आप मानें या ना मानें पर हकीकत है कि देश पर आने वाले आम चुनावों का बुखार अभी से चढ़ने लगा है। देश को कौन सी पार्टी लीड करेगी, कौन होगा देश का अगला पीएम, सभी की जुबां पर यही सवाल हैं। अगर मैं गलत नहीं हूं तो आप भी इस तरह की बातचीत से रोजाना किसी कैफे, पार्क या ऑफिस में दो चार हो रहे होंगे। ये अच्छी बात है कि हम अपनी राजनीतिक व्यवस्था में इतनी दिलचस्पी लेते हैं। अमेरिका को जिस तरह फिल्मों में सुपरहीरो देखने की लत है वैसे ही हमें राजनीति में सुपरहीरो देखने की चाहत है। एक ऐसा राजनेता जो पलक झपकते ही सारी समस्याएं हल कर दे। और जैसा कि जाहिर है कि हमारे आपके बीच एक बड़ा वर्ग मोदी को एक सुपरहीरो के तौर पर देखता है, उनकी वकालत करता है। उसमें अभिभूत है। उसकी मोदी भक्ति इतनी ज्यादा है कि वो....
2012 के यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव प्रचार चरम पर था। इस दौड़ में एसपी, बीएसपी के बीचे कांटे की टक्कर मानी जा रही थी। तभी एक खबर आई कि एसपी के युवा तुर्क अखिलेश ने बाहुबली डी पी यादव को टिकट देने का साफ विरोध किया है। खबर थी कि पार्टी के सीनियर नेता चाहते हैं कि ऐसा हो लेकिन अखिलेश अड़ गए। यूपी की जनता को उनका ये स्टैंड भाया और बदले में उसने एसपी की झोली वोटों से भर दी। मुलायम ने भी हवा का रुख भांपा और सत्ता बेटे को थमा दी। यूपी की जनता की उम्मीदों के रथ पर सवार अखिलेश ने अपना सफर तो काफी धमाकेदार अंदाज में शुरू किया लेकिन यूपी में हर घंटे, हर दिन, हर महीने जो हुआ है उसने इस युवा सीएम के चेहरे पर नाकामी की कालिख पोत दी। आज अखिलेश दोराहे पर हैं। सर पर सवार सीनियर्स....
मैंने और आपने अब तक सिर्फ दो तरह का भारत देखा है। एक वो जो सत्ता के समर्थन में है और दूसरा वो जो सत्ता के विरोध में है। आजादी के बाद ऐसे ही दो भारत के लोग देश की किस्मत तय करते आए हैं। अब एक तीसरे भारत का उदय हो रहा है जो अब तक उदासीन रहा या ये कहें कि वो मान रहा था कि - सब चलता है। अब हताशा से निकला ये भारत कहने लगा है- सब चलता नहीं है, सिस्टम बदलो। हां, यही वो तीसरा भारत है जो अन्ना के आंदोलन में दिखाई पड़ा। यही वो भारत है जो अब पूरे देश में प्रदर्शन कर रहा है। अब सवाल ये कि अचानक ये उठ कैसे खड़ा हुआ। मेरी नजर में इसकी एक नहीं, कई वजह हैं। पहली और सबसे बड़ी वजह है सोशल मीडिया का जन्म। दूसरी- हमारे सिस्टम की फेलियर और तीसरी हमारे....
कल टीवी चैनल पर एफडीआई पर रोचक बहस जारी थी। बीजेपी प्रवक्ता एफडीआई का ताबड़तोड़ विरोध कर रही थीं तभी उनसे पूछा गया कि एफडीआई का समर्थन तो आपने अपने मेनिफेस्टो में भी किया था। हां ना, हां ना जारी रही और बात आगे बढ़ गई। लेकिन ये बहस अपने पीछे ये सवाल छोड़ गई कि जब खुद ही आप एफडीआई का समर्थन करते हैं तो आप अब इसका विरोध क्यों कर रहे हैं। गौरतलब है कि 2004 के एनडीए के मेनीफेस्टो में एफडीआई का समर्थन किया था। इसी लकीर पर आगे बढ़ते हुए हमारे राजनेता आजकल अकारण ही या यूं कहें कि विरोध करने के लिए ही एक दूसरे का विरोध करने पर आमादा हैं। कल जैसे ही सरकार ने नई एफडीआई पॉलिसी का बम फोड़ा। ताबड़तोड़ प्रतिक्रियाओं की झड़ी लग गई। तकरीबन सभी पार्टियों ने विरोध के इस हवन में कुछ न कुछ आहूति दी। विरोध....
