चुनाव परिणाम आने के अड़तालिस घंटे बाद मायावती के गांव बादलपुर के निवासी राम प्रवेश से जब मैंने चुनाव में बीएसपी को मिली शिकस्त पर सवाल पूछा तो बिना कुछ बोले राम प्रवेश ने अपनी अंगुली मायावती के घर की तरफ उठा दी। राम प्रवेश का घर मायावती की इमारत के पीछे करीब पांच सौ मीटर की दूरी पर है। जहां से मायावती का बंगला साफ दिखाई देता है। खपरैल और कच्ची मिट्टी में ईंट के सहारे बने राम प्रवेश के घर से मायावती का बंगला पत्थर से बना दिखता है। हालांकि यह कमाल रंग-रोगन का भी है। खैर, मायावती के बंगले की तरफ उठी राम प्रवेश की अंगुली को देखकर मैंने फिर पूछा इसमें इस बंगले का क्या कसूर। रामप्रवेश ने बिना बोले अंगुली उन घरों की तरफ उठा दी जो कुकरमुत्ते की तरह बंगले के इर्द-गिर्द नजर आ रहे थे। तभी राम प्रवेश की पत्नी ननकी घर....
1975 की प्रसिद्ध फिल्म \"दीवार\" का वह दृश्य याद कीजिये जिसमें मंदिर में मां की पूजा के बाद अमिताभ और शशिकपूर दो अलग-अलग रास्तों पर नौकरी के लिये निकल जाते हैं। अमिताभ एक ऐसे रास्ते चल पड़ते हैं जहां पैसा है, सुविधा है। वहीं पैसा बनाने के इस धंधे में अपराध करते अमिताभ को रोकने के लिये उन्हीं के भाई शशि कपूर सामने आते हैं। न्याय और अपराध के खिलाफ शशिकपूर की पहल को मां की हिम्मत मिलती है। अमिताभ मारे जाते हैं लेकिन उनका दम उसी मां की गोद में निकलता है जिसकी हिम्मत से शशिकपूर अमिताभ पर गोली दागते हैं। कांग्रेस को लेकर जनादेश के डायलॉग कुछ इसी तरह की एक नयी राजनीति गढ़ रहे हैं। जिसमें मनमोहन और राहुल गांधी के कामकाज के रास्ते अलग-अलग हैं। मनमोहन उस अर्थव्यवस्था से समाज को विकसित बनाने निकले हैं जिसमें देश के भीतर दो देश बनने ही हैं।....
चुनाव के पहले चरण में बैलेट पर बुलेट दाग कर नक्सलियों ने अपनी पांच साल पहले की उस सोच को ही मूर्त रूप देना शुरू किया है जिसे एमसीसी और पीडब्लूजी ने मिलकर पाला था, ठीक पांच साल पहले। 2004 में बिहार-झारखंड में सक्रिय माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर यानी एमसीसी और आंध्र प्रदेश से लेकर बस्तर तक में सक्रिय पीपुल्सवार ग्रुप यानी पीडब्लूजी एक हुए थे। उस वक्त नक्सली संगठनों के अंदर पीडब्लूजी की पहचान हथियारबंद संघर्ष के लिये मजबूत ट्रेनिंग दस्ते का होना था तो एमसीसी की पहचान प्रभावित इलाकों में लोगों को सामूहिक तौर पर जोड़कर किसी भी हमले को अंजाम देना था। लेकिन 2004 में जब दोनों संगठन एक हुए और सीपीआई माओवादी का गठन किया तो पहला सवाल दोनों के बीच इसी बात को लेकर उठा कि संसदीय राजनीति के चुनाव में माओवादियों की पहल का तरीका इस तरह का होना चाहिये जिससे आर्म्स स्ट्रगल....
गेट-वे के सामने खड़े होकर ताज होटल की फोटो खींचना नया टूरिज्म है। पुराना टूरिज्म ताज को पीठ दिखाते हुये गेट-वे ऑफ इंडिया की तस्वीर खींचना था। आतंक को लेकर खौफजदा मुंबई शहर में कोई भी बाहरी सबसे पहले उसी जगह पहुंचना चाहता है जहां, साठ घंटे तक गोलियां चलती रहीं, धमाके होते रहे और समूचे देश के कमोवेश हर घर में यह सब टीवी पर लाइव देखा जाता रहा। गेट-वे पर खड़े होकर समुद्र देखने से ज्यादा हसीन घायल ताज लगता है। खासकर जब सूरज ढल रहा हो। इसीलिये ढलते सूरज को समुद्र की ओट में देखने से ज्यादा हसीन सूरज की लालिमा में ताज की फोटो को कैद करने की होड़ हर दिन देखी जा सकती है। यह इलाका कोलाबा के नाम से जाना जाता है और चुनावी मौके पर दक्षिणी मुंबई की लोकसभा सीट के तौर पर इसकी पहचान है। लेकिन पहली बार सिर्फ ताज....
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की मानें तो एटीएस पंचतंत्र की कहानी लिख रहा है। क्योंकि जो लोग मालेगांव ब्लास्ट के आरोपी हो सकते हैं वही लोग संघ के कार्यवाह मोहनराव भागवत और कार्यकारिणी सदस्य इन्द्रेश कुमार की हत्या की साजिश कैसे रच सकते हैं। लेकिन हिन्दुत्व की जिस राह को अभिनव भारत सरीखा संगठन पकड़े हुये है और हिन्दुत्व का नाम लेते-लेते आरएसएस जिस राह पर जा चुका है अगर दोनों की स्थिति को दोनों के घेरे में ही देखें तो पहला सवाल यही उठेगा कि मालेगांव को लेकर जो सोच अभिनव भारत में है कमोवेश वही सोच आरएसएस को भी लेकर है। यानी मालेगांव और संघ के हिन्दुत्व में कोई अंतर करने की स्थिति में अभिनव भारत नहीं है। इस स्थिति को समझने से पहले जरा दोनों के अतीत को समझ लें। दरअसल अभिनव भारत जिस हिन्दू महासभा से निकला उसके कर्ता-धर्ता सावरकर थे जो सीधे कहते थे," इस....
1937 तक तो जिस पंडाल में कांग्रेस का अधिवेशन होता था उसी पंडाल में दो दिन बाद हिन्दूमहासभा का अधिवेशन होता और मदन मोहन मालवीय के दौर में तो दोनों अधिवेशनों की अध्यक्षता मालवीय जी ने ही की। इसलिये आरएसएस कांग्रेस की थ्योरी से हटकर सोचती रही लेकिन हिन्दु महासभा का मानना है कि संघ ने बीजेपी की सत्ता का मजा लेकर सत्ता दोबारा पाने के लिये खुद के संगठन का कांग्रेसीकरण ज्यादा कर लिया है और हिन्दू राष्ट्र की थ्योरी को पूरी तरह नकार दिया है। महत्वपूर्ण यह भी है कि ब्रह्मणों की पंरपरा को लेकर भी मतभेद उभरे। चूंकि हेडगेवार की तरह सुदर्शन भी तेलुगु ब्रह्मण है तो हिन्दुत्व पर कड़ा रुख अपनाने की सुदर्शन की क्षमता को लेकर भी यह बहस हुई कि संघ फिलहाल सबसे कमजोर रूप में काम कर रहा है इसलिये संघ की मराठी लॉबी भी सावरकर की सोच को आगे बढ़ाने में....









