वर्तिका नन्दा
Wednesday, January 02, 2013

हां, मैं थी..हूं..रहूंगी...


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देखिए मैं यह बात साफ तौर पर कह देना चाहती हूं कि मैं भी अगर मर जाऊं या मारी जाऊं तो उसकी जांच पुलिस से न कराई जाए। जांच करवा कर कुछ होगा नहीं। बेवजह ऊपर बैठे भी तनाव रहेगा और यहां सत्ता वाले पूछ लेगें - ठीक है। यह बात मैनें उस शाम अपने फेसबुक पर लिखी। मन चुप था। रोज बयानों की म्यूजिकल चेयर के बीच यह भी तय था कि देश की जनता पहली बार पूरे ब्यौरे के साथ यह जान रही है कि अपराध की कितनी परतें हो सकती हैं और कैसे एक अपराध किस कदर घुमावदार रास्तों से गुजरते-गुजरते खुद अपराध का शिकार होते चलता है । जाते हुए साल ने पुलिस, न्यायिक तंत्र, महिला आयोग, जनता और मीडिया - इन सभी के बेहद नए पक्ष को उभार कर रख दिया। 199 की आबादी पर एक सिपाही रखने वाली दिल्ली पुलिस जिसके पास वीआईपी ड्यूटी,....

Thursday , January 20, 2011

गोवा के बीच पर राष्ट्रपति


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गोवा के एक बीच पर इत्मीनान से कुछ सुस्ताती सीं राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का फोटो जिस रोज अखबार में छपता है, बहुत से पाठक उसे देख कर मुस्कुराते हैं। यह एक मानवीय तस्वीर है। देश की महामहिम का एक सामान्य इंसान की तरह छुट्टी मनाता यह चेहरा जनता को बड़ा भला लगता है। लेकिन भलमानसहत से ली गई यह तस्वीर उनकी किलेबंदी में लगे सुरक्षा अधिकारियों को भली नहीं लगती। लिहाजा गोवा पुलिस को बीच में डाला जाता है और वह उन तीनों फोटो पत्रकारों को तलब करती है जिन्होंने यह गुस्ताखी की है। गगनदीप श्लेडेकर, अरविंद टेंग्से और सोरू कोमारपांत- इन तीनों पत्रकारों के बयान रिकार्ड किए जाते हैं और पूछा जाता है कि इतनी कड़ी सुरक्षा को देखने के बावजूद उन्होंने महामहिम की तस्वीर खींचने की गलती क्यों की। अलग-अलग पूछताछ के दौरान ये तीनों पत्रकार बताते हैं कि सुरक्षा अधिकारियों के निर्देश के मुताबिक ये तस्वीरें 200....

Monday , January 03, 2011

आमीन ! हिंदी !


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हिंदी के एक राष्ट्रीय दैनिक ने एक तरफ धोनी की तस्वीर छापी है और ठीक दूसरी तरफ आलोक श्रीवास्तव की। धोनी खबर की दुनिया की उस खास जरूरत की पूर्ति करते हैं जो बिकती है यानी कि राजनीति, अपराध, क्रिकेट या विवाद। लेकिन आलोक श्रीवास्तव का इनमें से किसी से भी कोई सरोकार नहीं है। वे टीवी के एक पत्रकार हैं और अब खबर में इसलिए आए हैं कि उन्हें अपनी किताब आमीन के लिए रूस का अंतर्राष्ट्रीय पुश्किन सम्मान दिए जाने की घोषणा की गई है। यह सम्मान तीन साल बाद दिया जा रहा है। आलोक को दिए जाने वाले इस सम्मान की खबर करीब हर हिंदी अखबार में पूरी प्रमुखता से छपी लेकिन अंग्रेजी वाले, अपने स्वभाव के अनुरूप ही, इस मामले में कंजूसी कर गए। खैर, खबर का छपना खबर नहीं है। खबर यह है कि अब हिंदी और हिंदी वाले अपने हिंदी स्वरूप का उत्सव....

