20 जुलाई, 2012 की शाम 55 साल की अजिरन बिओवा के लिए कयामत बनकर आई। अजिरन के गांव पर कुछ लोगों ने हमला किया और उनके बेटे, बहू और 2 साल की पोती को उनकी आंखों के सामने काटकर दरांग नदी के पानी में फेंक दिया। हमलावर इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने पूरे गांव को लपटों के हवाले कर दिया और गांववालों को जान बचाकर भागना पड़ा। अजिरन फिलहाल चिरांग ज़िले के एक मुस्लिम राहत शिविर में हैं। असम के बोडो इलाके में इन दिनों ऐसे शिविर बिखरे पड़े हैं जहां तड़पती ज़िंदगी के हर निशान में रिसते ज़ख्मों का मवाद है। हर कोने से उठती कराह में दिल दहला देने वाला संगीत है और हर चेहरे पर नाचता आतंक है। ........ दहकती हुई लपटों से ज्यादा मुश्किल है सुलगती हुई चिंगारयों को कुरेदकर उनमें मौत के निशान तलाशना। लेकिन इस बार मुझे यही काम करना था। असम....
तो अब तय है कि चेहरे पर मुस्कुराहट के रंग भरने वाली काली स्याही की वो आड़ी तिरछी लकीरें स्कूली किताबों से गायब हो जाएंगी। सरकार ने माफीनामे के साथ एलान कर दिया है कि एनसीईआरटी की किताबों से सियासी कार्टून हटेंगे। और तो और इस 'संगीन' मसले में एनसीईआरटी के अफसरों-सलाहाकारों की भूमिका की जांच भी की जाएगी। 11 मई, 2012 को लोकसभा में अचानक हंगामा मचा और सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। हंगामे की वो हवा राज्यसभा तक भी पहुंची और और वहां भी छुट्टी की घंटी बज गई। वजह थी एनसीईआरटी की ग्यारहवीं की सोशल साइंस की किताब में छपा एक कार्टून। उस कार्टून में जवाहर लाल नेहरू एक घोंघे को कोड़ा मार रहे हैं। घोंघे पर लिखा है- 'संविधान' और उस पर सवार हैं संविधान निर्माता बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर। यानी संदेश ये कि संविधान निर्माण का काम घोंघा-चाल से चल रहा है और नेहरू उसे....
लोकपाल पर बहस की चिल्ल-पौं के बीच संसद भवन के गेट नंबर 12 पर खड़ा में सोच रहा था- 'पिछले करीब 6 साल में इस गेट से कितने सांसद आए, कितने गए..दफ्तरी ज़रूरत के मुताबिक भाग-भाग कर उन्हें 'पकड़ने' से ज़्यादा कोई हिसाब मैंने कभी नहीं रखा। लेकिन संसद के इस हाई प्रोफाइल गेट की तरफ दौड़ कर जाने की एक अहम वजह अब कम हो गई।' श्याम बेनेगल....एक कालजयी फिल्मकार और सौम्यता में लिपटा एक विनम्र, बेहतरीन इंसान। अपनी ग्रे रंग की सैंट्रो कार से संसद आना और लपकते कैमरों और हड़बड़ाए रिपोर्टरों पर निरपेक्ष नज़र फ़ेरते हुए अंदर चले जाना.. यही उनका अंदाज़ रहा। शुरू-शुरू में तो मुझे लगता था कि उनकी फाइल से किसी फिल्म का कोई नया सीन गिरेगा, जो उन्होंने सदन में बैठे-बैठे शायद कुछ देर पहले ही लिखा होगा। फरवरी 2006 में मनोनीत सदस्य के तौर पर राज्यसभा की शपथ लेने के बाद,....
