डॉ. पंकज श्रीवास्तव
Monday , November 03, 2014

मैं नेहरू का वफ़ादारः सरदार पटेल


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आजकल पटेल बनाम नेहरू की बहस जोरों पर है। कुछ लोगों का दावा है कि पटेल ज़्यादा काबिल थे और उनका हक मार कर जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया। क्या सचमुच ऐसा ही था? इस मसले पर खुद पटेल भी कुछ कहते हैं। भारत की आज़ादी का दिन करीब आ रहा था। मंत्रिमंडल के स्वरूप पर चर्चा हो रही थी। 1 अगस्त 1947 को पंडित नेहरू ने पटेल को लिखा-'कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना जरूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूं। इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं।' जवाब में पटेल ने 3 अगस्त को नेहरू के पत्र के जवाब में लिखा-'आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है,....

Friday , June 20, 2014

हिंदी का घोषणापत्र!


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मोदी सरकार राजकाज में हिंदी को अहमियत देना चाहती है। मंत्रियों को निर्देश है कि सोशल मीडिया में अंग्रेजी के साथ हिंदी का भी प्रयोग करें। यह कोशिश अगर सिर्फ सांकेतिक महत्व नहीं रखती तो बात इससे आगे बढ़ानी होगी। हिंदी का प्रश्न सिर्फ ट्वीट करने भर का मसला नहीं है। हिंदी राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क-भाषा होने की हैसियत पा चुकी है, इसमें कोई शक नहीं है, पर असल मसला इसे ज्ञान, विज्ञान और प्रशासन की भाषा बनाना है। यह स्वतंत्रता आंदोलन का संकल्प और संविधान की मंशा भी है। कभी यह काम कांग्रेस को करना था, लेकिन शुरुआती उत्साह के बाद उसने इस सिलसिले में अजब अरुचि दिखाई। डॉ. लोहिया की मृत्यु के बाद किसी समाजवादी नेता ने भी हिंदी को लेकर कोई आंदोलनकारी अकुलाहट नहीं दिखाई। वामपंथियों के लिए तो यह कोई मुद्दा ही नहीं है। ऐसे में अगर बीजेपी ही इस मुद्दे की चैंपियन बन रही है....

Friday , May 30, 2014

अनुच्छेद 370 की राजनीति


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मोदी सरकार बनते ही अनुच्छेद 370 पर तूफान खड़ा हो गया है। पीएमओ के राज्यमंत्री और ऊधमपुर के सांसद डॉ. जीतेंद्र सिंह ने कामकाज संभालते ही ऐलान कर दिया कि इस अनुच्छेद को हटाया जाएगा। हालांकि बाद में उन्होंने बयान को हल्का किया लेकिन जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला ने बेहद सख्त लहजे में चेताया है कि अनुच्छेद 370 के ना रहने पर भारत से जुड़े रहने का संवैधानिक जरिया खत्म हो जाएगा। जम्मू-कश्मीर की मुख्य विपक्षी पार्टी, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती का भी अंदाज कुछ ऐसा ही है। कोई कह सकता है कि यह मुद्राएं राजनीतिक फायदे के लिए हैं यानी घाटी की जनता को अपने सख्त तेवरों से लुभाने का प्रयास। लेकिन यही काम तो शेष भारत में पहले जनसंघ और फिर बीजेपी करती आई है। आलोचक कहते हैं कि अनुच्छेद 370 खत्म करने को बीजेपी ने राष्ट्रवाद के ऐसे 'अधूरे लक्ष्य' के रूप में पेश किया....

Monday , April 21, 2014

रसखान और बिस्मिल्लाह खाँ को इस्लाम से कब खारिज करोगे मौलाना?


