आशुतोष
Tuesday , January 21, 2014

राजनीति में क्यों आया मैं


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कभी सोचा भी नहीं था कि राजनीति में जाऊंगा। जो नहीं सोचा था, हो गया। हैरान हूं। बचपन में राजनीति में मेरी रुचि नहीं थी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पहुंचते ही राजनीति से मेरा परिचय हुआ। मुद्दों, नेताओं और पार्टियों को समझने का वक्त मिला। जैसै-जैसे समझता गया, लगा कि राजनीति मेरे बस की चीज नहीं है। पर जब परिवार की मर्जी के खिलाफ पत्रकारिता में आया, तो राजनीति को काफी करीब से देखने का मौका मिला। बड़ी-बड़ी घटनाओं का गवाह बनने लगा। राजनेताओं से जान-पहचान होने लगी। मन में बात और पुष्ट हो गई कि जिस तरह की राजनीति चल रही है, इससे मेरी दोस्ती नहीं हो सकती। पत्रकारिता में 20 साल गुजर गए। 2011 के अप्रैल महीने में अन्ना हजारे के दिल्ली में अनशन की बात सुनी। तब मैं आईबीएन-7 में संपादक था। अनशन के एक दिन पहले प्राइम टाइम में अनशन और भ्रष्टाचार पर डिबेट तय हुई। अरविंद....

Monday , January 06, 2014

आप का तिलिस्म और खतरे की घंटी


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विंस्टन चर्चिल कहते थे कि राजनीति में एक हफ्ता लंबा समय होता है। यही बात अब भारतीय राजनीति में भी सही साबित हो रही है। आठ दिसंबर के बाद के चार हफ्तों में राजनीति काफी बदल गई है। मतगणना के समय किसी ने सोचा नहीं था कि राजनीति में कोई बड़ा बदलाव आने वाला है। लेकिन आम आदमी पार्टी यानी 'आप' की जीत ने पूरा माहौल बदल दिया है। एक साल पहले बनी पार्टी का नेता मुख्यमंत्री होगा, यह अकल्पनीय था। पर जैसे-जैसे आठ दिसंबर को वोटों की गिनती परवान चढ़ने लगी, सोच पर जमी मैल खुरची जाने लगी और नीचे की सतह चमकने लगी। आज नए साल में यह कहा जाने लगा है कि एक बड़ी राजनीतिक क्रांति ने देश में दस्तक दे दी है और लोकसभा चुनावों में भी यह दस्तक अपना असर दिखाएगी। जो लोग अन्ना आंदोलन के समय पूरे आंदोलन को एक बुलबुला साबित कर रहे....

Monday , December 30, 2013

रामलीला मैदान में मिथ ध्वस्त


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दिल्ली के रामलीला मैदान में घूम रहा था। अरविंद केजरीवाल का शपथ ग्रहण चल रहा था। मुझे दो साल पहले का वो दिन याद आ रहा था। अन्ना हजारे अनशन पर बैठे थे। हजारों की भीड़ थी और संसद चल रही थी। कहीं किसी कोने एक स्पंदन दिख रहा था। लेकिन राजनेता और राजनीतिक दल अन्ना हजारे के आंदोलन का मजाक उड़ाने में लगे थे। उनके निशाने पर सबसे ज्यादा थे अरविंद केजरीवाल। और सबसे बड़ा तर्क यही दिया जा रहा था कि आंदोलन करना आसान है और चुनाव लड़ना मुश्किल। नेतागण ऐसा आभास दे रहे थे मानो चुनाव महामानव ही लड़ सकते हैं। अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम ने चुनाव लड़ा और दिल्ली में 28 सीटें जीतकर ये जता दिया कि सत्ता तंत्र ने जिस चुनाव को महामानवों का खेल बना रखा था दरअसल वो आम आदमी का चुनाव ही है। आम आदमी पार्टी की जीत ने ये साबित....

