डॉ. पंकज श्रीवास्तव
Friday , February 21, 2014

हिंदी को ‘साम्राज्यवादी’ बताने का षड़यंत्र!


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आज मातृभाषा दिवस है। ये पता चलते ही मेरे कानों में अवधी का रस घुलने लगा। लेकिन जब देखा कि इस मौक़े का इस्तेमाल हिंदी को 'साम्राज्यवादी' बताने के लिए हो रहा है तो अफसोस से भर गया। हद तो ये है कि खड़ी बोली हिंदी के जरिये शोहरत की बुलंदी छू रहे तमाम बुद्धिजीवी, लेखक और पत्रकार इस मौके पर अपनी 'मातृभाषाओं' की याद करते हुए हिंदी से 'मुक्ति' का झंडा बुलंद कर रहे हैं। जिस हिंदी का राज कहीं प्रमाणित नहीं, उसे साम्राज्यवादी ठहराने से बड़ी नाइंसाफी क्या हो सकती है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी एक 'संकल्प' के रूप में विकसित हुई। ऐसा संकल्प, जिसमें जिसमें आजादी का सपना छिपा था। अवधी, भोजपुरी, बुंदेली, मैथिली आदि बोलने वाले हमारे पुरखों ने ही तय किया था कि एक ऐसी 'मानक भाषा' गढ़ी जाए जिसके जरिये विभिन्न बौद्धिक अनुशासनों में काम किया जा सके। अंग्रेजी की अनिवार्यता से....

Friday , February 14, 2014

प्रेम के लिए ‘मनुष्य’ बनना ज़रूरी है


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सुंदर संयोग है कि 'वेलेन्टाइन डे' और रविदास जयंती एक ही दिन पड़ी है। महान क्रांतिकारी संत कवि रविदास ने प्रेम के बारे में विचारते हुए कुछ यूँ कहा है- 'रविदास' प्रेम नहिं छिप सकै, लाख छिपाये कोय, प्रेम न मुख खोलै कभउँ, नैन देत हैं रोय... लेकिन क्या प्रेम हवा में होगा.? नैना से नीर ना बहें, इसके लिए राज और समाज भी तो खुशी देने वाला होना चाहिये। ऐसा समाज, जहां प्रेम की राह में कोई बाधा ना हो। रविदास इस सिलसिले में एक सपना दिखाते हैं। अनपढ़ कहे जाने वाले 'रैदास' ने लगभग 500 साल पहले जो कहा , वही बात आधुनिक युग के तमाम क्रांतिकारी दार्शनिकों के पोथन्नों में मिलती है। रैदास लिखते हैं- 'ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न छोट बड़ो सब मिलि बसें, रविदास रहें परसन्न।' ये सपना पूरा ना हुआ तो इंसान 'बीमार' ही....

Monday , January 27, 2014

आशुतोष की ‘पत्रकारिता’


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पूर्व बॉस के पक्ष में खड़े होना कोई समझदारी का काम नहीं, लेकिन कई बार चुप रह जाना छाती पर बोझ हो जाता है। जी हाँ, मैं बात आईबीएन7 के पूर्व मैनेजिंग एडिटर आशुतोष के बारे में बात कर रहा हूँ। आम आदमी पार्टी से जुड़ने के बाद उन पर जिस तरह से हमले हो रहे हैं, उसे देखते हुए कुछ कहना जरूरी है। आशुतोष के साथ लगभग छह साल काम किया है और शायद ही कोई दिन गुजरा हो जब उनसे तीखी बहस ना हुई हो। विचारों में तमाम असहमतियों के बावजूद ये बात दावे से कह सकता हूँ कि आशुतोष ईमानदार और जुनूनी कहे जा सकने वाले पत्रकारों की उसी पाँत में शामिल रहे हैं, जो दिनों दिन छोटी होती जा रही है। खबर है कि प्रतिष्ठित पत्रकार हरिवंश जी जेडीयू की ओर से राज्यसभा जा रहे हैं। लेकिन आशुतोष ने ऐसा कोई रास्ता नहीं चुना। उन्होंने संघर्ष....

Monday , December 23, 2013

दंगा पीड़ितों को ऊन का नहीं, इंसाफ का कंबल चाहिए..!