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जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने गजब फरमाया है। जनाब ने कहा है कि बीजेपी के पीएम नरेंद्र मोदी ने एक मौलाना के हाथ से टोपी ना पहनकर कोई गलती नहीं की। जैसे वह खुद टीका नहीं लगा सकते, वैसे ही किसी को टोपी पहनाना गलत है। मौलाना के बोल दरअसल मोदीवादी राजनीति का ही दूसरा पहलू है। इस राजनीति की सफलता के लिए मौलाना जैसे विचारों का झंडा बुलंद होना बेहद जरूरी है। जरा गौर कीजिए। मोदी हों या मौलाना, दोनों का मानना है कि हिंदू और मुस्लिम दो ऐसी धाराएं हैं जिनका संगम ना हो सकता है और ना होना चाहिए। इन्हें अलग-अलग ही चलना चाहिए। एक निश्चित दूरी जरूरी है। लेकिन इतिहासबोध मौलाना मदनी की समझ को खारिज करता है। हकीकत यह है कि हम जिस गंगा-जमनी तहजीब पर गर्व करते हैं उसमें 'मेल-मिलाप' एक अहम चीज है। सदियों के संवाद के साथ विकसित....

Friday , February 21, 2014

हिंदी को ‘साम्राज्यवादी’ बताने का षड़यंत्र!


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आज मातृभाषा दिवस है। ये पता चलते ही मेरे कानों में अवधी का रस घुलने लगा। लेकिन जब देखा कि इस मौक़े का इस्तेमाल हिंदी को 'साम्राज्यवादी' बताने के लिए हो रहा है तो अफसोस से भर गया। हद तो ये है कि खड़ी बोली हिंदी के जरिये शोहरत की बुलंदी छू रहे तमाम बुद्धिजीवी, लेखक और पत्रकार इस मौके पर अपनी 'मातृभाषाओं' की याद करते हुए हिंदी से 'मुक्ति' का झंडा बुलंद कर रहे हैं। जिस हिंदी का राज कहीं प्रमाणित नहीं, उसे साम्राज्यवादी ठहराने से बड़ी नाइंसाफी क्या हो सकती है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी एक 'संकल्प' के रूप में विकसित हुई। ऐसा संकल्प, जिसमें जिसमें आजादी का सपना छिपा था। अवधी, भोजपुरी, बुंदेली, मैथिली आदि बोलने वाले हमारे पुरखों ने ही तय किया था कि एक ऐसी 'मानक भाषा' गढ़ी जाए जिसके जरिये विभिन्न बौद्धिक अनुशासनों में काम किया जा सके। अंग्रेजी की अनिवार्यता से....

Friday , February 14, 2014

प्रेम के लिए ‘मनुष्य’ बनना ज़रूरी है


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सुंदर संयोग है कि 'वेलेन्टाइन डे' और रविदास जयंती एक ही दिन पड़ी है। महान क्रांतिकारी संत कवि रविदास ने प्रेम के बारे में विचारते हुए कुछ यूँ कहा है- 'रविदास' प्रेम नहिं छिप सकै, लाख छिपाये कोय, प्रेम न मुख खोलै कभउँ, नैन देत हैं रोय... लेकिन क्या प्रेम हवा में होगा.? नैना से नीर ना बहें, इसके लिए राज और समाज भी तो खुशी देने वाला होना चाहिये। ऐसा समाज, जहां प्रेम की राह में कोई बाधा ना हो। रविदास इस सिलसिले में एक सपना दिखाते हैं। अनपढ़ कहे जाने वाले 'रैदास' ने लगभग 500 साल पहले जो कहा , वही बात आधुनिक युग के तमाम क्रांतिकारी दार्शनिकों के पोथन्नों में मिलती है। रैदास लिखते हैं- 'ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न छोट बड़ो सब मिलि बसें, रविदास रहें परसन्न।' ये सपना पूरा ना हुआ तो इंसान 'बीमार' ही....

Monday , January 27, 2014

आशुतोष की ‘पत्रकारिता’


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पूर्व बॉस के पक्ष में खड़े होना कोई समझदारी का काम नहीं, लेकिन कई बार चुप रह जाना छाती पर बोझ हो जाता है। जी हाँ, मैं बात आईबीएन7 के पूर्व मैनेजिंग एडिटर आशुतोष के बारे में बात कर रहा हूँ। आम आदमी पार्टी से जुड़ने के बाद उन पर जिस तरह से हमले हो रहे हैं, उसे देखते हुए कुछ कहना जरूरी है। आशुतोष के साथ लगभग छह साल काम किया है और शायद ही कोई दिन गुजरा हो जब उनसे तीखी बहस ना हुई हो। विचारों में तमाम असहमतियों के बावजूद ये बात दावे से कह सकता हूँ कि आशुतोष ईमानदार और जुनूनी कहे जा सकने वाले पत्रकारों की उसी पाँत में शामिल रहे हैं, जो दिनों दिन छोटी होती जा रही है। खबर है कि प्रतिष्ठित पत्रकार हरिवंश जी जेडीयू की ओर से राज्यसभा जा रहे हैं। लेकिन आशुतोष ने ऐसा कोई रास्ता नहीं चुना। उन्होंने संघर्ष....