Tuesday , December 24, 2013

आप का प्रयोग और बुद्धि बलिहारियों की कसौटी


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इतिहास की गति कभी सीधी नहीं होती। इतिहास हर दौर में नई दिशा और नया मुकाम चुनता है। आज जब आम आदमी पार्टी दिल्ली में सरकार बनाने की तैयारी कर रही है, तो एक नजर पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रमों पर डालनी जरूरी है, जिससे स्थिति यहां तक पहुंची। यह इसलिए भी जरूरी है कि आप को इस बीच कई तरह की आलोचनाओं से गुजरना पड़ा। पिछले दिनों जब दिल्ली में सरकार बनाने के लिए आप के नेता अरविंद केजरीवाल को बुलावा आया और जब अरविंद ने दिल्ली की जनता से जनमत संग्रह का ऐलान किया, तो कई लोगों के मुंह फिर पिचक गए। कहने लगे ये नौटंकी बंद होनी चाहिए। लोकतंत्र में तमाशा ज्यादा नहीं चलता। चुनाव और सरकार बनाना एक गंभीर काम है और उसे इस तरह से ड्रामे से अगंभीर नहीं बनाना चाहिए। मगर लोकतंत्र और जनता के नाम पर पिछले कुछ साल से जो कुछ चलता....

Monday , December 16, 2013

आप की दुविधा और शेर की सवारी


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दिल्ली में फिलहाल सरकार नहीं बनेगी। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है फिर भी उसने सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया। 'आप' दूसरे नंबर की पार्टी है। कांग्रेस के आठ विधायक उसकी मदद को तैयार हैं। 'आप' को उपराज्यपाल ने बुलाया भी पर उसने बजाय सरकार बनाने के नया पेच फंसा दिया। 'आप' ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को चिट्ठी लिखकर अठारह मुद्दों पर राय मांगी है यानी मेरे मुद्दों पर सहमति हो तो फिर आगे की बात की जाए। ये एक खूबसूरत बहाना है। आम आदमी पार्टी किसी भी हालत में कांग्रेस पार्टी या फिर बीजेपी की मदद से सरकार बनाते हुए नहीं दिख सकती। ये आत्महत्या होगी। दिक्कत ये है कि बिना शर्त समर्थन मिलने के बाद अगर वो सरकार बनाने की कोशिश नहीं करती तो आरोप ये होगा कि वो जिम्मेदार पार्टी नहीं है और बिना किसी कारण के दिल्लीवालों के सिर....

Tuesday , December 10, 2013

एक पत्थर तो तबीयत से उछला है...


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माओ कहते थे कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। दिल्ली की सड़कों पर नया मुहावरा है कि सत्ता झाड़ू की डंडी से बहती है। कुछ दिन पहले ये कहा जाता तो लोग हंसते लेकिन आज ये सच है, और लोगों के चेहरे पर खिलखलाकर हंस रहा है। वो लोग भी हंस रहे हैं जो कुछ समय से लगातार कह रहे थे कि अन्ना का आंदोलन एक बुलबुला था। पानी का बुलबुला जिसकी जिंदगी पल भर होती है। शायद पानी और सामाजिक आंदोलनों में यही फर्क होता है। अन्ना की अगुआई में जब 2011 में जंतर-मंतर पर आंदोलन हुआ था तो इसको गाली देने वालों की कमी नहीं थी। कहा गया कि ये एनजीओ की बारात है जिसका कोई भविष्य नहीं है। मैंने तब भी कहा था कि इस आंदोलन की जड़ें गहरी हैं क्योंकि समाज में काफी कुछ बदल रहा है। समाज की सोच बदल रही है। लोगों....

Monday , December 09, 2013

विधानसभा चुनाव, बदलाव को बेकरार


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विधानसभा चुनावों के नतीजों के चार संकेत हैं। पहला संकेत, भारतीय राजनीति से सामंती संस्कृति के अंत की शुरुआत हो गई है। माई-बाप की संस्कृति के दिन लद गए, यानी लॉलीपॉप के लोभ को मतदाता समझने लगे हैं। दूसरा संकेत, जनता स्थापित राजनीति से त्रस्त है। उसे एक नए विकल्प की तलाश है। तीसरा संकेत, मोदी के करिश्मे की अपील सीमित है। चौथा संकेत, राहुल को अभी बहुत सीखना है और इसके लिए उनके पास समय बहुत कम है। कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए वाकई यह खतरे की घंटी है। राजस्थान और दिल्ली, दोनों में उसका सूपड़ा साफ हो गया है। राजस्थान में तो अशोक गहलोत शुरू से ही डांवांडोल थे। अंतिम दिनों में गहलोत ने मुफ्त दवा देने की योजना का ऐलान किया था, पर उसका जादू चला नहीं। कांग्रेस पार्टी के लिए सबसे चौंकाने वाला रहा है दिल्ली का परिणाम। शीला दीक्षित के आलोचक भी यह नहीं....

