बार-बार दोहराया जाता है कि बिहार के इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता, देश के विकास में बिहार का अहम योगदान रहा है, कई ऐसे महापुरुष थे, जो थे तो बिहार के लेकिन उनकी पहचान बिहार तक ही सीमित नहीं थी। जब भी इतिहास की बात होती तो उनके चर्चे जरूर होते हैं। लेकिन वर्तमान में बिहार और बिहार के लोग अपनी पहचान इतिहास में दर्ज कराने में असफल रहे, या फिर वो उस लायक साबित ही नहीं हुए कि उनका नाम और उनके काम को सराहा जाए। लेकिन बिहार में 24 अक्टूबर को एक युग का अंत हो गया और उसके साथ ही दूसरे युग ने स्वर्णिम दस्तक दे दी है। भले ही इसे इतिहास के पन्नों में अपनी जगह बनाने में अभी वक्त और लगे, लेकिन ऐतिहासिक तो शुरू के दिनों से ही हो गया। सीधे लफ्जों में कहें तो नीतीश ने एक युग का अंत कर दिया....
विकास तो हुआ है लेकिन उस पैमाने तक नहीं, ताकि वोट बिरादर पर हावी हो। विकास की हवा तो है लेकिन लहर पैदा नहीं हो पाई। वोटर से लेकर नेताजी तक पूरे कंफ्यूज हैं। चुनावी एजेंडा बन ही नहीं पाया। कुल मिलाकर नीतीश अंधेरे में तीर मारने की पूरी जुगत में लगे हैं तो लालू जी तेज आंधी में लालटेन के सहारे नए रास्ते तलाश रहे हैं। यानि बिहार में खिचड़ी चुनाव की तैयारी हो चुकी है। पांच साल पहले जैसे ही नीतीश की सरकार सत्ता में आई तो 90 दिन के अंदर कानून-व्यवस्था दुरुस्त करने की बात कही गई। कुछ हद तक अपराध पर लगाम भी लगी लेकिन समयसीमा फेल हो गई। लालू जी का जंगल राज खत्म हो गया था, एक नए सबेरे के साथ बिहार की फिजाएं बदलने लगी थीं। जेपी आंदोलन के दो सिपाही आमने-सामने थे, टक्कर अब भी कांटे की थी। क्योंकि लालू की....
एक नाम जो कई माइने-आइने दिखाता है, वो नाम हर वो बोली बोलता है। कभी दहाड़ता है तो कभी झुककर अभिवादन भी करता है। कहावत है कि एक सिक्के के दो पहलू होते हैं, परंतु इसे सिक्के में दो पहलू तो हैं लेकिन दोनों एक जैसे! इनकी ऐसी सधी चाल जिसमें अगर जीत पक्की ना हो, लेकिन हार भी नहीं होती। भले ही इस दामन पर कुछ बदनुमा दाग हो, लेकिन फिर भी इनके आगे विरोधी नहीं टिकते, अपनों ने तो मानो घुटने की टेक दिए हों। जी हां, हम बात करे रहे हैं राजनीति के धुरंधर नरेन्द्र मोदी की। मोदी वैसे तो पर्दे पर दहाड़ने और विरोधियों पर तीखे प्रहार के लिए जाने जाते हैं। लेकिन कभी-कभी ये पर्दे के पीछे से भी ऐसा तीर चलाते हैं। जिससे विरोधी घायल ही नहीं, चीखने लगता है। आखिर चीखे भी क्यों नहीं! मोदी ऐसी चाल ही चलते हैं जिससे....
लोकसभा चुनाव सिर पर है। राजनीतिक पार्टियों ने भी चुनावी अखाड़े में उतरने की पूरी तैयारी कर ली है। लेकिन इस बीच देश की जनता मायूस और गुस्से में है। जनता की नाराजगी की भनक पार्टियों को भी लग चुकी है और मनाने की रणनीति भी तैयार की जा रही है। कहते हैं कि जनता सब जानती है। लेकिन अब यह कहावत पुरानी हो चुकी है। अब कुछ हदतक कह सकते हैं कि जनता सब कुछ जानती ही नहीं पूछती भी है। हाल में हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों से ये तस्वीर साफ हो गई कि जनता बुनियादी सुविधाओं को असली चुनावी मुद्दा मानती है। मंदिर, मस्जिद और न जाने इस तरह के कई मुद्दे हैं जिसके सहारे पार्टियां चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश करती हैं और आगे करेंगी। पर सच्चाई ये है कि ज्यादातर जनता-जनार्दन इसे मुद्दा ही नहीं मानती। जनता तो रोटी, कपडा़....









