Tuesday , June 25, 2013

भारतीय क्रिकेट में माही-वे


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काउंटी क्रिकेट ग्राउंड, एड्गबैस्टन, बर्मिंघम, इंग्लैंड के टेस्ट सेंटर में दूसरा सबसे युवा सेंटर है, लेकिन 23 जून 2013, रविवार रात से पहले भी ये कई दिलचस्प मुकाबलों का गवाह रहा है। 1994 में इसी ग्राउंड पर ब्रायन लारा ने डरहम के खिलाफ 501 रनों की पारी खेली थी। 1999 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में इसी ग्राउंड पर क्लूजनर-डोनाल्ड की जोड़ी वो एक रन नहीं बना सकी जिसने प्रोटियाज को चोकर्स का ठप्पा दे दिया और 2005 एशेज में इंग्लैंड ने इसी ग्राउंड पर ऑस्ट्रेलिया को 2 रनों से हराकर बताया कि कंगारू सेना को पस्त किया जा सकता है। 23 जून, 2013 को जब इसी ग्राउंड पर महेंद्र सिंह धोनी और एलेस्टर कुक की टीमें आमने-सामने थीं, तो कामेंट्री बॉक्स में एक जोरदार बहस चल रही थी। इंग्लिश कमेंटेटर ने कहा कि स्पिनरों के लिए इस कदर मददगार टर्निंग ट्रैक और स्टैंड्स में मौजूद 80 फीसदी क्रिकेट फैन्स का समर्थन,....

Wednesday, April 24, 2013

हैप्पी बर्थडे सचिन-लाइफ बिगिंस@40


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वर्ष 1932 में वॉल्टर बी पिटकिन की अमेरिका में एक किताब 'लाइफ बिगिंस एट 40' (जिंदगी चालीस की उम्र से शुरू होती है) आई। देखते ही देखते यह किताब ना सिर्फ बेस्टसेलर बन गई, बल्कि इसको आधार बनाकर 1935 में विल रोजर्स ने एक फिल्म बनाई। सोफी टकर ने 1937 में बहुचर्चित गाना गाया। दरअसल, अमेरिका में ये वो दौर था जब 50 साल के अंदर जीवन संभावना दर 40 से छलांग लगाकर 60 हो गई थी। 40 के हुए तो क्या हुआ, यह तो एक नए जीवन की शुरुआत है। बस, सकारात्मक होने की जरूरत है। क्रिकेट के महानायक सचिन तेंदुलकर भी आज यानी 24 अप्रैल को 40वें साल में दाखिल हो रहे हैं। 'लाइफ बिगिंस एट 40'...तो क्या यहां से सचिन के लिए भी एक नई जिंदगी की शुरुआत होगी? आज भी सचिन में अपने खेल को लेकर वैसा ही जुनून है, जैसा 16 की उम्र में था।....

Saturday , April 20, 2013

वेस्टइंडीज क्रिकेट- फ्रैंक वॉरेल से क्रिस गेल तक


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विश्व मानचित्र में क्रिकेट गंभीरता से 10 देशों में खेला जाता है, लेकिन इतिहास की दूरबीन का सहारा लेकर इसपर शायद किसी दूसरे खेल की तुलना में सबसे अधिक किताबें लिखी गईं। अगर बदलाव जीवन का स्थायी सच है, तो क्रिकेट के फॉर्मेट और ड्रेसिंग रूम में बदलाव के रूप में इसकी आहट को वक्त-वक्त पर साफ तौर पर समझा जा सकता है। आखिर क्या है वो स्थायी ऐतिहासिक धुरी जिसके सहारे क्रिकेट लेखकों ने इस जेंटलमैन गेम को सबसे अधिक समझने की कोशिश की है। चौके छक्के और शतकों के शोरगुल से दूर क्रिकेट ब्रिटिश राज, कॉलोनी और सभ्यता के बीच संघर्ष का प्रतिबिंब एक लंबे दौर तक के लिए बना रहा। सवाल ये है कि क्या इस पैमाने को बदलने का वक्त आ गया है। इसे जानने के लिए क्रिकेट में इस सोच की लैबोरेटरी वेस्टइंडीज में हुए बदलाव को समझना जरूरी है। फ्रैंक वारेल से क्रिस गेल....

