हर माता-पिता अपने बच्चे के बेहतर कल के लिए उसे ठीक से शिक्षित करना चाहते हैं। हर कोई अपने बच्चे को अव्वल देखना चाहता है। मन में इन लक्ष्यों के साथ माता-पिता अपने बच्चों को प्रतियोगिताओं में बचपन से ही डाल देते हैं जहां विफलता बर्दाश्त नहीं होती और अंत में यह तनाव का एक प्रमुख कारण बन जाती है। स्कूलों में बेहतर परिणाम के लिए बच्चों पर और दबाव डाला जाता है। बच्चों के आराम को दांव पर लगाकर अच्छे परिणाम और रिकॉर्ड के लिए ऐसा हो रहा है। अंत में यह सब आज स्कूल जाने वाले बच्चों में मानसिक तनाव को जन्म देता है। भारी स्कूल बैग बच्चों के लिए शारीरिक बोझ बन चुके हैं। शासन द्वारा एक बच्चा केवल उसके शरीर के वजन के 10 से 15 फीसदी बोझ ही ले सकता है लेकिन बच्चे हर दिन स्कूल बैग के रूप में अधिक से अधिक....
घाटी में खुदकुशी की बढ़ती घटनाएं दिन-ब-दिन गंभीर शक्ल लेती जा रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 7 महीनों में 200 से अधिक लोगों ने खुदकुशी की है जिनमें से 60 फीसदी जवान लड़कियां और महिलाएं हैं। विशेषज्ञ इसे कश्मीर के हालात का नतीजा बता रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार घाटी में आतंकवाद शुरू होने से पहले खुदकुशी का अनुपात 0....
कश्मीर में बहार का मौसम लौट रहा है। बागों में खिले बादाम के फूलों की खुशबू माहौल को महका रही है। कड़ाके की ठण्ड के बाद खिलती धूप ने इस जन्नत को खुशगवार मौसम में बदल दिया है। बहार का हर तरफ स्वागत होता दिख रहा है लेकिन हर दिल में एक डर सा है। पिछले कुछ दिनों से कश्मीर में लगातार कुछ ऐसी खबरें उड़ रही हैं जिससे लोगों के दिलों में डर ने जन्म लिया है। डर हालात बिगड़ने का...। एक और जहां यह खबर मिल रही है कि सीमा पार कई सौ आतंकी घुसपैठ कर कश्मीर में आतंक का तांडव मचाने की फ़िराक में हैं वहीं दूसरी और यह डर है कि कहीं फिर इस साल भी पिछले तीन सालों की तरह बहार के मौसम में कश्मीर में ज़िंदगी ना थम जाए। कहीं फिर कश्मीर की सड़कें सूनी ना हो जाएं। कहीं फिर खून से लाल....
कुछ समय पहले मैं श्रीनगर की सबसे पुरानी और मशहूर न्यूज़ एजेंसी अब्दुल्ला न्यूज़ एजेंसी जो दरिया-ए-झेलम के किनारे स्थित है, के पास से गुज़रा। मैंने इस एजेंसी पर नए साल के अलग-अलग कलेंडर लटके देखे। मुझे याद आया हुर्रियत का प्रदर्शन कलेंडर जो वो साल 2010 की गर्मियों में जारी किया करते थे लेकिन मैं दंग तब रह गया जब मैंने इन कलेंडरों में अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी का कलेंडर भी लटका देखा। लोग इस कलेंडर को खरीद रहे थे। मुझे लगा कि यह कलेंडर साल 2011 का प्रदर्शन कलेंडर होगा और मैं भी लाइन में खड़ा हो गया ताकि मैं भी इसको खरीद सकूं लेकिन जब मैंने देखा यह सही में तारीखों वाला कलेंडर था। इसमें प्रदर्शनों का कोई भी ज़िक्र नहीं था। हुर्रियत प्रदर्शन कलेंडरों ने साल 2010 में कश्मीर में जिंदगी को थमा दिया था। तुफैल मट्टू की हत्या के बाद कश्मीर में....
21 अक्टूबर को मैं घर से सुबह-सुबह ही निकल पड़ा। गाड़ी की रफ़्तार कुछ ज़्यादा ही बढ़ाकर मैं दफ्तर की तरफ जा रहा था। रास्ते पर ट्रैफिक कम था क्योंकि इस दिन भी यहां कश्मीर बंद की कॉल लागू थी। दरअसल मुझे अपने दफ्तर पहुंचकर श्रीनगर से करीबन दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित जीवन पुलिस ट्रेनिंग सेण्टर पहुंचना था जहां इस दिन शहीद दिवस का समारोह था और मुख्यमंत्री और पुलिस प्रमुख को वहां मौजूद होना था ताकि मैं कोई खबर निकाल सकूं लेकिन अभी मैं दफ्तर से पांच मिनट की दूरी पर था कि मेरे एक सूत्र ने मुझे खबर दी कि श्रीनगर से करीबन पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर मालूरा गांव में तीन आतंकी जो विदेशी मूल के हैं पुलिस और सेना के घेरे में फंस गए हैं और कुछ ही देर में मुठभेड़ शुरू होने वाली है। मैंने इस खबर को पुलिस अधिकारियों से क्रॉस चेक....
