ना..ये सिर्फ बलात्कार का मसला नहीं है। बलात्कार में लोहे की रॉड का इस्तेमाल नहीं होता। ये उसी दिमागी जहर का नतीजा है जिसने गुजरात में महिलाओं के स्तन काटे थे और गर्भ चीर दिया था, खैरलांजी में एक दलित लड़की को जिंदा जला दिया था या छत्तीसगढ़ की एक आदिवासी महिला की योनि में पत्थर भर दिए थे। ये वहशियाना मर्दानगी, प्रतिकार में सिर उठाने वाली स्त्री को नेस्तोनाबूद करने से कम कुछ मंजूर नहीं करती। मर्द को 'जहरबुझा' बनाने का ये अभियान उसके जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है। गौर से देखिए तो पूरा देश बलात्कार का प्रशिक्षण देने की कार्यशाला ही लगेगा। आखिर भाषा में अपनी जगह दर्ज कार चुकी गालियां किसी की मां-बहन के साथ यौन दुर्व्यवहार के खुले एलान के अलावा क्या हैं? और ये केवल अपढ़ या सांस्कृतिक तौर पर कथित पिछड़े समाजों का सच नहीं है। आखिल वे अखबार क्यों....
'मायावती और चाहे जौन किहे होंय,गरीबन के लिए कुछौ नहीं किहिन'--ये आवाज गुलाबी साड़ी और आत्मविश्वास में लिपटी उर्मिला की थी। दलित जाति की उर्मिला सतगुरु खेड़ा गांव के बाहर मिल गई थीं। साथ में उनके पति छंगा भी थे। छंगा विकलांग हैं। बेहद नाराज नजर आ रहे छंगा ने मायावती को निशाने पर रखते हुए सीधा उलाहना दिया-'का हमका एक ठो कालोनी नहीं दइ सकती रहीं?' 'कालोनी' यानी दलितों के लिए बनाए जाने वाले सरकारी मकान। 16 जनवरी को काफी ठिठुरन थी, जब हम (मैं और कैमरामैन पंकज तोमर) लखनऊ पहुंचे थे। इरादा चैनल के लिए चुनावी माहौल का जायजा लेना था। लेकिन कुछ चुनाव आयोग की कृपा और कुछ लोगों की बेजारी, चुनाव का रंग कहीं नहीं दिखा। राजधानी के लोगों की निगाह में सरकार बदलने या बनाये रखने की कोई तड़प नजर नहीं आई। बस, एक बात पर सहमति थी कि मायावती के स्मारकों ने लखनऊ....
अन्ना हजारे को कुछ महीने पहले तक महाराष्ट्र के बाहर कम ही पहचाना जाता था। लेकिन आज पूरा देश उन्हें बेहद ध्यान से सुन रहा है। दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन के दौरान अन्ना ने अपनी मराठी असर वाली हिंदी के जरिये जो कुछ बोला वो सीधे दिलों में उतरता गया। उधर संसद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी, गृहमंत्री पी. चिदंबरम, मानव संसाधान मंत्री कपिल सिब्बल या राहुल गांधी ने अन्ना के आंदोलन का जवाब देने के लिए अंग्रेजी को जरिया बनाया। नतीजा, वे ना आम लोगों के दिलों में जगह बना पाए और ना दिमाग में। लगभग नब्बे साल पहले यही करिश्मा दक्षिण अफ्रीका से लौटे एक बैरिस्टर ने कर दिखाया था। गुजराती भाषी मोहनदास कर्मचंद गांधी ने समझ लिया था कि इस देश से संवाद करना है तो हिंदी को जरिया बनाना पड़ेगा। उस समय भारत में अंग्रेजी राज को मानवीय बनाने और भारतीयों....