एक हंगामाखेज़ संसद सत्र का इससे सनसनीखेज़ अंत और क्या हो सकता था। लोकपाल बिल की जिस मुहिम ने सरकारी हेकड़ी की हवा निकाल दी उसी बिल के पुर्जे हवा में उड़ते नज़र आए और लोकसभा से किसी तरह अपनी इज्ज़त बचा कर निकले लोकपाल बिल का राज्यसभा में 'चीरहरण' हो गया। शासन की साज़िश की ये वो संगीन मिसाल थी जिसमें लोकतांत्रिक नियम कायदों की औकात उस झंड़े की सी हो गई जिसे किसी मौकापरस्त ने, अपना नंगापन छुपाने के लिए, शरीर के खास हिस्सों के इर्द-गिर्द लपेट लिया हो। 29 दिसंबर सुबह करीब 11.30 बजे 'लोकपाल और लोकायुक्त बिल 2011' पर राज्यसभा में बहस शुरू हुई। विपक्ष के नेता अरुण जेटली और कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की दिलचस्प अदालती जिरह सुनने के बाद मैं प्रणब मुखर्जी के कमरे की तरफ निकल गया। शतरंज की असली बाज़ी वहीं चल रही थी। सदाबहार संकटमोचक की अपनी भूमिका निभाते हुए....
मां कल रात 1 बजे तक बदल-बदल कर खबरिया चैनल देख रही थी, तो मैं कुढ़ रहा था- वक्त से सो जाना चाहिए.. अब तो वो अन्ना हज़ारे भी सो चुके जिनकी खबरों ने आपसे 'चंद्रगुप्त मौर्य' और 'लापतागंज' का मोह भी छीन लिया। सुबह उठा तो मां हल्के फ्लैश-बैक में थी। उसने बताया कि 25 जून 1975 को लगी इमरजेंसी के दौरान मेरे नाना जेल गए थे। खुद मां को भी जाना था लेकिन उस वक्त मैं नवजात था, इसीलिए वो जा ना सकी। ये मेरे लिए चौंकाने वाली सूचना थी। देश में लगी इमरजेंसी से किसी ना किसी शक्ल मे मेरा भी कोई नाता रहा है- ये इतने सालों में मुझे, पहली बार पता लगा। और, मेरे निजी इतिहास का ये रहस्य बेपर्दा हुआ किसन बापट बाबूराव हज़ारे की वजह से। अन्ना हज़ारे- 74 साल को वो चुलबुला बुज़ुर्ग जिसकी ओर, आज, बच्चे भी बेहद संजीदगी से ताक....
'मुबारक हो भाईजान..आपके मुल्क ने दुनिया जीत ली..।' धोनी के छक्का लगाने के चंद लम्हों बाद ही मेरे फोन पर आई ये सबसे पहली बधाई लाहौर से थी और फोन के दूसरी तरफ था अबदुल्ला फरीदी। अब्दुल्ला से मेरी वाकफ़ियत को जुम्मा-जुम्मा 48 घंटे भी नहीं बीते थे। लेकिन ज़ुबान में घुली लताफ़त और मोहब्बत ऐलान कर रहे थे कि रिश्तों की जड़ें ज़मीन पकड़ चुकी हैं। नोएडा ऑफिस में मची भयंकर अफरा-तफरी और चीख-चिल्लाहट के बावजूद वो फोन कॉल, कॉलर पकड़कर मुझे फ्लैशबैक में घसीट ले गई.. वापस लाहौर, गद्दाफी स्टेडियम। पिच खाली.. मगर हर तरफ ताली, मैदान सुनसान..लेकिन जोश का तूफान, वीरू के चौकों पर चुप्पी.. सचिन के विकेट पर झप्पी, गहराती नाउम्मीदी.. फिर भी बूम-बूम अफरीदी- ये आलम था मोहाली से 230 किलोमीटर दूर लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम का। ये दुनिया में कहीं नहीं हो सकता.. क्रिकेट को लेकर अपनी आस्था के बावजूद भारत में भी....
साहब..जेसीबी मशीन मंगवाइये..तभी ठीक से खुदाई होगी..12-13 साल के उस बच्चे की बेचैन आवाज़ ने मेरा रास्ता रोक लिया। मैं जल्दबाज़ी में था- हौंसला रखो, खुदाई हो जाएगी- मैंने उसे समझाना चाहा। साहब, मेरे दोनों भाई इसी मिट्टी में दबे हैं, वो मर जाएंगे-अब तक उस बच्चे की आवाज भर्रा चुकी थी और आंखों के कोने गीले हो चुके थे। मैं पूरी तरह ध्वस्त हो चुके एक घर के मलबे पर खड़ा था। बगल के घर से कुछ देर पहले ही सेना के जवानों ने चार शव निकाले थे। इसके बाद आसपास के तमाम लोग आशंकित हो उठे कि उनके गायब परिवारवाले भी मलबे में दबे हैं। चारों तरफ बरबादी का आलम। मिट्टी में मिल चुके सैंकड़ों घर, बदहवास बिलखते लोग और सामने खड़ी वो ज़ालिम पहाड़ी जिससे होकर आए पानी के सैलाब ने खूबसूरत लेह को कब्रिस्तान में तब्दील कर दिया। बादलों की बर्बरता का सबसे बड़ा शिकार....