Thursday , February 14, 2013

खेल भावना से लेकर पैसा भावना


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किसी टेनिस खिलाड़ी से पूछो क्या बनना चाहते हो, जवाब होगा विंबलडन, अमेरिकी ओपन या फिर कोई और ग्रैंड स्लैम विजेता। बास्केटबॉल खिलाड़ी एनबीए तो गोल्फर ओगस्टा का नाम लेगा। फुटबॉल ने इस बारे में रेखाएं साफ तौर पर खींच रखी हैं और वर्ल्ड कप और प्राइवेट लीग के बीच एक संतुलन सा बना रखा है। क्रिकेट अभी इस दौर में नाबालिग है जो ये तय नहीं कर पा रहा है कि उसके लिए क्या बेहतर है। दूसरी तरफ एथलेटिक्स, रेसलिंग से लेकर हॉकी जैसे खेल हैं जिनके किरदार अपने देश के झंडे तले मेडल की चाहत में पसीना बहाते हैं। स्पोर्ट्स की दुनिया दो खेमों में बंटी है और रेसलिंग को लेकर मौजूदा विवाद ने एक बहस को नए सिरे से जन्म दिया है। बहस ये कि क्या ओलंपिक्स स्पोर्ट्स को तय करने का पैमाना भी पूरी तरह से बाजार होगा? खेल भावना और ओलंपिक आंदोलन के दौर में....

Tuesday , January 22, 2013

लांस, तुम तो हारे ही, लाखों कैंसर मरीजों को हमेशा के लिए हरा दिया


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हार और जीत से आगे, कीर्तिमान टूटने और बनने से दूर खेल में महानायकों की पहचान का एक दूरगामी पैमाना होता है। वह पैमाना यह होता है कि खेल के मैदान से दूर एक आम आदमी के बीच वे अपनी क्या छाप छोड़ जाते हैं? सात बार टूअर डी फ्रांस जीत कर पूरी दुनिया को चौंका देने वाले साइकिलिस्ट लांस आर्मस्ट्रांग का डोपिंग को स्वीकार करना इस सवाल के बीच ले जाता है कि उन्हें इतिहास किस तरह याद करेगा। लांस आर्मस्ट्रांग को दुनिया कैसे याद रखेगी, एक हीरो के तौर पर, जिसने कैंसर को हराया और इसके बाद शायद दुनिया की सबसे मुश्किल खेल प्रतियोगिता 'टूअर डी फ्रांस' पर सात बार कब्जा किया। वे आर्मस्ट्रांग जिनकी किताब 'इट्स नॉट अबाउट द बाइक: माय जर्नी बैक टू लाइफ', कैंसर से मुकाबला कर रहे लाखों मरीजों के लिए बाइबल बन गई। वे आर्मस्ट्रांग जो खेल प्रेमियों ही नहीं एक आम आदमी....

Wednesday, December 26, 2012

सचिन के वनडे से संन्यास के मायने...


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19 साल का एक नौजवान ब्रैडमैन के देश ऑस्ट्रेलिया जाता है और पर्थ के पारंपरिक तेज विकेट पर दुनिया की नंबर एक टीम के खिलाफ लोहा लेता है। पर्थ के वाका ग्राउंड की एतिहासिक पहचान क्रिकेट के जानकारों में ऐसे मैदान की है जहां 1932 में डॉन ब्रैडमैन पहली बार क्रिकेट खेलने आए और मैच को देखने के लिए रिकॉर्ड 20 हजार लोग आए। युवा सचिन की पारी को मीडिया सेंटर में देख रहे क्रिकेट पत्रकार जॉन वुडकॉक अपने चेयर से अचानक उठते हैं और कहते हैं \'मैंने अपनी पूरी जिंदगी में इससे बेहतर क्रिकेट पारी नहीं देखी\' और हां, यहां बैठे लोगों में मैं एकलौता हूं जिन्हें डॉन ब्रैडमैन की चुनिंदा पारियों को देखने का सौभाग्य है। क्रिकेट समाज के दूसरी विधाओं की तरह अलग-अलग दौर में एक महानायक छोड़ जाता है, जो तय सांचे से हटकर अपनी लकीरें खुद खींचता है, डॉन और सचिन अपने-अपने दौर के ऐसे....

Tuesday , September 25, 2012

जिंदगी का एक फलसफा युवराज


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पिता के सपनों को पूरा करने की बेबसी, चैंपियन क्रिकेटर से लेकर टेस्ट टीम में जगह ना बना पाने की जद्दोजहद और मौत के इतने करीब से वापसी- ये सब एक युवराज सिंह की जिंदगी के अलग-अलग आयाम हैं। इन सबको मिलाकर उभरती तसवीर युवराज को खेलों के तय दायरे से बाहर जिंदगी के उस फलक पर ले जाती हैं, जहां हार के लिए कोई जगह नहीं। युवराज आज शतक, रन और रिकॉर्ड से आगे बढ़कर जिंदगी का एक ऐसा फलसफा बन गए हैं, जिनके पन्नों से असली जिंदगी की बीरीकियों को समझा जा सकता है। वर्ल्ड कप फाइनल 2011 से ठीक दो दिन पहले की शाम..पूरे टूर्नामेंट में सीने में भारीपन, लगातार पसीना और बेवक्त उलटी के बावजूद युवराज सिंह मैच दर मैच खुद को झोंके जा रहे थे लेकिन अब शरीर पूरी तरह से जवाब दे रहा था। स्पोर्ट्स साइंटिस्ट के मुताबिक यह खिलाड़ी की जिंदगी में वह....

