जब भी मैं वरुण गांधी को देखता हूं, मुझे संजय गांधी की याद आती है। आज की पीढ़ी के लिए एक मिथक। अगर आज संजय जिंदा होते तो भारत का इतिहास शायद कुछ और होता। सोनिया गांधी नहीं होतीं और न ही होती राहुल और प्रियंका की चर्चा। राजीव गांधी की कोई विरासत भी नहीं होती। संजय जिंदा होते तो संजय का ही नाम होता और उनके बाद उनकी पत्नी और बेटे वरुण का नाम। उनपर बहसें होतीं और इतिहास और भविष्य में उनके योगदान पर पोथे लिखे जाते। लेकिन संजय आज नहीं हैं। 23 जून 1980 को हवाई जहाज दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी। उस जहाज को वो खुद चला रहे थे और अचानक सुबह हादसा हो गया। ये जहाज उनको धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने भेंट में दिया था जिसकी वजह से बाद में ये अफवाह भी फैली थी कि संजय अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की साजिश का....
फेदरीको फेलिनी की फिल्म है - नाइट्स ऑफ कबीरिया। एक ऐसी लड़की की कहानी जो अपनी जिंदगी बदलना चाहती है, प्यार की तलाश में उसे हमेशा धोखा मिला। यहां तक कि उसके दो प्रेमियों ने उसे जान से मारने की कोशिश की। 1957 की फिल्म उस इटली की कहानी कहती है जहां दूसरे विश्वयुद्ध के बाद समाज संकट के दौर से गुजर रहा है। जीवन मूल्य क्षीण हो रहे हैं। और जिंदगी एक कश्ती की तरह इधर-उधर डोल रही है। जीवन एक संघर्ष है। जिसमें मुसोलिनी के समय का फंतासीवाद नहीं है। जहां सबकुछ अच्छा नहीं है। जहां जिंदगी एक सपना नहीं है। फेलिनी का सिनेमा यथार्थवादी सिनेमा है। जो जीवन की सच्चाईयों से आपको रूबरू कराने से भागता नहीं। जहां सबकुछ निराशावादी भी लग सकता है। बिलकुल उसी तरह जैसे आज का भारत। जहां घोर भ्रष्टाचार है। आगे निकलने की होड़ में जिंदगी सारे जीवन मूल्यों का त्याग करने....
आज मैं अपने आप से ये सवाल पूछना चाहता हूं कि सरबजीत सिंह कौन था? पाकिस्तान की जेल में बंद एक कैदी? एक आतंकवादी, जिसने फैसलाबाद और लाहौर में चार बम ब्लास्ट किए, जिनमें 14 पाकिस्तानी मारे गए? एक शराब तस्कर, जो भारत से पाकिस्तान की सीमा में घुसा था? एक मासूम, जिसे जानबूझकर आतंकवादी गतिविधियों में फंसाकर फांसी की सजा सुना दी गई? एक देशभक्त, जिसने भारतीय होने का हक अदा किया? पाकिस्तान में भारत का जासूस? या फिर एक ऐसा शख्स, जिसकी वजह से भारत-पाकिस्तान के रिश्ते खराब हो रहे हैं? आखिर कौन था सरबजीत सिंह? इस सवाल का जवाब मेरे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के दिनों में किसी की मौत पर इतना बड़ी खबर शायद ही बनी हो। उसकी मौत की खबर आते ही देशभर के टीवी चैनल पागलों की तरह उसे प्रसारित करने लगे। उसकी मौत पर राष्ट्रीय शोक मनाया गया। प्रधानमंत्री मनमोहन....