Monday , December 23, 2013

दंगा पीड़ितों को ऊन का नहीं, इंसाफ का कंबल चाहिए..!


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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दूसरी बार मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों से मिले और उनसे घर वापस जाने का आग्रह किया। ऐसा आग्रह अखिलेश सरकार भी कर रही है। लेकिन दंगा पीड़ित सुनने को तैयार ही नहीं हैं। वे बरसाती पन्नियों को छत बनाकर जानलेवा शीत का मुकाबला कर रहे हैं। यूं इमदाद देने वालों की भीड़ लगी है। एफएम रेडियो वाले भी अभियान चला रहे हैं। कंबल और कपड़े दान करने का आग्रह आमिर खान और अभिषेक बच्चन जैसे फिल्मी सितारे भी कर रहे हैं। हर तरफ मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों को लेकर उदारता की एक लहर है, लेकिन दंगा पीड़ितों का दिल पसीज ही नहीं रहा है। उन्हें दर्जनों बच्चों की मौत मंज़ूर, बीमार होने का खतरा मंज़ूर, लेकिन उस दहलीज़ पर वापस जाना मंज़ूर नहीं, जहां से उनके पुरखों की पहचान जुड़ी है। तो क्या वे बेवकूफ हैं? मुझे ये कहने की इजाजत दीजिए कि ऐसा बिल्कुल नहीं....

Monday , December 23, 2013


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Saturday , December 07, 2013

फारुक़ जी, सच-सच बतलाना...


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फारुक़ जी, सच-सच बतलाना सड़कों पर निकली अबला से मुट्ठी तान चली सबला से आप डरे! या वो डरता है जिसकी मर्दाना डींगों में एक लाश वो सांसों वाली सदियों से सिसके जाती है रोम-रोम लुटती जाती है चुप साधे पिटती जाती है देवी रूप कही जाती है.. फारुक़ जी, सच-सच बतलाना.. आप डरे, या वे डरते जो वक्षस्थल का माप बताते कटि-नितंब अनुपात बताते विज्ञापन धन चाप रहे हैं डिस्को बीच तमंचा भरकर चीरहरण में नाच रहे हैं फारुक़ जी, सच सच बतलाना लाशों की सांसों की गर्मी लंपट मन को डरा रही..? लंपट तन को डरा रही है...? मंत्री, जज औ पत्रकार को उठक-बैठक करा रही है....? फारुक़ जी, सच-सच बतलाना क्या बात यही है क्या बात सही है.....! ....

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डॉ. पंकज श्रीवास्तव के बारे में कुछ और

करीब 15 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय डॉ.पंकज श्रीवास्तव आईबीएन7 में एसोसिएट एडिटर हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इतिहास में डी.फिल करने के साथ उन्होंने मशहूर हिंदी दैनिक अमर उजाला से पत्रकारिता की शुरुआत की। पहले कानपुर और फिर लखनऊ ब्यूरो से जुड़कर उत्तर प्रदेश की राजनीति और दलित उभार पर विशेष रिपोर्टिंग की। 2003 की शुरुआत के साथ स्टार न्यूज की लॉन्चिंग टीम के हिस्सा बने। कुछ दिन वाराणसी और फिर चैनल का लखनऊ ब्यूरो संभाला। स्टार न्यूज में रहते हुए देश भर में घूम-घूम कर ट्रैवलॉग करने के लिए खासतौर पर पहचाने गए। सितंबर 2007 में सहारा के राष्ट्रीय न्यूज चैनल 'समय' की लॉन्चिंग टीम में शामिल हुए, जहां बतौर फीचर एडीटर और एंकर काम करने के बाद मार्च 2008 से आईबीएन7 में कार्यरत।
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