वसंत विहार चलती बस में गैंग रेप के मामले ने दिल्ली ही नहीं देश भर को हिला दिया है। मामला है भी इतना सनसनीखेज जिसकी गर्माहट धीरे-धीरे मगर जोरदार चढ़ी। केस दर्ज हुआ और आरोपी पकडे़ भी गए। बड़ी हस्तियों ने चैनलों पर और बाहर अपना ज्ञान भी दिया। सबने यहां तक कहा और दिल्ली के पुलिस कमिश्नर तक ने डिमांड रखी कि इस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो। एक डिमांड ये भी कि बलात्कार के लिए कड़ा कानून बने। बिल्कुल सही बात है ऐसे मामलों की सुनवाई जल्द से जल्द होनी चाहिए और कानून भी कड़े बनने चाहिए लेकिन इन सबके बीच आज जो सबसे अहम बात की कमी खल रही थी वो ये कि कोई भी ऐसी घटनाएं दिल्ली या देश में ना हो इसके उपायों पर बात नहीं कर रहा था। कानून की सख्ती का डर निश्चित रूप से होता है मगर....
हु़डको प्लेस में सेना मुख्यालय के डिप्टी डायरेक्टर और उनकी पत्नी की लाश का मामला पुलिस की नजर में चाहे जो निकले मगर इसके शुरुआती निष्कर्ष तो यही हैं कि डिप्टी डायरेक्टर ने पहले पत्नी को मारा और फिर खुदकुशी कर ली। एक बात आपको बता दें कि डिप्टी डायरेक्टर की शादी लव कम अरेंज मैरिज थी। वो अपनी पत्नी को जब वो 8 साल की थी तब से चाहते थे। ये चाहत शादी में बदली कुछ साल पहले ही। फिर ऐसी क्या बात हो गई कि 24 साल के प्यार का कत्ल कर दिया गया और फिर खुद की जान भी ले ली गई। इस मामले ने मुझे सात साल पहले एम्स के फोरेंसिक विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर सुधीर गुप्ता की कही हुई बात याद दिला दी आपको भी बता दूं। उन्होंने कहा था कि व्यक्ति को अपना सबकुछ या प्यारी चीज खोने का अहसास खुदकुशी से कत्ल तक....
लिखना तो नहीं चाहता था मगर लिखना अब जरूरी सा लगता है। हाई कोर्ट धमाके की जांच के लिए दिल्ली पुलिस ने स्पेशल टीम बनाई है। टीम में उन अफसरों को शामिल किया गया है जो एक समय में टेरर संबंधी मामलों को सुलझाने के लिए सुपर कॉप कहे जाते थे। इस टीम के बनने के बाद एक बात जो सबसे पहले याद आती है या यूं कहें कि जेहन में जो सवाल उभरता है वो 8 साल पहले का है। तब दिल्ली के पुलिस कमिश्नर होते थे आर एस गुप्ता और 14 अक्टूबर 2003 को एक सनसनीखेज कांड हुआ था। लोग इसे सीरीफोर्ट रेप कांड के नाम से जानते हैं। इसी केस से दिल्ली में स्केच बनाने की प्रैक्टिस भी शुरू हुई थी। उस समय वर्तमान दिल्ली पुलिस कमिश्नर बी के गुप्ता दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के ज्वाइंट सीपी थे। मुझे अच्छी तरह याद है कि पूरी....