पिछले दिनों एक फिल्म देखी- फ्रॉस्ट/निक्सन। फिल्म वाटरगेट कांड की वजह से इस्तीफा दे चुके अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के टीवी इंटरव्यू पर आधारित है। इस फिल्म में टीवी एंकर डेविड फ्रॉस्ट निक्सन का इंटरव्यू करता है और उनसे यह कहलवाने में कामयाब होता है कि निक्सन ने वाटरगेट कांड में गलती की। हकीकत में जब साल 1977 में फ्रॉस्ट ने निक्सन का 27 घंटे का इंटरव्यू किया था, तब पूरी दुनिया में इसे लेकर तहलका मच गया था। शायद यह दुनिया में अब तक का सबसे ज्यादा देखा जाने वाला राजनीतिक इंटरव्यू है। दिलचस्प बात यह है कि निक्सन ने इस इंटरव्यू के लिए फ्रॉस्ट से साठ लाख डॉलर लिए थे और किस मसले पर कितनी बात होगी, यह पहले से तय था। सबकी नजर इस बात पर लगी थी कि निक्सन वाटरगेट पर अपनी गलती मानते हैं कि नहीं। फ्रॉस्ट अपने मिशन में काफी हद तक सफल रहे।....
पहले लड़ाई बहादुर लड़ते थे, अब 'ट्विटरबाज'। हो भी क्यों न, वर्चुअल वर्ल्ड का जो जमाना है। चुनावों का अभी ऐलान नहीं हुआ है पर लगता है कि वोट पड़ने के पहले ही जंग जीत ली जाएगी और वोटों की गिनती महज एक औपचारिकता होगी। किसी कोने कोई 'पप्पू' और दूसरे कोने से 'फेकू' नाम के जांबाजों का डंका बजने लगा है। नरेंद्र मोदी दिल्ली आते हैं और सलाह देते हैं कि 'वर्चुअल' समुदाय पर 13 करोड़ लोग हैं और उन तक पहुंचने की कोशिश की जानी चाहिए। तो जयपुर के कांग्रेस चिंतन शिविर में राहुल गांधी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की अहमियत बताते हैं और देखते ही देखते कांग्रेसियों की 'वर्चुअल' सेना तैयार हो जाती है। 'वर्चुअल' की इस लड़ाई ने बीजेपी और कांग्रेस की जंग को 'सेक्सी' बना दिया है। और ऐसा लगने लगा है कि अगर आप फेसबुक और ट्विटर पर नहीं हैं तो जिंदगी की खूबसूरती....
आज ये कहना थोड़ी जल्दबाजी जरूर होगी कि नीतीश कुमार देश की चुनावी राजनीति के ध्रुवीकरण के नये नायक होंगे। लेकिन सारे संकेत इसी ओर इशारा कर रहे हैं। इसलिये मुझे कोई हैरानी नहीं होगी अगर आने वाले दिनों में नीतीश कुमार की चर्चा प्रधानमंत्री पद के तमाम स्वयंभू दावेदारों से कम न हो। नीतीश कुमार फिलहाल बीजेपी के साथ हैं। वो बिहार के मुख्यमंत्री हैं। बीजेपी और जेडीयू का ये साथ काफी पुराना है। नीतीश कुमार कभी केंद्र की एनडीए सरकार में मंत्री थे। पर उनकी नजर हमेशा बिहार के मुख्यमंत्री पद पर गड़ी रही। बीच में कुछ दिनों के लिए वो बिहार के मुख्यमंत्री भी बने थे लेकिन तब बहुमत नहीं मिलने से लालू परिवार के लिए फिर गद्दी छोड़नी पड़ी थी। आज वो कुर्सी पर काबिज हैं और लालू यादव वापसी के सपने देख रहे हैं। नीतीश कुमार राममनोहर लोहिया की गैर कांग्रेसवाद राजनीति की उपज....
राहुल गांधी को 10.45 पर सीआईआई में बोलना था और सबको उनके भाषण का इंतजार था। लेकिन ट्विटर और दूसरे सोशल मीडिया पर सुबह से ही राहुल गांधी के खिलाफ एक खास तबके ने गाली गलौच शुरू कर दी थी। ये कौन लोग हैं बताने की जरूरत नहीं। सब जानते हैं। ऐसे में जैसे ही राहुल गांधी ने बोलना शुरू किया उनके भाषण की धज्जियां उड़ाने का काम चालू हो गया। उधर से राहुल समर्थक भी जुट गए। दोपहर तक राहुल समर्थक और राहुल विरोधियों के ट्विटर मैसेज ट्रेंड करने लगे। और देर शाम तक नरेंद्र मोदी ने भी इस बहस में शिरकत कर दी। उन्होंने कहा कि अब तक उन्होंने गुजरात का कर्ज उतारा है, अब वो देश का कर्ज उतारने के लिए तैयार हैं। फिर वही खेल शुरू हो गया। ये खेल दिलचस्प है। क्योंकि अभी तक बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने ही न तो मोदी को....