Saturday , December 18, 2010

संवेदना के धागों से बुनी एक खबर


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एक अकेला भारत ही संवेदनशील है, भावनाओं के समुंद्र में बहता है और वह उफान में रोज गहराता है, ऐसा नहीं है। कार्ला ब्रूनी जब फतेहपुर सीकरी जाती हैं तो अपनी दूसरी शादी और पहले से एक बच्चे की मां होने के बावजूद यह जानकर भावुक हो उठती हैं कि यहां मुराद मांगने से झोली जरूर भरती है। हाथ में चादर लिए वे माथा टेक कर कई मिनट लगातार सरकोजी के जरिए एक बच्चे की मुराद मांगती चली जाती हैं और जब चादर चढ़ा कर बाहर आती हैं तो उनके चेहरे पर नारी सुलभ संकोच और सौम्यता टपकती दिखती है। इलेक्ट्रानिक मीडिया इसी संकोच पर खबर दर खबर गढ़ता चला जाता है। कुछ जगह आधे घंटे के प्रोग्राम बना दिए जाते हैं। कार्ला और सरकोजी कव्वाली की धुन के बीच उस सलीम चिश्ती के रंग में सराबोर दिखते हैं जिसने बादशाह अकबर को भी खाली हाथ नहीं भेजा था। कार्ला....

Monday , October 12, 2009

अपराधी समाज, अपराधी मीडिया


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चुनावी माहौल की रस्साकशी के बीच हाल ही में मुंबई में कुछ ऐसा भी हुआ जिसने विचलित किया। ये तस्वीरें दहशत और सामाजिक विद्रूपता की थीं। ये तस्वीरें उस परिवार की पत्नी और तीन लड़कियों की हैं जिन्हें परिवार के मुखिया ने सात साल तक कमरे में बंधक बना कर रखा। इन महिलाओं के लिए सूरज की रोशनी सपना था और भरपेट खाना भी। यह सब सात साल तक चला, वो भी एक ऐसे शहर में जिसे सपनों की माया नगरी कहा जाता है। एक ऐसा शह जहां हर साल गरीबी, दहशत, शोषण और प्यार के आस-पास घूमतीं 1000 से ज्यादा फिल्में बनाई जाती हैं जो कि दुनिया में सबसे ज्यादा हैं। बहरहाल इन महिलाओं को कमरे की चारदीवारी में रखने वाला गोम्स अब पुलिस की गिरफ्त में है। उस पर मुकद्दमा भी चलेगा लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती। यहां से कहानी शुरू होती है। यह कहानी डर,....

Friday , February 06, 2009

मंदी–आशंकाओं के बीच सबक का मौसम


2 IBNKhabar

भारतीय इतिहास में शायद यह पहला ऐसा साल होगा जब पेशेवर स्नातकों को कम पढ़े-लिखे लाखों लोगों के मुकाबले नौकरी खोजने या उपयुक्त नौकरी खोजने में ज्यादा दिक्कत होगी। अगले 12 महीने में भारत में नौकरी चाहने वालों की संख्या में 30 लाख स्नातक जुड़ जाएंगें। लेकिन यह आकलन सिर्फ भारत को लेकर है। लेकिन अगर पूरी दुनिया में आई मंदी को लेकर ताजा आंकड़ों को देखें तो स्थिति का वास्तविक अंदाजा लगाना आसान होगा। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन(आईएलओ) के जारी एकदम ताजा आंकड़े कहते हैं कि इस साल के आखिर तक दुनियाभर के 5 करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हो जाएंगे। संगठन का यह भी कहना है कि आर्थिक मंदी की वजह से पैदा हुई इस हालत के मद्देनजर अगले दस साल के भीतर 5 करोड़ लोगों के नौकरी से हाथ गंवा बैठने की आशंका है। यानी एक साल में दो करोड़....

Tuesday , January 27, 2009

मीडिया में कहां हैं जय जवान, जय किसान?


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किसान भाइयों को राम राम। 26 जनवरी, 1966 को इस संबोधन के साथ जिस प्रयोग की शुरुआत हुई, उसका नाम था- कृषि दर्शन। मकसद था-किसानों तक कृषि संबंधी सही और जरूरी सूचनाओं का प्रसारण। कहने को तो आप इसे महज एक कार्यक्रम भर मान सकते हैं लेकिन दरअसल कृषि दर्शन अपने आप में एक मुहावरा है। याद कीजिए वे दिन जब काले-सफेद टीवी के परदे के सामने बैठ कर दर्शक सत्यम् शिवम् सुंदरम् के लोगों को बहुत चाव से देखा-सुना करते थे। उन दिनों दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले गिने-चुने कार्यक्रमों में से एक था - कृषि दर्शन। चूंकि तब विकल्प नहीं थे और मनोरंजन के साज बुद्धू बक्से पर एक ही चैनल का कब्जा था तो यह कृषि दर्शन कई बार बड़े काम का लगता था। इस कार्यक्रम को असल में एक दृष्टि के साथ शुरू किया गया था। कृषि दर्शन एक प्रयोग था जिसे सबसे पहले दिल्ली....

