बाबा अमरनाथ की य़ात्रा का इंतजार देशभर के श्रद्धालु करते हैं। जम्मू-कश्मीर में हर साल इस यात्रा से करोड़ों रुपए का व्यापार होता है। खासकर कश्मीर में इसका ज्यादा फायदा होता है लेकिन यात्रा अब राजनीतिक पार्टियों और अलगाववादियों के लिए भी वरदान साबित हो रही है। हर कोई इस यात्रा को मुद्दा बनाकर भोले बाबा शंकर के नाम पर अपनी-अपनी दुकानदारी चमकाने पर लगा है। हो भी क्यों न, हमारी सरकार का रवैया भी ढुलमुल होता जा रहा है वह चाहे केन्द्र सरकार हो या फिर जम्मू-कश्मीर की गठबंधन सरकार। खामोशी ही इसकी मजबूरी बनी हुई है। अभी ज्यादा देर नहीं हुई है। कुछ दो साल पहले यानी 2008 की ही बात है जब अमरनाथ जमीन विवाद उपजा था और इसमें लगभग 50 लोगों की जान गई। 2 महीने तक कश्मीर भी जला और जम्मू भी लेकिन फायदा उठा ले गए राजनीतिक लोग या फिर वो जो आम....
केन्द्र सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों के डीए को बढा़कर 8 फीसदी कर एक तरफ कर्मचारियों को खुश किया है तो वहीं जम्मू-कश्मीर सरकार ने अपने कर्मचारियों को निराश किया है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बजट सत्र में राज्य के वित्त मंत्री अब्दुल रहीम राथर ने जब विधानसभा में बजट रखा तो जम्मू-कश्मीर के अपने कर्मचारियों के लिए कुछ नहीं रखा। वजह साफ है कि जम्मू-कश्मीर का खजाना खाली हो चुका है। गौरतलब है कि राज्य सरकार के कर्मचारी पिछले काफी समय से अपने बकाया वेतन और डीए को बढ़ाने की मांग के लेकर धरना प्रदर्शन करते आ रहे हैं। कई बार इन कर्मचारियों ने सामूहिक हड़ताल भी की लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नही रेंगी। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जब वित्त मंत्री अब्दुल रहीम राथर यह कह रहे थे कि रियासत की माली हालत कर्मचारियों का बकाया वेतन, एरियर और भत्ता भुगतान करने की इजाजत नहीं देती, तब पौने....
क्या किसी राज्य की पहचान धरने व प्रदर्शन होंगे? ऐसा शायद कहीं भी नहीं होगा लेकिन जब से जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस की गठबंधन सरकार बनी है तब से यहां पर हर रोज धरने व प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। इसकी वजह क्या है, आखिर क्यों हर रोज ऐसा हो रहा है। इसका जबाव वर्तमान सरकार नहीं दे पाई है। अगर आंकड़ों पर गौर किया जाए तो इस समय 10 गैरसरकारी संगठन और राज्य सरकार के लगभग सभी विभागों की यूनियनें इन धरनों व प्रदर्शनों में शामिल हैं। शहर का कोई भी चौक ऐसा नहीं है जिस पर हर रोज पुतले न जलते हों। बेरोजगार इंजीनियर डिप्लोमा होल्डर, कृषि विभाग से निकाले गए कर्मचारी, होम गार्ड कर्माचारी, स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी और खासकर राज्य परिवहन निगम के कर्मचारी पिछले 4 महीने से लगाकर सड़कों पर उतर रहे हैं। आए दिन उन पर लाठीचार्ज होता है लेकिन इन....
जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रवाद की राजनीति इस कदर हावी हो गई है कि जम्मू और कश्मीर के नेता अपनी-अपनी रोटियां सेंकने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। बात चाहे अमरनाथ भूमि मुद्दे की हो या फिर सैंट्रल यूनिवर्सिटी की। हर पार्टी अपने वोट बैंक को लेकर राजनीति की विसात बिछाने में लग जाती है। अभी एक साल पहले अमरनाथ की भूमि का मुद्दा जम्मू और कश्मीर में एक ज्वलंत मुद्दा बन गया था। दोनों ही जगहों के नेताओं ने अपने-अपने तरीके से लोगों को खूब भरमाया लेकिन विधानसभा चुनावों के बाद सब नेता भूल गए और तीन महीने चले आंदोलन के जख्म पीछे छोड़ गए। जम्मू और कश्मीर में आंदोलन के दौरान कई जानें गईं। कई युवा पुलिस की गोली का शिकार बने और कईयों ने जज्बात में आकर आत्महत्या कर ली लेकिन आज इनके परिवारों को कोई नहीं पूछ रहा है। अब सैंट्रल यूनिवर्सिटी का....
जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस का गठबंधन है। इसलिए दोनों पार्टियों की प्रतिष्ठा भी इन लोकसभा चुनावों में दांव पर लगी है। बीजेपी और पीडीपी ने कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के खेमे में काफी हलचल पैदा कर दी है। वहीं बीजेपी के लिए भी जम्मू प्रांत की दोनों सीटें जीतना प्रतिष्ठा का सवाल बना हुआ है। पीडीपी कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है तो जम्मू में बीजेपी कांग्रेस के लिए मुसीबत बनी हुई है। हालांकि पहले चरण और दूसरे चरण के चुनाव खत्म हो चुके हैं। जम्मू प्रांत के सभी उम्मीदवारों का भाग्य ईवीएम में बंद हो चुका है लेकिन सभी पार्टियां अपनी अपनी जीत पक्की मानकर बैठी हैं। जम्मू की दोनों लोकसभा सीटें जिनमें जम्मू-पुंछ लोकसभा सीट और उधमपुर-डोडा लोकसभा सीट शामिल है पर चुनाव खत्म हो चुका है। मतदान प्रतिशत भी बहुत कम रहा है जिसके चलते....
लोकसभा चुनाव में नेताओं की हार जीत का फैसला वोटरों के साथ-साथ पार्टी के विभीषणों पर भी टिका है। खासकर जम्मू-कश्मीर में इस समय ऐसी उथल-पुथल मची है कि किसी भी नेता पर यकीन नहीं किया जा सकता है कि वह पार्टी के घोषित उम्मीदवार के साथ चलेगा या फिर उसके खिलाफ। कहते हैं कि अगर विभीषण श्री राम की मदद न करता तो रावण को हराना आसान न होता। रावण की कमजोरियों का पता विभीषण को भलीभांति था। उसी की मदद से रावण का संहार आसान हुआ था। यही हाल संसदीय चुनाव का भी है, यहां भी कई नाराज नेता अपनी ही पार्टी की नैया को डुबोने में लगे हुए हैं। पार्टियों के कई नेता अपने ही उम्मीदवारो के खिलाफ साजिशें रचना शुरू कर दिया है ताकि पार्टी को यह सबक सिखाया जाए कि उन्होंने उम्मीदवार का चयन सही नहीं किया है। खबर यह भी है कि कुछ....
राज्य विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने 1 से 11 तक का सफर तय किया। राज्य के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि बीजेपी को इतनी ज्यादा सीटें यहां पर मिली हों। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या बीजेपी को लोकसभा चुनावों में सफलता मिल पाएगी, क्या पार्टी का कमल यहां पर खिलेगा? जम्मू-कश्मीर में बीजेपी ने इस मुद्दे के हीरो रहे लीलाकरन शर्मा को अपना उम्मीदवार बनाकर एक नया पैंतरा खेला है लेकिन पार्टी की इस कोशिश का विरोध शुरू हो गया है। बाबा अमरनाथ मुद्दे को भुनाकर बीजेपी के 11 विधायक विधानसभा पहुंचने में सफल हो गए और अगर हम बात करें कि जम्मू-पुंछ लोकसभा सीट और उधमपुर-कठुआ लोकसभा सीट पर बीजेपी कब्जा कर पाएगी या नहीं तो अभी कुछ कहना बड़ा मुश्किल होगा क्योंकि हाल ही में राज्यसभा चुनावों में बीजेपी के एक विधायक ने विपक्षी पार्टी को अपना वोट डाल दिया जिससे बीजेपी....
बीते दिनों उमर अब्दुल्ला जब विधानसभा में बजट सत्र के बाद सवालों का जवाब देने के लिए उठे तो पूरे हाल में पिन ड्रॉप साइलेंस हो गया। उमर सब पर भारी पड़ते दिखे। हालांकि यह बजट सत्र कम अविधि का था लेकिन ऐसा लगता है कि उमर पूरी तैयारी करके आए थे। कई बार तो ऐसा भी लगता है कि वह पिछले एकाध साल से ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद जवाब देने की तैयारी कर रहे थे। पीडीपी के तेजतर्रार नेता अब असहाय से नजर आ रहे हैं जो पहले विपक्षी पार्टी पर शेरों की तरह बरसते थे। कोई सोच नहीं सकता था कि जिस पार्टी की सरकार यहां पर एक अर्से तक चली हो। वह एकाएक विपक्ष में आ बैठेगी। यहां तक उसका मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी हार गया हो। यह बात है 2002 के विधानसभा चुनावों की। चलो किसी तरह से....