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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दूसरी बार मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों से मिले और उनसे घर वापस जाने का आग्रह किया। ऐसा आग्रह अखिलेश सरकार भी कर रही है। लेकिन दंगा पीड़ित सुनने को तैयार ही नहीं हैं। वे बरसाती पन्नियों को छत बनाकर जानलेवा शीत का मुकाबला कर रहे हैं। यूं इमदाद देने वालों की भीड़ लगी है। एफएम रेडियो वाले भी अभियान चला रहे हैं। कंबल और कपड़े दान करने का आग्रह आमिर खान और अभिषेक बच्चन जैसे फिल्मी सितारे भी कर रहे हैं। हर तरफ मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों को लेकर उदारता की एक लहर है, लेकिन दंगा पीड़ितों का दिल पसीज ही नहीं रहा है। उन्हें दर्जनों बच्चों की मौत मंज़ूर, बीमार होने का खतरा मंज़ूर, लेकिन उस दहलीज़ पर वापस जाना मंज़ूर नहीं, जहां से उनके पुरखों की पहचान जुड़ी है। तो क्या वे बेवकूफ हैं? मुझे ये कहने की इजाजत दीजिए कि ऐसा बिल्कुल नहीं....

Monday , December 23, 2013


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Saturday , December 07, 2013

फारुक़ जी, सच-सच बतलाना...


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फारुक़ जी, सच-सच बतलाना सड़कों पर निकली अबला से मुट्ठी तान चली सबला से आप डरे! या वो डरता है जिसकी मर्दाना डींगों में एक लाश वो सांसों वाली सदियों से सिसके जाती है रोम-रोम लुटती जाती है चुप साधे पिटती जाती है देवी रूप कही जाती है.. फारुक़ जी, सच-सच बतलाना.. आप डरे, या वे डरते जो वक्षस्थल का माप बताते कटि-नितंब अनुपात बताते विज्ञापन धन चाप रहे हैं डिस्को बीच तमंचा भरकर चीरहरण में नाच रहे हैं फारुक़ जी, सच सच बतलाना लाशों की सांसों की गर्मी लंपट मन को डरा रही..? लंपट तन को डरा रही है...? मंत्री, जज औ पत्रकार को उठक-बैठक करा रही है....? फारुक़ जी, सच-सच बतलाना क्या बात यही है क्या बात सही है.....! ....

Sunday , November 03, 2013

गांधी जी की हत्या के बाद आरएसएस ने बांटी थी मिठाई-पटेल


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29 अक्टूबर को अहमदाबाद में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कहा कि अगर सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो देश का इतिहास कुछ और होता। उसी मंच पर मौजूद मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फौरन याद दिला दिया कि पटेल एक प्रतिबद्ध कांग्रेसी थे। सेक्युलर नेता थे। ये उस राजनीतिक युद्ध की बानगी है जो पटेल के नाम पर छिड़ा है। मोदी, दरअसल, आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के उसी प्रचार को आगे बढ़ा रहे हैं जिसमें बार-बार कहा जाता है कि सरदार पटेल, नेहरू से बेहतर नेता थे। यही नहीं पटेल को हिंदुत्व के दर्शन के करीब बताने की कोशिश भी होती है। आम चुनाव 2014 की आहट बढ़ने के साथ ये कोशिश तेज होती जा रही है। नरेंद्र मोदी ने गुजरात में पटेल की ऐसी प्रतिमा स्थापित करने का एलान किया है जो दुनिया में सबसे ऊंची होगी। अमेरिका की स्टैच्यू....

Tuesday , June 25, 2013

दर्द से उपजे दोहे


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हरे पर्वतों के तन से, खींच ली गई खाल देवभूमि मरघट बनी, अफसर मालामाल। गंगा पाइप में बहे, बुझी न फिर भी प्यास जमना जी की लाश पर, दिल्ली करे विकास। कोई न बच पाएगा, परलय है विकराल बना हिमाला काल जो, लोभ-लाभ का जाल। शिव मंदिर बस बचा रहे, है पूरा टकसाल करे पुजारी प्रार्थना, भरा शवों से थाल। मंदिर थर-थर काँपता, शिव प्रतिमा जल माहिं कबिरा कब से कह रहा, पाहन में हरि नाहिं। गिद्धों को क्या चाहिए, लाशों का अंबार गुजराती कि देहलवी, सभी उड़े केदार। दान पात्र भरने गया, डाकू काल के गाल साधू ले भागा मगर, मंदिर का सब माल। सैलानी जो फंस गए, उनकी बात हजार जो पहाड़ घुट-घुट जियें, उनका कौन भतार। सुख में तीरथ-हज हुआ, जाप, दान, अगियार दुख में सब चु्प साधते, काबा क्या....