Monday , August 27, 2012

सचिन, द्रविड़ से आगे...


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बीता कल हमेशा दिल को ठंडक देता है, तो आने वाला कल एक अजीब सी गुदगुदी पैदा करता है। इन दोनों के बीच होता है संक्रमणकाल, जो अतीत की परछाईं और भविष्य की आहट के बीच का दौर होता है। ये संक्रमणकाल और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है जब बीता कल यागदार हो और आने वाले कल से उम्मीदें बढ़ जाएं। भारतीय क्रिकेट एक ऐसे ही दौर से गुजर रहा है। क्रिकेट के इतिहास में ऐसा कम ही होता है जब सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण, वीरेंद्र सहवाग और अनिल कुंबले जैसे सितारे एक साथ एक ड्रेसिंग रूम का हिस्सा हो। एक एक कर ये सितारे भारतीय क्रिकेट के आसमां से जाते जा रहे हैं। हां, सचिन तेंदुलकर पोल स्टार की तरह अब भी डटे हुए हैं, लेकिन असली जिंदगी में कोई पोल स्टार नहीं होता। ऐसे सितारे विराट कोहली, चेतेश्वर पुजारा, रोहित शर्मा पर ना सिर्फ जिम्मेदारी बढ़ा....

Friday , June 08, 2012

कोरबो, लोड़बो, लेकिन क्या आईपीएल जीतबो रे...


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कोलकाता नाइट राइडर्स ने जब आईपीएल-5 पर कब्जा किया, तो इंग्लैंड में बैठे आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी थोड़ा मुस्कुरा रहे होंगे और शायद इससे अधिक पछता भी रहे होंगे। साल 2008 में जब ललित मोदी ने भारत में दुनिया की सबसे दमदार प्राइवेट लीग लाने का दांव चला, तब ना तो यह कॉन्सेप्ट नया था और ना ही पिछला अनुभव उत्साह दिलाने वाला था। सुभाष चंद्रा के इंडियन क्रिकेट लीग को बोर्ड ने नहीं चलने दिया तो विश्व स्तर पर टेक्सास के अरबपति एलन स्टैंफोर्ड के प्रयोग ने दम तोड़ दिया था। ललित मोदी का फॉर्मूला साफ था, भारत में क्रिकेट को लेकर जबरदस्त जुनून है, और बॉलीवुड व उद्योग जगत के नामी गिरामी चेहरों को जोड़कर एक \'फैन बेस\' तैयार किया जा सके। कोई आश्चर्य नहीं, इससे पहले राजस्थान रॉयल्स और डेक्कन चार्जर्स ने एक-एक बार और चेन्नई सुपरकिंग्स ने लगातार दो बार आईपीएल जीता लेकिन केकेआर....

Monday , June 04, 2012

'बाजीगर' का कैसे सच हुआ सपना


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बॉलीवुड के सुपरस्टार शाहरुख खान ने पहले चार आईपीएल में ब्लॉकबस्टर बनाने की पूरी कोशिश की, लेकिन बार-बार रा-वन बन रही थी। आखिरकार पांचवीं बार वो \'दिल तो पागल है\' बनाने में कामयाब रहे। कोलकाता नाइट राइडर्स को जीत भले ही बीते रविवार को मिली, लेकिन इसकी नींव 2011 आईपीएल से पहले ऑक्शन में रखी जा चुकी थी। तीन आईपीएल में पूरी तरह से औंधे मुंह गिरने के बाद, टीम मैनेजमेंट को एक \'हंग्री यंग मैन\' की तलाश थी। दिल्ली में पले-बढ़े और पढ़े शाहरुख को ये \'हंग्री यंग मैन\' आखिर दिल्ली में ही जाकर गौतम गंभीर के तौर पर मिला लेकिन सौरव गांगुली और कोलकाता के पिटे हुए ट्रैक से हटने का फैसला आसान नहीं था। आखिरकार बॉलीवुड के इस बाजीगर ने हारी बाजी को तब जीता, जब बीटन ट्रैक से हटकर सख्त कदम उठाने का फैसला लिया। 2008 से लेकर 2012 के बीच बॉलीवुड के इस बाजीगर ने....

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