एक खबर है-तीन साल में दिल्ली के 500 पुलिसवाले गिरफ्तार हुए विभिन्न अपराधों में। खबर के आगे इसका ब्रेकअप भी है 2007 में 116, 2008 में 251 और 2009 में 133...। ये खबर किसी रिपोर्टर या किसी मीडिया की नहीं बल्कि राज्यसभा में दिए गए पुलिस के ही आंकड़े हैं। बड़ी बात ये कि विभिन्न अपराधों में गिरफ्तार हुए पुलिसवालों के इस आंकड़े में करप्शन में गिरफ्तार होने वाले पुलिसवालों की संख्या 205 है यानी आधे से भी कम। एक और बात ये सभी निचले स्तर के पुलिसवाले हैं यानी इंस्पेक्टर स्तर तक के। इस खबर ने दो सवाल खड़े किए हैं पहला क्या क्राइम में लिप्त पुलिसवालों की संख्या बढ़ रही है। दूसरा ये कि क्या करप्शन से ज्यादा पुलिसवाले क्राइम में रूचि ले रहे हैं। इस खबर और इन सवालों का मंथन करने से पहले एक बात याद आ रही है लंदन के एक पूर्व पुलिस....
घूम फिर कर वही एफआईआर फिर से कुछ लिखने के लिए मजबूर कर रही है। शायद जिसके सहारे अब तक सब कुछ चल रहा है। एक क्राइम रिपोर्टर की जिंदगी में इससे ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ है भी नहीं। अपने लोगों में अपनी वैल्यू बनाए रखने और अपनी नौकरी में खबर पाने के लिए एफआईआर का महत्व तो कोई क्राइम रिपोर्टर से पूछे। जी हां, एफआईआर। एफआईआर जिसकी महत्ता सिर्फ क्राइम रिपोर्टर के लिए ही नहीं, हर उस शख्स के लिए अहम है जो किसी हादसे का शिकार हुआ हो। अहम ये पुलिस के लिए भी है तभी तो कोई पुलिस एफआईआर जल्द से दर्ज नहीं करना चाहती और हादसों के शिकार हुए लोगों को हमारे जैसे लोगों से सिफारिश करवानी पड़ती है। भगवान न करे मगर इसे पढ़ने वाले जिन-जिन लोगों का सामना किसी हादसे से हुआ हो उनमें से अधिकांश लोग इस एफआईआर का भाव भी अच्छी....
मंगलवार को 65 साल के लक्खा सिंह और उनकी पत्नी ने खुदकुशी कर ली। यह खबर कोई बहुत बड़ी खबर नहीं थी मगर इस खबर ने बेचैन जरूर कर दिया। दिल कुछ कह रहा था और दिमाग पर जोर पड़ने लगा। याद आने लगे 7 साल पहले के वो दिन जब दिल्ली के बुजुर्गों के घर-घर जाकर उनकी हालत पर श्रृंखलाबद्ध स्टोरी। अखबार के तीसरे पन्ने पर जब सुबह इस स्टोरी की पहली कड़ी छपी थी तब बहुत सारे फोन आए थे। तब मेरा काम और आसान हो गया था। खैर, ये पुरानी बात है। मगर ठीक से याद है कि इन पुरानी बातों में एकाकीपन, दहशत, उपेक्षा आदि-आदि का दंश झेल रहे बुजुर्गों की व्यथा तो थी इनके खूंखार बदमाशों के आसान शिकार बनते जाने के मामले और कारण तो थे मगर इस वजह से सुसाइड की बात नहीं थी। लेकिन एक बात सच थी....
जादूगरी के खेल तो कई देखे हैं मगर पुलिस से बड़ा जादूगर शायद ही हो। जादूगरी ऐसी कि देखने वालों के होश उड़ जाएं। यकीन नहीं होता तो सुन लीजिए-1979 में दिल्ली की आबादी 40 लाख थी, इस साल दिल्ली के विभिन्न थानों में आईपीसी के कुल मुकदमे थे 44083 । करीब तीस साल बाद दिल्ली की आबादी है 1 करोड़ 67 लाख, इसके अलावा दिल्ली में हर दिन 20-30 लाख लोग आते-जाते हैं यानी करीब दो करोड़ लोगों की मौजूदगी के बाद दिल्ली के थानों में पिछले साल मुकदमे दर्ज हुए हैं 53244 । हुआ ना जादू! दिल्ली को क्राइम कैपिटल कहने वालों को तो अपने 'झूठ' पर सोचना चाहिए लेकिन कसूर इनका भी नहीं। भई दिल्ली में 1979 की बात करें तो क्राइम बढ़ाने वाले फैक्टर नहीं के बराबर थे। अब जब केवल आबादी ही नहीं बढ़ी, बढ़ गए हैं वो सारे फैक्टर जिसकी बिना पर....
