दो फैसले। एक फैसला सरकार के पक्ष में और दूसरे ने सरकार का नूर फीका कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 2-जी स्पेक्ट्रम आबंटन मामले में सभी 122 लाइसेंस रद्द कर दिए और ट्रायल कोर्ट ने गृह मंत्री पी चिदंबरम को साफ बरी कर दिया, उन्हें जेल में बंद पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा के साथ सह-आरोपी बनाने से मना कर दिया। दोनों ही फैसले अहम हैं। अगर चिदंबरम को क्लीन चिट नहीं मिलती, तो सरकार के लिए सत्ता में बने रहना मुश्किल हो जाता और चिदंबरम का अपने पद पर टिकना नामुमकिन। हालांकि याचिकाकर्ता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि वह इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे और उन्हें उम्मीद है कि अंत में सफलता पाएंगे। लेकिन यह अब भविष्य की बात है। 2-जी आबंटन मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सवाल यह कि सरकार में कैसे फैसले होते हैं? सवाल यह कि गठबंधन की....
वो स्कूल टीचर थे। पहलवानी का शौक था। राजनीति में आ गए और मुख्यमंत्री भी बन गए। मुलायम सिंह यादव का ये छोटा सा परिचय है। उत्तर प्रदेश का मौजूदा चुनाव शायद उनके राजनीतिक जीवन का आखिरी चुनाव हो। वो उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां अपनी विरासत को सौंपने का वक्त हो जाता है। मुलायम सिंह यादव ने देरी भी नहीं की है और अपने बेटे को विरासत एक तरह से सौंप भी दिया है। वो समाजवादी भी थे। थे इसलिए कि अब उनको समाजवादी कहना समाजवाद के साथ बेमानी होगा। मुलायम शायद इस बात का बुरा भी मानें लेकिन क्या करें? राजनीति ने उनके अंदर के समाजवादी को बहुत पहले मार दिया था। वो भी उन लोगो में शामिल हो गए जो चुनाव के मौसम के हिसाब से चोला कुछ पहनते हैं, कहते कुछ हैं और असल जिंदगी में होते कुछ हैं। मुलायम एक संभावना का नाम....
बड़े दिनों के बाद उमा भारती को टीवी पर चहकते हुए देखा। आत्मविश्वास से लबालब। एक जमाना था, जब उमा का जलवा था, लेकिन पिछले कुछ साल उनके लिए बहुत खराब बीते। पहले मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुरसी गई, फिर बीजेपी से ही बाहर हो गईं। अलग पार्टी बनाई। पर न पार्टी चली और न ही बीजेपी को इसकी वजह से नुकसान हुआ। लोग उनको भूलने लगे। कभी फायर ब्रांड नेता के नाम से मशहूर उमा के लिए सारे दरवाजे बंद हो गए। जो कभी अयोध्या मसले पर अपने जोशीले भाषणों के लिए जानी जाती थीं, वह अपने ही कार्यकर्ता को थप्पड़ मारने के लिए अखबारों की सुर्खियां बनने लगीं। उमा संन्यासिन कहलाना पंसद करती हैं, मगर राजनीति में एक दौर ऐसा भी आया कि वह वाकई संन्यास आश्रम में चली गईं। भला हो नितिन गडकरी का कि वह एक बार फिर सुर्खियों में हैं और उत्तर प्रदेश में....
उत्तर प्रदेश में इन दिनों चुनाव का माहौल है। और चर्चा ये गरम है कि क्या मायावती सरकार में दोबारा आएंगी? मायावती के बारे में सोचते ही मुझे कांशीराम याद हो आते हैं। वो कांशीराम जिन्होंने बीएसपी की नींव रखी और इससे बढ़कर दलित भी सत्ता में आ सकते हैं, उनकी सरकार बन सकती है, ये सपना देखा। ये वो सपना था जो उनके पहले देखा तो कई लोगों ने, लेकिन कभी उसे साकार नहीं कर पाए। कांशीराम मूलत पंजाब के रहने वाले थे। उन्होंने दलित आंदोलन की शुरुआत भी पंजाब से की। उन्हें पहली कामयाबी भी पंजाब में ही मिली। उनका पहला सांसद भी पंजाब से ही चुना गया था। पर कांशीराम के रडार पर उत्तर प्रदेश भी था और मध्य प्रदेश भी। महाराष्ट्र भी था और राजस्थान भी। विडंबना ये कि जहां से कांशीराम का दलित आंदोलन शुरू हुआ उस पंजाब में बीएसपी का कोई नाम लेने वाला....