कश्मीर घाटी में एक के बाद एक हो रही घटनाओं का हल सरकार ने कर्फ्यू के रूप में ढूंढा है। मौतों का सिलसिला लगातार चलने से लोगों में गुस्सा थमने के बजाए लगातार बढ़ता नजर आ रहा है। अब तक 2 महीनों में तकरीबन 52 मौतों ने कश्मीर में हालात को काफी गंभीर बना दिया है। यह हालात कैसे पैदा हुए, इस सवाल का जवाब अब तक मिलना बाकी है और इस सवाल का जवाब सिर्फ इन मौतों की सही मायनों में तहकीकात के बाद ही मिल सकता है लेकिन सरकार की तरफ से अबतक एक ही जवाब मिला कि यह सब हंगामा पसंद तत्वों का काम है। मगर इतना ही कहना काफी नहीं कि इस सब के लिए हंगामा पसंद तत्व ज़िम्मेदार हैं असल में यह देखने की ज़रूरत है कि सरकार के मुताबिक हंगामा पसंद तत्व किस हद तक ज़िम्मेदार हैं और सरकारी लापरवाहियों का कितना हाथ है।....
कुछ दिनों से जन्नत कहलाए जाने वाला कश्मीर फिर प्रदर्शनों की आग से झुलस रहा है। कुछ दिन पहले फिर एक मासूम अपने भविष्य के ख्वाब देखते हुए मौत की नींद सो गया। पुलिस के आंसू गैस के गोले ने इन ख़्वाबों को चकनाचूर कर दिया। बारहवीं कक्षा में पड़ने वाले तुफैल मटू ने ज़िन्दगी की आखरी सांस ली। यह पुलिस द्वारा पिछले 6 महीनों में दूसरा ऐसा कारनामा है जिसमें एक बेगुनाह की मौत हुई हो। कश्मीर के लोगों के लिए सुरक्षा का बीड़ा उठाए हुए पुलिस अगर अपने दामन से यह दाग मिटाना भी चाहे तो मिटा नहीं सकती। इस हादसे के बाद फिर वही हुआ जो हर कत्ल के बाद होता है- जांच के आदेश। वहीं सेना ने जो किया वो एक इंसान के दिल को काटकर रख देता है। ज़रा सोचिए एक इंसान की बोली लगाकर उसे ख़रीदकर आतंकी बना कर मार डालना। इंसानियत के नाम....
कश्मीर की हसीन वादी में दूर दराज़ के नियंत्रण रेखा से सटे इलाके सोगाम गांव में जन्मे शाह फैसल ने कश्मीर पर बरसों से छाए घने अंधेरे में एक चिराग जलाकर यहां की नई पीढ़ी के लिए नई राह को रोशन कर दिया है। इस नौजवान ने देश की सबसे सर्वश्रेष्ठ परीक्षा (UPSC) यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन में अव्वल आकर एक इतिहास रचा। यह कश्मीर का अब तक का पहला युवक बना जिसने इस परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया हो और इसकी इस कामयाबी से इसने ना सिर्फ अपने परिवार बल्कि पूरे राज्य के नाम को चार चांद लगा दिए। इसकी कामयाबी की ख़ुशी इतनी बड़ी है कि यह सिर्फ फैसल के परिवार तक सीमित ना रह सकी बल्कि एक इतिहास बन यहां की नई पीढ़ी के लिए एक नई मशाल बनकर रोशन हो गई। फैसल ने यह सब कर दिखाया है बिना किसी सहयोग और सिफारिश....
घाटी में पिछले कुछ साल की खामोशी के बाद फिर आतंकियों की सरगर्मियां पिछले कुछ समय से बढ़ने लगी हैं। खासकर श्रीनगर शहर में आतंकियों की मौजूदगी साबित हुई है। खुफिया विभाग को भी यह जानकारी है कि आतंकियों का एक ग्रुप श्रीनगर शहर में दाखिल होने में कामयाब हुआ है। और इसके बाद पूरे शहर में खतरे की घंटी बज गई है। जगह-जगह अचानक तलाशियां फिर से शुरू कर दी गई हैं। देर रात सड़कों पर फिर नाके लगने लगे हैं। आने-जाने वाली हर गाड़ी की तलाशी की जाती है। क्योंकि आतंकियों का श्रीनगर में एक भी हमला बहुत बड़ी कामयाबी है। क्योंकि जो पब्लिसिटी श्रीनगर में आतंकियों को मिलती है वो कश्मीर में किसी भी जगह हमला करने पर हासिल नहीं होती और आतंकी इस साल की शुरुआत से ही श्रीनगर को निशाना बनाया हुआ है। लाल चौक के हमले के बाद वो कोई बड़ा हमला तो....
केंद्र सरकार के विभिन्न विभाग कश्मीर में अपने-अपने तरीके पर अमल करते हैं और अपने-अपने फैसले करते हैं और कभी यह फैसले कश्मीर के हालत को और ख़राब बनाने के कारण बनते हैं। कश्मीर में केंद्र के खिलाफ गुस्सा और बढ़ा देते हैं। प्री-पेड सर्विस पर बैन भी एसा ही एक फैसला है जिसने एक ही दिन में बीस हज़ार लोगों के रोज़गार पर ताला लगा दिया। बीस हज़ार घरों का प्रभावित होना यानी एक लाख लोगों की ज़िन्दगी पर असर होना। इस फैसले के बारे में जब अभी अफवाहें ही फैल रही थीं तो केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट ने यह यकीन दिलाया कि राज्य की अवाम को ऐसा कोई फैसला नहीं लिया जायेगा लेकिन अभी इस वादे के शब्द लोग के कानों मे गूंज ही रहे थे की प्री-पेड सिम पर बैन का फैसला लागू किया गया। यह फैसला क्यों लिया गया? कश्मीर की आम जनता....









