बयान आ गया। संघ ने बीजेपी की हार की वजह तलाश ली है। संघ ने कह दिया कि राजनीति, लड़ाई मैदान में लड़ी जाती है एसी कमरों में बैठकर नहीं। हाईटेक प्रचार से नहीं जीते जाते चुनाव, जमीनी प्रबंधन जरूरी होता है। संघ के निशाने पर टीम आडवाणी के वैसे नेता भी हैं जो चुनाव की स्ट्रैटेजी तय कर रहे थे। संघ उवाच में इससे ज्यादा या कम की उम्मीद किसी को नहीं थी। लेकिन क्या यही सच है। बात सन 77 की है। एंटी कांग्रेसिज्म चरम पर था। केन्द्र में पहली बार ऐसी सरकार बन रही थी जिसने कांग्रेस से सत्ता छीन ली थी। ये सरकार जनता पार्टी की थी और ये वो वक्त था जब जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया था लेकिन उसकी अलग पहचान अब भी कायम थी। जनसंघ के सामने एक यक्ष प्रश्न था। सरकार में शामिल होना है कि संगठन....
लुधियाना में एनडीए की रैली थी। मैं भी था वहां, कौतूहलवश गया था। देखना चाहता था कि नरेन्द्र मोदी से परहेज करने वाले नीतीश कुमार वहां पहुंचेंगे क्या। धुकधुकी थी रिपोर्टर होने के नाते कि कह तो रहा हूं कि नीतीश और मोदी एक मंच पर होंगे लेकिन कहीं गच्चा न खा जाऊं। लेकिन एक चीज विश्वास दिला रही थी कि नहीं नीतीश आएंगे। बिहार के चुनाव खत्म हो चुके हैं और वहां नरेन्द्र मोदी की एंट्री पर बैन लगाकर नीतीश ये संदेश दे चुके हैं कि वो महज बीजेपी के साथ हैं, उनकी गोद में नहीं बैठे। खैर, इस उधेड़बुन में वक्त बीत गया और अचानक देखा कि आडवाणी की टीम मंच पर आ रही है। आडवाणी के साथ राजनाथ, नीतीश, शरद, एनडीए के नये सहयोगी चंद्रशेखर राव सभी मंच पर थे। नजरें मोदी को तलाश रही थीं। वो दिख नहीं रहे थे। वैसे, उस वक्त तक....