चुनाव की आहट सुनाई पड़ने लगी है। तमाम पहलवान अखाड़े में ताल ठोक रहे हैं। मुलायम सिंह यादव कांग्रेस को पानी पी-पीकर कोस रहे हैं, तो नीतीश कुमार भी खामोश नहीं हैं। कांग्रेस ने बेनी प्रसाद वर्मा को छोड़ रखा है। डीएमके पार्टी सरकार से समर्थन वापसी कर ही चुकी है। जयललिता रोजाना श्रीलंका के बहाने तमिल वोटों की फसल काटने की तैयारी में जुटी हैं। नरेंद्र मोदी का तो कहना ही क्या? आजकल रोज विदेशी रायनयिक उनसे मिलने आते हैं, मानो मोदी को पूरी दुनिया ने अगला प्रधानमंत्री मान लिया है। यह अलग बात है कि 'स्पॉन्सर्ड-ट्रिप' की खबर हवा को थोड़ा कसैला बना देती है। इन सबके बीच तीन बातें स्पष्ट नजर आती हैं। एक, केंद्र सरकार फिलहाल इलेक्शन मोड में है। उसे नए नारे की भी तलाश है, जो उसे लगातार तीसरी बार चुनाव जितवा सके। कभी वह खाद्य सुरक्षा विधेयक की बात करती है, तो कभी....
बड़े दिनों के बाद महेंद्र सिंह धोनी और सचिन तेंडुलकर को एक साथ एक मंच पर देखा। मौका था विमल कुमार की सचिन पर आई किताब - सचिन-ए क्रिकेटर ऑफ सेंचुरी के विमोचन का। इस मौके पर सचिन तो नहीं बोले लेकिन उनको आम लोगों के साथ बातचीत करते सुना। सचिन में एक झिझक दिखी औऱ साथ ही आम लोगों से बातचीत करते हुये सतर्कता भी। उनको देख कर लगा वो कुछ भी कहने से पहले नापतौल लेते हैं। समझबूझ लेते हैं। कहीं उनकी बात को गलत तो नहीं लिया जाएगा। कहीं कोई दूसरा अर्थ न लगा ले। कहीं कोई विवाद न खड़ा हो जाए। उनकी 'बॉडी लैंग्वेज' साफ कह रही थी कि वो सबके सामने अपने दिल को खोलने को तैयार नहीं हैं। और न ही वो अपने को अजनबियों के बीच सहज पाते हैं। वो शायद हमेशा इस एहसास के साथ जीते है कि उन्हें रिजर्व रहना चाहिए।....
सोनिया गांधी ने पार्टी अध्यक्ष के नाते पंद्रह साल पूरे कर लिए हैं और नौ साल से कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार केंद्र में बनी हुई है। सोनिया ने यह काम उस युग में किया है, जब बीजेपी के पास वाजपेयी और आडवाणी जैसे तपे-तपाए नेता थे। और कांग्रेस पार्टी कभी भी अपने बल पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी। इंदिरा गांधी की तरह सोनिया गांधी को भी शुरू-शुरू में कमजोर आंका गया। लेकिन सोनिया ने सबको गलत साबित कर दिया। यह सच है कि सोनिया की सबसे बड़ी ताकत है, उनका नेहरू-गांधी परिवार का बहु होना है। और इस नाते आज भी कांग्रेस को वोट पड़ते हैं। जो फायदा राजीव गांधी की मौत के बाद कांग्रेस की अगुवाई करने वाले नरसिंह राव और उनके बाद पार्टी अध्यक्ष बने सीताराम केसरी को नहीं था। ऐसे में, जब उनके नाम पर वोट नहीं पड़े या नहीं पड़ने का खतरा....









