने ब्लॉग पर....
दोस्तो, हिमेश रेशमिया होने का मतलब क्या है .....आप कुछ जवाब दें उससे पहले मैं आपको बताता हूं। जो मैंने देखा, सुना और महसूस किया ,अगर उसे कसौटी मानूं तो जितने लोग हिमेश रेशमिया को पसंद करते हैं ,उससे ज्यादा उन्हें नापसंद करते हैं ....पिछले कुछ वक्त में मैंने एक बात और नोटिस की ...सर्वे चाहे किसी भी चीज का हो, अगर उसमें एक सवाल ये हो कि, वो कौन सा गाना है जिसे आप नहीं सुनना चाहेंगे -तो यकीन मानिए ज्यादातर जवाब आएंगे-हिमेश रेशमिया के गाने। वैसे हिमेश होने के कुछ और भी मतलब हैं - मसलन ,वो शख्स जिसे ,आशा भोंसले ने थप्पड़ मारने की बात कही थी....वो शख्स जिसकी गायकी पर हर वक्त ये कहकर सवाल उठाए गए -\'अरे ये तो नाक से गाता है\' ।....आज के दौर में हिमेश होने का शायद यही मतलब है...मेरी बातें सुनकर हो सकता है आप इनसे असहमति जताएं...लेकिन अगर आप....
हम कहते रहें, उन्हें फर्क नहीं पड़ता, हम चिल्लाते रहें, उनकी बला से ...हमारी लाशें गिरती रहें, उन्हें कुछ लेना देना नहीं....हमारा खून सड़कों पर बहता रहे, उन्हें क्या -उनके लिये तो हमारे खून की कीमत पानी से भी कम है ....बात चाहे अहमदाबाद बलास्ट की हो या जयपुर धमाकों की...दिल्ली में हुए धमाके हों या असम का सीरियल बलास्ट ....हमारी जान की कीमत, हमारे नेताओं के लिए छींक आने से ज्यादा कुछ नहीं....असम में 30 अक्तूबर को हुए सीरियल धमाकों में भले ही 60 से ज्यादा की जान चली गई हो...भले ही 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए हों, लेकिन यकीन मानिए कोई फर्क नहीं पड़ेगा ...सबकुछ वैसे ही चलता रहेगा ...और हां, एक बार फिर मैं आपसे कहता हूं-आप भी कभी भी शिकार बन सकते हैं। मानसिक रूप से खुद को तैयार कर लिजिए। बहुत मुमकिन है एक बार फिर आपके शहर में ब्लास्ट हो....
हिंदुस्तान जवान हो गया है ....ये यंग इंडिया है ....ये वो भारत है जहां गांव से, छोटे शहरों से अपने बूते ,झंडे गाड़े जा रहे हैं । चाहे वो आज के हिंदुस्तान का अर्जुन ,निशानेबाजी में गोल्ड मेडल जीतने वाला अभिनव बिंद्रा हो। कुश्ती में कांस्य जीते वाले सुशील कुमार हो या फिर मुक्केबाजी में कांस्य पदक जीतने वाले विजेंद्र कुमार। सबने अपने दम पर जीत हासिल की है। कामयाबी के आसमान पर चमकने वाले ये वो सितारे हैं जो खुद तो कुछ नहीं बोलते लेकिन उनकी सफलता ताल ठोंककर कहती है- हां ,हममें है दम। हम आज के हिंदुस्तानी हैं। हम किसी से नहीं डरते। हम हारने से बचने के लिए नहीं खेलते । हम जीतने के लिए खेलते हैं। हमें हार से डर नहीं, लेकिन हमें जीत से मोहब्बत है। बात चाहे क्रिकेट की हो या निशानेबाजी की या फिर मुक्केबाजी की । इस यंग इंडिया....