96 बरस की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले मकबूल फिदा हुसैन अपने पीछे तमाम सवाल छोड़ गए हैं। आखिर भारत में अंतिम सांस लेने की उनकी ख्वाहिश क्यों पूरी न हो सकी? उन्हें उम्र के आखिरी पड़ाव पर कतर की नागरिकता क्यों लेनी पड़ी? जिस चित्रकार के ब्रश का एक-एक स्ट्रोक भारतीय परंपरा में रंगा-पगा था, उसे भारत में ही अपमानित क्यों होना पड़ा? दुनिया ने जिसे 'भारत का पिकासो' कहकर इज्जत बख्शी, उसकी इज्जत बचाने के लिए पूरा भारत क्यों नहीं उठ खड़ा हुआ? कहीं ऐसा तो नहीं कि 'अभिव्यक्ति की आजादी' संविधान में लिखा एक मुर्दा शब्द है जिसके प्रति भारतीय शासक वर्ग की कोई प्रतिबद्धता नहीं रह गई है? जिसके लिए धर्मनिरपेक्षता महज रणनीति है, जीवन मूल्य नहीं? कुछ लोग कतर की नागरिकता स्वीकार करने के लिए हुसैन की काफी आलोचना करते हैं। लेकिन 95 साल की उम्र में जब पेंशन के लिए डाकखाने जाना....
बचपन में किसी बुजुर्ग ने एक ऐसे गांव की कहानी सुनाई थी जहां रहने वालों की नाक कटी हुई थी। ये लोग खुद को खूबसूरत समझते थे। साबुत नाक वाले उन्हें सुहाते नहीं थे। एक बार एक नौजवान कहीं से घूमते-फिरते उस गांव में पहुंच गया। गांव की जिस गली से ये नौजवान गुजरता लोग ताना देते- देखो नाक वाला जा रहा है। कोई कहता- क्या बदनसीबी है, मुंह के ऊपर और आंख के नीचे भगवान ने पता नहीं क्या थोप दिया। बेचारा...। ऐसे तानों से पककर नौजवान का भरोसा डोल गया और उसने अपनी नाक काट डाली। इस तरह वो नकटों में शामिल हो गया। गांव में शांति लौट आई। अन्ना हजारे और उनके साथियों पर हो रहे हमले को देखते हुए ये कहानी बार-बार याद आ रही है। नेताओं, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों का एक तबका उन पर इस तरह पिल पड़ा है, जैसे वे बहुत बड़े अपराधी....
मिस्र समेत पूरे अरब जगत में जैसी लहर चल रही है, उसकी कुछ दिन पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। सोवियत यूनियन के पतन के बाद एकध्रुवीय विश्व का जो खाका अमेरिका के नेतृत्व में खींचा जा रहा था वो लगभग प्रतिरोधहीन हो चला था। खासतौर पर मध्यवर्ग का सड़कों पर उतरकर नारेबाजी करना बीते जमाने की बात हो चुकी थी। भूमंडलीकरण के समर्थक लेखक और बुद्धिजीवी, \'विचारधारा के अंत\' और \'वर्ल्ड इज फ्लैट\' का नारा लगा रहे थे। इस नई दुनिया की हकीकत के सुबूत में एक तस्वीर दिखाई जाती थी जिसमें दुनिया के हर कोने और हर नस्ल के युवा जींस-टीशर्ट पहने और कान में वॉकमैन का तार डाले किसी मैकडोनल्ड या केएफसी की दुकान की ओर थिरकते हुए बढ़ रहे थे। लेकिन ट्यूनीशिया से उठकर जो आंधी मिस्र में पहुंची है उसने बता दिया है कि इतिहास चक्र को रोकने और बहुरंगी दुनिया को एक....
ब्रिटेन की महारानी का डंडा (क्वीन्स बेटेन या राजदंड) पूर्व गुलाम देशों का चक्कर लगाकर भारत में प्रवेश कर गया है। अब हर तरफ राष्ट्रमंडल खेलों की ही चर्चा है। इस राजदंड को देश भर में घुमाया जा रहा है। अब ये बात बेमानी करार दी गई है कि "राष्ट्रों का ये मंडल" पूर्व गुलामों का संगठन है जो खेल के इस महा-उत्सव के जरिये महारानी को शुक्रिया अदा करते हैं। लेकिन एक जमाने में इस पर खूब बात होती थी। 1960 के आसपास हिंदी के श्रेष्ठ कवि नागार्जुन ने महारानी के आगमन को लेकर एक चर्चित कविता लिखी थी। ये नागार्जुन की जन्मशती का वर्ष है। उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप ये कविता पेश है :- आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी, यही हुई है राय जवाहरलाल की रफू करेंगे फटे-पुराने जाल की यही हुई है राय जवाहरलाल की आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी ! आओ शाही बैंड....