Monday , June 03, 2013

एक बौद्धिक से वार्ता


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'यकीनन ये लोग देश के दुश्मन हैं। ऐसे वक्त में आदिवासियों के हक, और उन पर हुए अत्याचार वगैरह का सवाल उठा रहे हैं, जब सुकमा में एक राष्ट्रीय पार्टी के तमाम नेताओं की बर्बर हत्या हुई है। ऐसी बातें करना हत्याकांड को जायज ठहराना है। माओवादियों के एजेंट हैं सब!' 'लेकिन आपने तो जनवरी में भी कंधे उचका दिए थे' 'कब' 'जब आदिवासी शिक्षक, सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर भरने का मसला जेरे-बहस था। इस घिनौने अपराध में शामिल पुलिस अधिकारी को वीरता पुरस्कार दिया जा रहा था!' 'यही तो!.........वक्त की नजाकत आपने तब भी नहीं समझी थी। नया साल शुरू हुआ था। क्या जरूरी था कि नए साल की शुरुआत नकारात्मक बातों पर चर्चा के साथ की जाती। सोच में सकारात्मकता बेहद जरूरी है। थिंक पॉजिटिव..' 'और फरवरी में ..?' 'फरवरी में क्या हुआ था..?' 'आपने मुंह बना लिया था' ....

Wednesday, December 26, 2012

बलात्कार की 'कार्यशाला'


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ना..ये सिर्फ बलात्कार का मसला नहीं है। बलात्कार में लोहे की रॉड का इस्तेमाल नहीं होता। ये उसी दिमागी जहर का नतीजा है जिसने गुजरात में महिलाओं के स्तन काटे थे और गर्भ चीर दिया था, खैरलांजी में एक दलित लड़की को जिंदा जला दिया था या छत्तीसगढ़ की एक आदिवासी महिला की योनि में पत्थर भर दिए थे। ये वहशियाना मर्दानगी, प्रतिकार में सिर उठाने वाली स्त्री को नेस्तोनाबूद करने से कम कुछ मंजूर नहीं करती। मर्द को 'जहरबुझा' बनाने का ये अभियान उसके जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है। गौर से देखिए तो पूरा देश बलात्कार का प्रशिक्षण देने की कार्यशाला ही लगेगा। आखिर भाषा में अपनी जगह दर्ज कार चुकी गालियां किसी की मां-बहन के साथ यौन दुर्व्यवहार के खुले एलान के अलावा क्या हैं? और ये केवल अपढ़ या सांस्कृतिक तौर पर कथित पिछड़े समाजों का सच नहीं है। आखिल वे अखबार क्यों....

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डॉ. पंकज श्रीवास्तव के बारे में कुछ और

करीब 15 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय डॉ.पंकज श्रीवास्तव आईबीएन7 में एसोसिएट एडिटर हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इतिहास में डी.फिल करने के साथ उन्होंने मशहूर हिंदी दैनिक अमर उजाला से पत्रकारिता की शुरुआत की। पहले कानपुर और फिर लखनऊ ब्यूरो से जुड़कर उत्तर प्रदेश की राजनीति और दलित उभार पर विशेष रिपोर्टिंग की। 2003 की शुरुआत के साथ स्टार न्यूज की लॉन्चिंग टीम के हिस्सा बने। कुछ दिन वाराणसी और फिर चैनल का लखनऊ ब्यूरो संभाला। स्टार न्यूज में रहते हुए देश भर में घूम-घूम कर ट्रैवलॉग करने के लिए खासतौर पर पहचाने गए। सितंबर 2007 में सहारा के राष्ट्रीय न्यूज चैनल 'समय' की लॉन्चिंग टीम में शामिल हुए, जहां बतौर फीचर एडीटर और एंकर काम करने के बाद मार्च 2008 से आईबीएन7 में कार्यरत।
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