संजू बाबा टिकट लेकर मचल रहे हैं.. बिहारी बाबू टिकट के लिए पार्टी बदल रहे हैं.. गजोधर भइया टिकट की चाहत में उछल रहे हैं.. तिवरिया और किशनिया टिकट पाकर निखर रहे हैं.. नग्मा चुनावी राग गा रही हैं.. राग की धुन बसंती यानी हेमा के भी करीब आ रही है.. अमिताभ पूरे परिवार के साथ अमर सिंह से सटते हैं.. तो गोविंदा, शाहरुख सोनिया की चौखट पर सिर पटकते हैं.. अरे भइया चुनाव है कि मल्टीस्टारर फिल्म.. ?? ?? आप पूछते रहिये- लेकिन ये तो हो रहा है। लगता है कि पूरा बॉलीवुड लोकतंत्र की भैंस पर सवार होकर चुनावी तालाब में नहाने निकल पड़ा है। बहुत हो चुकी पर्दे पर एक्टिंग। अब असल ज़िंदगी में करनी है। लेकिन रुकिये.. शक भरी निगाह से सिर्फ बॉलीवुड को ना देखिये.. टॉलीवुड भी कुछ कम नहीं..। इन दिनों आंध्र प्रदेश चुनाव आयोग एक दिलचस्प मुसीबत में है।....
'पाइन आबय सै एक्के दिन पहिलय जनमलय साहेब। एकरा ऐ ठाम से लाय चलूं.. नै ते ई मैर जैते..(पानी आने से एक ही दिन पहले जन्मा है साहब.. इसे यहां से ले चलो, नहीं तो ये मर जाएगा )..' सूखी हुई आंखों लेकिन रुंधे हुए गले के साथ उस महिला की ये गुहार मेरे एक कान से होती हुई दूसरे से निकल गई। मैं सेना की एक मोटरबोट में था। मोटरबोट का मकसद था बाढ़ में फंसे लोगों को निकालना..और मेरा मकसद था इस पूरी 'कार्रवाई' के बीच स्टोरी तलाशना। मोटरबोट में रखे खाने पीने के सामान और कपड़ों पर गांववाले टूट रहे थे कि फिर वो आवाज़ आई- 'हमरा नाव में आबय दिअ.. नै ते ई मैर जायत..' (मुझे नाव में आने दो.. नहीं तो ये मर जाएगा)। इर्द गिर्द जमा भीड़ को धकेलती हुई एक महिला नाव में चढ़ने की कोशिश कर रही थी। बदन पर....
किस्सा एक पुरानी बात से शुरू करता हूं। बचपन में हम अक्सर मज़ाक किया करते थे म्हारा तो भाई एक ही कल्चर.. अर वो है एग्रीकल्चर। बात एक हद तक सही भी है। हरियाणा का नाम सुनते ही ज़हन में सबसे पहले आता क्या है। गीली मिट्टी से सना किसान.. दूर तक लहलहाती फसलें.. हंसिया चलाती महिलाएं.. गन्ने के खेत.. खेतों में दौड़ते ट्रैक्टर.. सड़कों पर दौड़ते बछड़े.. गोबर से लिपी दीवारें.. खपरैल की छतें.. मिट्टी का चूल्हा.. चूल्हे से उठता धुआं.. जोहड़ में बैठी भैंसें.. भैंसों पर बैठे बच्चे.. हल जोतते बैल.. बैलों की जुगाली.. चरमराती बैलगाड़ी.. धोती- कुर्ते.. साफे- पगड़ी से सजाधजा एक ताऊ.. ताऊ के हाथ में लट्ठ.. ज़ुबान पर भी लट्ठ.. वगैरह.. वगैरह। सब मिलाकर हुआ- म्हारा हरियाणा। खैर.. बात बदलते हैं। आपने किसी बांध को देखा है। गरजते.. उफनते.. मचलते.. घुमड़ते पानी को पूरी ताकत के साथ रोके हुए एक बांध। बांध....