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव इस बार एक बड़ी कहानी कहेंगे। बड़ी इसलिए कि साल 2014 की जमीन का रास्ता इसी राज्य से निकलेगा। देश में इस वक्त राजनीति गरम है। एक तरफ केंद्र सरकार से घोटालों के जबर्दस्त आरोप जुड़ गए हैं। उसे रह-रहकर जेपी आंदोलन और बोफोर्स राजनीति की याद सता रही है। डर है कि कहीं इस बार भी इतिहास उसके साथ वही न करे, जो 1977 और 1989 में किया था। ये डर कांग्रेस के लिए काफी बुनियादी हैं। 1977 के पहले केंद्र में कांग्रेस को हराने के बारे में सोचना भी गुनाह था। उस वक्त रजनी कोठारी जैसे राजनीति के विद्वान ने बाकायदा 'कांग्रेस सिस्टम' नाम का शब्द गढ़ लिया था। और दूसरी पार्टियों को विपक्षी पार्टी ही कहा जाता था, क्योंकि यह माना जाता था कि कांग्रेस केंद्र की राजनीति में सरकार बनाने वाली पार्टी है और दूसरी पार्टियां कुछ भी कर लें, वे....
इतिहास जब भी पलट कर 2011 की तरफ देखेगा उसे अपने पर गर्व होगा। उसे लगेगा कि उसने आम आदमी को कुछ ताकत दी, दंभी सरकारों को सबक दिया, लोगों को नई उम्मीद दी, नई जिंदगी दी, सत्ता में बैठे लोगों को तमीज सिखाई। सोई जनता अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर आई। दुनिया में नई किस्म की राजनीति शुरू हुई। जो बोल नहीं पाते थे वो अचानक सरकारें हिलाने लगे। अपने देश में भी इसकी धमक सुनाई दी। अन्ना नाम का एक शख्स पैदा हो गया। लोग उससे जुड़ने लगे। दंभ का चेहरा स्याह पड़ने लगा। लोग सड़कों पर उतरे तो चौवालिस साल से ठंडे बस्ते में पड़ा लोकपाल सरकार के गले की हड्डी बन गया। अन्ना ने लोगों को नया एहसास दिया कि बिना गोली, बंदूक चलाए भी सरकार को सोते से जगाया जा सकता है। नक्सली होने की जरूरत नहीं है। जंतर-मंतर पर जब अन्ना बैठे तो....
17 दिसंबर 2010, वो तारीख जिसने एक नई क्रांति की शुरुआत की। इस दिन मध्यपूर्व एशिया में ट्यूनीशिया के एक शहर सिड बौजीज में एक 26 साल के गरीब सब्जी बेचने वाले को सत्ता और ताकत के नशे में चूर एक पुलिस वाली ने सरेआम बेइज्जत किया था। मोहम्मद बौजीजी का कुसूर बस इतना सा था कि उसने एक अहंकारी पुलिस वाली को घूस देने से इंकार कर दिया था। पुलिस ने उसके गालों पर थप्पड़ जड़ा, गालियां बकीं, उसके मुंह पर थूक दिया। उसने शिकायत करने की कोशिश की, उसको दुत्कार मिली। बौजीजी ने स्थानीय प्रशासन के हेड क्वॉर्टर्स के सामने खुद पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा ली। उसकी मौत ने पूरे ट्यूनीशिया में हाहाकार मचा दिया। लोग सड़कों पर उतर आए और बीस साल से ज्यादा सत्ता पर काबिज राष्ट्रपति बेन अली को देश छोड़कर भागना पड़ा। मिस्र में भी लोगों ने तहरीर चौक को अपने कब्जे....
लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार सीएनएनआईबीएन के फंक्शन इंडियन आफ द ईयर में मुख्य अतिथि थीं। इस फंक्शन में अन्ना हजारे और उनकी टीम को भी होना था। अन्ना को इंडियन आफ द ईयर चुना गया था। फंक्शन के एक दिन पहले मीरा कुमार के यहां से संदेश आया कि वो नहीं आ सकतीं। कारण कुछ साफ नहीं बताया गया। जब फंक्शन शुरू हुआ तो कांग्रेस का एक भी नेता बुलाने के बाद भी नहीं आया। पता चला कि अन्ना की मौजूदगी इसका कारण था। मैं हैरान था। क्या यही लोकतंत्र है, क्या लोकतंत्र में मुद्दों पर मतभेद नहीं होते, क्या तीखी आलोचनाएं नहीं की जाती हैं, अन्ना और उनकी टीम का कसूर क्या है, उन्होंने सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन ही तो किया है, सिर्फ इसलिए ही कांग्रेस के लिए अछूत हो गए? मुझे कांग्रेस के नेताओं के आचरण पर हैरानी हुई। क्योंकि मैं कांग्रेस को जवाहर लाल....
संसद की स्थाई समिति ने संसद में लोकपाल का नया ड्राफ्ट क्या रखा टीम अन्ना जंतर मंतर पर धरने पर जा बैठी, ये गुनगुनाते हुए- गजब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया। टीम अन्ना को याद आ रहा था संसद में पास हुआ 'सेंस-आफ-द-हाउस' यानी 'संसद-का-वादा'। साथ ही अन्ना को लिखी प्रधानमंत्री की चिट्ठी, वो चिट्ठी जो विलास राव देशमुख दूत बन के लाए थे जिसमें ये वादा किया गया था कि सरकार लोकपाल बिल में अन्ना की तीन मांगों को शामिल करेगी। तीन मांगे - एक, निचले स्तर की नौकरशाही को लोकपाल में शामिल करना। दो, आम जनता को सरकारी दफ्तरों में काम करवाने के लिए जो धक्के खाने पड़ते हैं और जो घूस देनी पड़ती है उसके निवारण के लिए 'सिटीजन-चार्टर' लागू करना और तीन, राज्यों में लोकपाल बिल के तहत लोकायुक्त की नियुक्ति। प्रधानमंत्री की इस चिट्ठी के बाद अन्ना ने आमरण अनशन खत्म कर दिया। लेकिन....
सोनिया गांधी राजनीति में आएं इसका इंतजार राजीव गांधी की मौत के बाद से ही होने लगा था। उन पर दबाव भी काफी था लेकिन वो नहीं आईं। नरसिंम्हाराव और सीताराम केसरी का नेत्तृत्व कांग्रेस ने कुछ समय के लिए स्वीकार किया लेकिन जब कांग्रेस को लगा कि केसरी से नहीं चलेगा, पार्टी डूब जाएगी तब सोनिया को जबर्दस्ती पार्टी की कमान सौंप दी गई। सोनिया की राजनीति में एंट्री संकोच के साथ हुई थी। कहीं इतिहास बोध काम कर रहा था तो कहीं पति की विरासत को बचाये रखने की जिजीविषा थी। शुरू में काफी लोगों ने ये उम्मीद भी जताई कि वो ज्यादा समय तक नहीं चल पाएंगीं। या तो वो खुद हार जाएंगी या फिर हरा दी जाएंगीं। राजनीति में एक सोच ये भी थी कि एक विदेशी को लोग स्वीकार नहीं करेंगे। इन अटकलों के बीच 2004 में सोनिया की अगुआई में कांग्रेस केंद्र की सत्ता....