ये डाबड़ी चौक था। लाल बत्ती हो चुकी थी लिहाजा मुझे गाड़ी रोकनी पड़ी। कुछ ही पल बीते थे कि दो हाथ कार के शीशे पर फैल गए। नन्हे हाथ कुछ मांग रहे थे, कुछ सोचता इसके पहले ही बत्ती हरी हो गई और मुझे वहां से चल देना पड़ा। मगर रास्ते भर वो दो नन्हे हाथ मेरी आंखों के आगे नाचते रहे। मीडिया में होने के बावजूद मेरे लिए यह खबर नहीं क्योंकि यह बिकेगी नहीं। खबर बेचने की परिपाटी जब से चल पड़ी है तब से ये खबरें नहीं की जातीं। बहरहाल मेरा मन और दिमाग दोनों में वो दो नन्हे हाथ छाए हुए थे और तब तक सागरपुर का चौक आ गया। वहां भी कई नन्हे बच्चे बच्चियों के हाथ कार के चालक सीसे पर फैले हुए थे कुछ लोग उन हाथों पर कुछ रख भी रहे थे। मेरी सोच जिंदगी के रफ्तार से कहीं तेज....
नौकरों द्वारा किए जाने वाली वारदातों का सिलसिला जोरों पर है। साथ ही जोर पर है उनके वेरीफिकेशन करवाने की सीख देने का काम भी। मगर वेरीफकेशन एक मनोवैग्यानिक दबाव के सिवा कुछ नही। दरअसल वेरीफिकेशन फार्म भरने या पुलिस में उसे जमा करवा लेने भर से ही आपराधिक मानसिकता के नौकरों पर काबू नही पाया जा सकता। क्योंकि सही मायने में इन फार्म का पुलिस वैरीफिकेशन होता ही नहीं। दिल्ली में सिर्फ 2 या 3 फीसदी ही वेरीफिकेशन फार्म का जवाब आता है। बाकी सारे फार्म संबधित थानों में पेंडिंग पड़े रहते हैं। दरअसल इसकी प्रक्रिया ही ऐसी है। वैरीफिकेशन फार्म में भरे हुए पत्ते के थाने से पुलिस संबंधित नौकर के बारे में जानकारी मांगती है। मगर बिहार, पंजाब, यूपी या नेपाल भी जवाब देने की जरूरत नही समझता। फिर अगर जिस आदमी के बारे में जानकारी ली जा रही है....
आरुषि-हेमराज हत्याकांड की जांच अब तक इतनी उलझ चुकी है कि उसके तह तक पहुंचना शायद ही संभव हो। होगा भी तो तब जब फारेंसिक जांच की रिपोर्ट आ जाए। खैर, इस पूरे हत्याकांड में शुरू से तफ्तीश हुई ही नहीं। अगर तफ्तीश हुई होती तो एक सबूत तो जरूर होता। जांच एजेसी के लिए सबसे बड़ी बिडंबना यही है कि सबूत के नाम पर कुछ नहीं। हो भी कैसे रूरल बैकग्रांउड के अफसरों को अचानक अरबन वैल्यू के मामले की तफ्तीश दी जाएगी तो यही होगा। इस केस में पुलिस ने तो मानो क्राइम का इंवेस्टिगेशन करने की जगह आरुषि के पूरे परिवार के चरित्र का इंवेस्टिगेशन किया था। तभी तो आई जी स्तर के अधिकारी सरेआम 14 साल की नाबालिग आरुषि से लेकर 40 पार कर चुकी महिला डॉक्टर अनिता तक के कैरेक्टर को गंदा करार दे दिया। बिना ये सोचे समझे....