अगर मैं कहूं कि देश के राजनीतिक पटल पर आज भी राष्ट्रीय विचारधारा का सूखा है तो कई लोगों को अजीब लग सकता है पर हकीकत यही है। देश में कमोबेश जितनी भी पार्टियां आज राजनीति के मैदान में हैं उनमें लेफ्ट और कांग्रेस को छोड़कर शायद ही कोई ऐसी पार्टी हो जिसका नजरिया राष्ट्रीय नजर आता है। ये देश के लिए घातक स्थिति है कि राष्ट्रीय राजनीति का एक बड़ा हिस्सा ऐसी पार्टियों का है जो क्षेत्रीय या धर्म आधारित राजनीति करती हैं। इसमें तमाम बड़ी और छोटी राजनीतिक पार्टियां शामिल हैं। कांग्रेस आजादी के बाद से सबसे ज्यादा देश पर शासन करने वाली पार्टी है। सवाल उठता है कि क्यों, आंदोलन तो जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया ने भी किया था। कांग्रेसराज में घोटालों और बदनामियों की लिस्ट लंबी है। सैक्युलर होने का तमगा लेकर अगर वो अपनी छाती फुलाती है तो देश को अपने नाकारापन....
पार्ट-1 करीब 4 साल पहले की बात है। दिल्ली में दनादन धमाके हो रहे थे। इस दरमियान आईएम का एक मेल editor@ibnkhabar.com पर भी आया। मेल बहुत से आते हैं लेकिन ये मेल सिहरन पैदा कर गया। ये मेल उस दौरान मीडिया हाउसेस को आतंकियों द्वारा अपने काले कारनामे बताने के लिए किए गए मेलों में से एक था। शाम को जब दिल्ली में धमाका हुआ तो न्यूजरूम में चारों तरफ अफरातफरी मची हुई थी। उसी बीच ये मेल आया। मेल में हजार धमकियों के बीच लिखा हुआ था कि हम गुजरात दंगों का बदला ले रहे हैं। मैं हतप्रभ था कि निरीह लोगों को मारने वाले ये दरिंदे खून के बदले खून की बात कर रहे हैं। वक्त गुजरा, जिंदगी आगे बढ़ गई। पार्ट-2 फिर कुछ ही वक्त पहले मैंने देखा कि एक मीडिया हाउस के कॉन्क्लेव में मुशर्रफ भारतीय मुसलमानों की समस्या उठाने लगे, उन्हें फौरन ही एहसास....
जब मिस्र में पब्लिक तहरीर चौक पर तेजी से बढ़ रही थी तो हम सब चकित थे और उत्साहित भी। तब समाज की आवाज उठाने का सेहरा सोशल मीडिया के सिर बंधा, अच्छी बात है। जब भारत में अन्ना ने हुंकार लगाई तो आवाज देश की गलियों, मोहल्लों तक से सुनाई दी, साभार था-सोशल मीडिया...हम फिर अचंभित और उम्मीद से भरे। बेशक जिनकी आवाज लोकतंत्र के आभामंडल में सिर्फ 5 साल बात ही सुनाई देती थी वो अब सेकंड के हिसाब से सुनाई पड़ने लगी। यहां तक सब अच्छा था लेकिन जैसे ही असम में हिंसा भड़की, वही सोशल मीडिया विलेन लगा, अचंभित तो हुए लेकिन उसमें हताशा और दुख का मिश्रण भी था। सरकार जो सोशल मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिश में थी लेकिन झिझक रही थी, उसे मौका मिल गया इस बहाने कुछ करने का। गलत कौन है ये सवाल हम सब के सामने है, सरकार जिसने....