बड़ी-बड़ी मूँछों से सजे रोबदार चेहरे वाले ई.एन. राममोहन ने जब कहा कि माओवाद कुछ और नहीं जाति-दर्प की उपज है, (माओइज्म इस नथिंग बट प्रोडक्ट आफ कास्ट एरोगेन्स) तो चौंकना लाजिमी था। राममोहन बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक हैं। उन्हें दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले की जांच की जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन एक न्यूज चैनल को इंटरव्यू देते हुए राममोहन न सैन्य तैयारियों की बात कर रहे थे, न गोला-बारूद की कमी की। वे बता रहे थे कि कैसे जाति अहंकार में डूबे समाज को माओवादी विद्रोह का दंड भुगतना पड़ रहा है। उनके मुताबिक, पहले जाति श्रेष्ठता के अहंकार में आदिवासियों को जंगलों 'में' खदेड़ा गया और अब खनिजों के लालच में उन्हें जंगलों 'से' खदेड़ा जा रहा है। नतीजा है विद्रोह। यह जनगणना के बहाने जाति व्यवस्था को लेकर तेज हुई हालिया बहस का बिल्कुल नया आयाम है। ये बताता है कि अगर इतिहास में....
सोमवार को हुई प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दूसरी पारी की पहली प्रेस कांफ्रेंस से कुछ निकला हो या नहीं, इसने पत्रकारों और पत्रकारिता के तेजी से बदलते सरोकारों को बेपर्दा जरूर कर दिया। ये संयोग नहीं कि प्रधानमंत्री के लिखित वक्तव्य में तो सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों की कमी नहीं थी, लेकिन सवाल पूछने वाली पत्रकार बिरादरी में उनका जिक्र किसी अपवाद की तरह था। हालांकि इस प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत महंगाई जैसे अहम सवाल से हुई। लेकिन प्रधानमंत्री ने जब इसके लिए राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का जिक्र करते हुए दिसंबर तक हालात में सुधार का दावा किया, तो सब लोग संतुष्ट हो गए। जबकि ऐसे दावे अतीत में न जाने कितनी बार किए जा चुके हैं। यूपीए-2 की शुरूआत के साथ ही सौ दिन में महंगाई पर काबू पाने का दावा किया गया था। जाहिर है, इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को घेरा जा सकता था, लेकिन ऐसा....
गृह मंत्रालय ने उन बुद्धिजीवियों और स्वयंसेवी संगठनों को भुगतने की धमकी दी है जिनके बयानों या बातों से माओवादियों को \'बल\' मिलता है। यानी माओवादियों के सशस्त्र विद्रोह का कोई माकूल तोड़ निकालने में अब तक नाकामयाब रही सरकार उन बुद्धिजीवियों का मुंह बंद कर देना चाहती है जो उसकी नीतियों में खामी गिनाने से हिचकते नहीं हैं। गृह मंत्रालय ने उनके खिलाफ यूएपीए एक्ट के तहत कार्रवाई करने की धमकी दी है। इसमें दस साल तक की सजा हो सकती है। वैसे, सरकार के माओवाद विरोधी अभियान को तमाम राजनीतिक पार्टियों का ही नहीं, बौद्धिकों के एक बड़े तबके का भी समर्थन प्राप्त है। ये बौद्धिक \'लाल गलियारे\' में थलसेना से लेकर वायुसेना तक के इस्तेमाल के हिमायती हैं। जाहिर है, इन बुद्धिजीवियों में न कोई आदिवासी समाज से आता है और न ही इन पिछड़े इलाकों से उनका नाता रिश्ता है। इसीलिए बमबारी से होने....