Monday , December 02, 2013

तेजपाल- स्त्री सिर्फ सेक्स नहीं, अस्तित्व भी


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तरुण तेजपाल को जिस तरह की प्रेस कवरेज मिली है उसने कई सवालों को जन्म दिया है। सवाल, क्या ये बहस सिर्फ महिला उत्पीड़न और कामकाजी महिलाओं के अधिकारों तक ही सीमित है? क्या मुद्दा बस इतना भर है कि दफ्तरों में काम करने वाली महिलाएं सुरक्षित हैं या नहीं? ऊंचे पदों पर बैठे ताकतवर लोग महिलाओं का शोषण करते हैं या नहीं? ऐसी कितनी उत्पीड़ित महिलाएं हैं जो भारतीय सामाजिक तानेबाने की वजह से ऐसे अपराधों के खिलाफ आवाज बुलंद कर पाती हैं? और अगर करती हैं तो क्या उनको न्याय मिलता भी है या नहीं? क्या ऐसी पीड़ित महिला के पक्ष में समाज खड़ा भी होता है या नहीं? और क्या सिर्फ उन्हीं मामलों पर शोर होता है जहां महिला पढ़ी-लिखी है और शहरों में रहती है? तेजपाल की कवरेज इसलिए भी चौंकाती है कि वो कोई नामचीन क्रिकेटर नहीं है, न ही वो कोई फिल्म स्टार....

Monday , November 25, 2013

विकल्प की अकाल मौत की कोशिश


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आम आदमी पार्टी यानी 'आप' के लिए यह संकट का समय है। कई लोग काफी खुश हैं, खासतौर से वे लोग, जो शुरू से ही 'आप' को संदेह की नजर से देखते थे। कुछ वे भी हैं, जो इससे ईष्र्यादग्ध थे और अरविंद केजरीवाल की कामयाबी से जल रहे थे। कई ऐसे भी हैं, जो केजरीवाल की कामयाबी से जुड़कर अपनी कामयाबी का रास्ता तलाश रहे थे और जब एंट्री नहीं मिली, तो उसको बरबाद करने में जुट गए। पर ये हमले पहली बार नहीं हुए हैं। पहले भी गंभीर आरोप लगे और आगे भी लगेंगे। लेकिन चुनाव के ठीक पहले इस संकट ने एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। सवाल साख का है, और राजनीतिक मजबूती का भी है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या इस संकट का सामना करने का माद्दा 'आप' के नेतृत्व में है? मुझे ध्यान है कि जब अन्ना ने आंदोलन शुरू किया....

Monday , November 18, 2013

हां, मैंने सचिन को खेलते देखा है


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हां, मैंने सचिन को खेलते हुए देखा है। आने वाली पीढ़ियां जब मुझसे पूछेंगी कि क्या मैंने सचिन को खेलते हुए देखा है तो मैं गर्व से कह सकूंगा कि हां, मैंने उसे खेलते हुए देखा है। एक बार नहीं अनेक बार। उसका पंजों पर उछलकर बालर बैक ड्राइव देखा है। बिजली की तरह घूमकर स्क्वैयर लेग पर पुल करते देखा है। चीते की तरह स्क्वैयर लेग की तरफ पीछे हटते हुए कवर और प्वाइंट के बीच से गोली की तरह गेंद निकालते देखा है। हां, मैंने वनडे में सचिन को 200 रन बनाते देखा है। बच्चे मेरी बातों को सुनकर दांतों तले उंगलियां दबा लेंगे और मुझसे ईर्ष्या करेंगे और मैं उनके मासूम जलन पर खुश होऊंगा। उनमें से शायद कुछ होंगे जो मेरी बातों पर यकीन नहीं करेंगे। जैसे आज की पीढ़ी गांधी जैसा फरिश्ता जमीन पर दो डग चला था, इस पर यकीन नहीं करती। और उन्हें....

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आशुतोष के बारे में कुछ और

आशुतोष आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। वह IBN7 में मैनेजिंग एडिटर के पद पर रह चुके हैं। आईबीएन7 से जुड़ने से पहले आशुतोष एक प्रमुख खबरिया चैनल आजतक की टीम का हिस्सा थे। वह प्राइमटाइम के कुछ खास ऐंकर्स में से एक थे। ऐंकरिंग के अलावा फील्ड और डेस्क पर खबरों का प्रबंधन उनकी प्रमुख क्षमता रही। वह भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक खबरों की कवरेज से जुड़े रहे हैं।
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