मैंने कहीं सुना था कि बांस में जब कभी फूल आने लगें तो अनहोनी की आशंका बढ़ जाती है। बांस का तो पता नहीं लेकिन आगामी आम चुनावों से पहले देश में सांप्रदायिकता की चिंगारी फिर फूटने लगी है। कभी कोसी, कभी बरेली तो कभी असम के बोडो इलाके। मामूली विवाद में सांप्रदायिकता के शोले जोर-जोर से भड़क रहे हैं। पहले लगा कि ये छिटपुट घटनाएं हैं जो वक्त के साथ खत्म हो जाएंगी पर अब लगता है कि बेशक चिंगारियां खुद ही फूटी हों लेकिन इन्हें सुलगाए रखने की कोशिशें तेज हो गई हैं। जाने न सही अनजाने सही। मुंबई के आजाद मैदान में हजारों की भीड़ जुट गई और एक जहरीले बयान के बाद बेकाबू हो गई। दो लोग मारे गए और कई गंभीर रूप से घायल हुए। आरोप है कि भड़काऊ एसएमएस और एमएमएस का सहारा लेकर इन्हें यहां जमा किया गया। अभी मुंबई बीता भी नहीं....
बीते साल अगस्त का महीना था। रामलीला मैदान में अन्ना लगातार हुंकार भर रहे थे, सरकार-विपक्ष सब बिना तोप-तलवार के ही घुटनों पर थे। संसद ने एक मत से एक रिजोलूशन पास किया। ये मेरे लिए ही नहीं उन सबके लिए चौंकाने वाली चीज थी जिन्होंने जेपी और उनसे पहले के आंदोलनों को नहीं देखा। जिन्होंने नहीं देखा कि सरकारें हकीकत में संसद से सड़क तक किस तरह जनमत की मोहताज होती हैं। उसी मैदान में सही मायने में देश में एक तीसरी ताकत का उदय हुआ जिसे हम टीम अन्ना कहते हैं। तीसरी ताकत बनी टीम अन्ना ने भारतीय लोकतंत्र को झकझोरने वाले कई सवाल उठाए हैं जिनमें करप्शन रोकने के लिए जनलोकपाल शामिल है। बेशक लोगों ने ही नहीं, मीडिया ने भी उनके अभियान को हाथोंहाथ लिया। बीते साल जंतर-मंतर पर जब अन्ना, अनशन पर बैठे तो गुजरते घंटों के साथ वक्त के माथे पर ऐसी लकीर....
....मैं छोटे से घर में रहता हूं। हर रोज काम की तलाश में घर से निकलता हूं। देर शाम तक काफी मेहनत करके अपने परिवार के लिए दो रोटी का जुगाड़ करके लाता हूं। मेरा कोई बड़ा बैंक बैलेंस नहीं है। मुश्किल से अपने बच्चों की फीस दे पाता हूं। काम पर होता हूं कि घर के सिलेंडर, शाम की सब्जी और बच्चों की कॉपी-पेंसिल की चिंता मुझे सताती रहती है। बेशक पहले से मेरे हालात सुधरे हैं। पहले हमारे यहां चूल्हा होता था लेकिन अब मेरी पत्नी गैस सिलेंडर और कुकर का इस्तेमाल करती है। बच्चे मेरे सीबीएसई में न सही, अंग्रेजी मीडियम बताने वाले स्कूल में तो पढ़ते ही हैं। हां, मैंने तरक्की की है लेकिन खर्चों ने उससे ज्यादा तरक्की की है। लेकिन अभी किसी शिकायत पर मुझे पुलिस स्टेशन जाते हुए डर लगता है। कोर्ट-कचहरी आज भी मुझे डराते हैं। बिजली निकम्मी आज भी वैसी है,....