Friday , January 09, 2009

बलात्कार और मीडिया


6 IBNKhabar

बलात्कार फिर एक बार सुर्खियां बना। इस बार घटना नौएडा की है। एक लड़की के साथ दस लड़के दिनदहाडे़ बलात्कार करते हैं। मुस्तैदी दिखाते हुए नौएडा पुलिस 24 घंटे के अंदर ही आरोपियों को पकड़ लेते हैं और मामला ' सुलझ ' जाता है। इसके बाद मीडिया में हर बार की तरह औपचारिक खबरें छपती हैं कि यह तमाम शहरों औरतों के लिए बहेद असुरक्षित हैं। इस पूरे घटनाक्रम में कुछ बातें साफ तौर पर उभर कर आईं हैं। पहली बात तो यह कि मीडिया ने खुलकर यह बताया कि बलात्कार पीड़ित लड़की कहां की रहने वाली थी, वह कहां पढ़ती थी, जिस युवक के साथ वह शॉपिंग कांपलेक्स में गई थी, उसका नाम क्या था और उसके पिता दिल्ली पुलिस में क्या करते हैं वगैरह। कहने का मतलब यह कि इस घटना की रिपोर्टिंग करते समय टीवी चैनलों ने तो अपने जाने-माने स्वभाव के मुताबिक कोई एतिहात नहीं....

Friday , December 05, 2008

मुंबई कांड-जाग गया हिंदुस्तान


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शाबाश इंडिया शाबाश! मुंबई की घटना के बाद दो परिवारों ने जिस हिम्मत के साथ इस संदेश को दिया कि चले जाइए आप हमारे घर से। नहीं चाहिए हमें आपकी हमदर्दी, नहीं चाहते हम आपकी सांत्वना का कोई बाउंस हुआ चैक। इस सच ने बहुत दिनों बाद दिल को सुकून दिया। सुकन यह सोच कर मिला कि आखिरकार जाग गया हिंदुस्तान क्योंकि सच को कहने के लिए हिम्मत का होना जरूरी है। हिम्मत चाहिए यह कहने की कि राजनीति की गद्दारी हमें समझ में आ रही है, इसलिए अब हमें आपकी कोई जरूरत नहीं। मुंबई के बहाने इस बार जनता ने बहुत कुछ देखा। इस बार एक साथ ऐसी कई चीजें देखीं जो अब तक टुकड़ों में नसीब होती थीं। जनता ने देखा कि सबसे बड़ा मूर्ख वर्ग भी वही है और अब सबसे निर्णायक भी। पहले बात राजनीति की। आतंकवादी हमला हुआ और ताबड़तोड़ शुरू हुई राजनीति।....

Tuesday , November 25, 2008

सहारनपुर टू मुंबई- आशुतोष महाराज


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तीन महीने पहले तक सहारनपुर के उस मोहल्ले के लोग भी शायद आशुतोष कौशिक को नहीं जानते थे जहां वह पले-बढ़े और जो जानते थे, उनके लिए आशु एक ढाबे मालिक से ज्यादा शायद कुछ नहीं था। आज वही आशुतोष एक बड़ा आदमी बन गया है क्योंकि उसने बिग बास में जीत हासिल कर ली है। अब वह पेज तीन का छोरा बन गया है और बहुतों की आंखों का तारा। पर आशुतोष की यह जीत सिर्फ ढोल-नगाड़ों की धमाधम से कहीं आगे भी सोचने को मजबूर जरूर करती है। ऐसा क्या था इस लड़के में कि वह बहुत से मामलों में अपने से आगे दिख रहे प्रतियोगियों को भी हरा कर एक करोड़ का सेहरा अपने सिर पर बंधा गया? बेशक यह सिर्फ किस्मत का खेल नहीं बल्कि दर्शक के स्वाद और आम इंसान की रुचियों की भी एक बढ़िया मिसाल है। दरअसल 'कलर्स' ने जब....

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