देश में आम चुनाव खत्म हो चुके हैं। इन चुनावों में पूरे देश में मुद्दे भले ही अलग-अलग रहे हों पर एक बात लगभग सारे देश में एक जैसी ही रही कि वोटरों ने अपने घरों से निकल कर पोलिंग बूथ तक जाने में कम रुचि दिखाई। इसकी वजह मौसम को बताया गया। नेताओं और अभिनेताओं की लाख कोशिशों के बावजूद वोट प्रतिशत नहीं बढ़ा। कई जगहों पर तो ये पिछले चुनावों से भी कम हो गया। फिल्मी सितारों की अपीलें और प्रियंका गांधी जैसी युवा नेता की विनती भी वोटरों को पोलिंग बूथ तक नहीं ला पाई। शायद अब समय कुछ नया सोचने का है। क्यों न ई-वोटिंग पर विचार किया जाए। कई देशों में तो ई-वोटिंग शुरू भी हो चुकी है। इंटरनेट की बढ़ती लोकप्रियता ने ई-डेमोक्रेसी के कॉन्सेप्ट को जन्म दिया है। इंग्लैंड में 2007 के निकाय चुनावों में वोट डालने के लिए परम्परागत तरीके के....
एक अनाम शायर की...मेरी पसंदीदा नज़्म....उन दोस्तों के नाम जो जिंदगी की आपाधापी में जीना भूल गये हैं...... ये किस खामोश जिंदगी से बस उलझे रहे साल भर तुम..... किसी दिन तो तेज़ लय और थाप पे रक़्स किया होता किसी सुबह तो ओस से भीगी घास पर चले होते किसी दिन तो पहाड़ों पर जाके, तेज़ बर्फीली हवाओं का मिज़ाज पूछा होता, किसी शब तो निकलते चांद के नाम, जाम पिया होता किसी रात तो देर गये डूबते तारों का मातम भी मनाया होता किसी रोज़ नर्म साहिल के हवाले,मौज-ए-दरिया से इश्क किया होता कहर-आलूद समंदर से आंख मिलाई होती, किसी शाम तो वो झील में डूबते आफताब का गोला हाथ में उठाया होता गई बारिश की रुत में रूह के अंदर तक भीगे होते किसी जाबांज़ परिंदे के परवाज़ से चाल मिलाई होती किसी तारों भरी खामोश रात की तह नापी होती किसी रोते हुए बच्चे की....









