संजय दत्त की सजा माफी का मसला इन दिनों जेरे बहस है। इस बहस में इतने बड़े-बड़े मगज मारा मारी कर रहे हैं कि फितनों की मजाल ही क्या। आइए शुरू करते हैं जस्टिस काटजू से। जस्टिस काटजू इन दिनों संजय दत्त की सजा माफी के प्रतिनिधि पैरोकार हैं। जस्टिस काटजू ने संजय दत्त के साथ-साथ 70 साल की वृद्धा जैबुन्निसा की सजा माफी के लिए भी चिट्ठी लिखी है। सवाल है कि ये जैबुन्निसा कहां से आईं? और उससे बड़ा सवाल जैबुन्निसा को संजय दत्त के साथ माफी देने की बात हो रही है या संजय दत्त के बदले? दरअसल जिक्रे जैबुन्निसा आज नहीं तो कल आना ही था। जैबुन्निसा नहीं तो उसकी जगह कोई मंसूर, मुकादम, घंसार होता। संजय दत्त के साथ-साथ जिसे दरअसल कहना चाहिए संजय दत्त के बदले- एक और नाम सामने आना ही था। सनद रहे कि जब जस्टिस काटजू ने संजय की सजा माफी....
चौरी-चौरा कांड, आजादी के आंदोलन का एक परित्यक्त अध्याय। हमारे राष्ट्रीय इतिहास का एक लावारिस पन्ना जिसकी विरासत पर किसी का कोई दावा नहीं। महात्मा गांधी ने न सिर्फ इसे 'चौरी-चौरा का अपराध' बताकर किनारा कर लिया बल्कि ये कलंक भी चौरी-चौरा के ही माथे है कि बापू को असहयोग आंदोलन इसी कांड के चलते स्थगित करना पड़ा। ये कथित कलंक ही है जिसके चलते चौरी-चौरा कांड का कभी कोई ठोस विश्लेषण नहीं हुआ। हमारी स्मृतियों में बस ये एक ऐसी वारदात की तरह दर्ज है जिसमें एक थाना फूंक दिया गया, थाने में मौजूद 23 पुलिसवाले जल मरे और तारीख थी 4 फरवरी, 1922। उपेक्षा की इंतेहा देखिए कि बहुत सी स्मृतियों में लंबे समये तक ये वारदात 5 फरवरी की तारीख पर भी दर्ज रही, वो भी तब जबकि इसका मुकदमा गोरखपुर जिला जेल से लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के आखिरी फैसले तक तकरीबन एक साल तक लगातार....
सांसद अभिजीत मुखर्जी का मलाल जायज है। प्रदर्शनकारी महिलाओं को \'डेंटेड\' और \'पेंटेड\' तो उन्होंने बताया, मीडिया बार-बार उनके \'प्रेसीडेंट\' पापा को क्यों बीच में घसीट रहा है। और नाश हो इस सोशल मीडिया का जहां ऐसे-ऐसे जुमले भी उछले कि \' डैडी मुझसे बोला तू .....\'। अगर आपने आमिर खान की \'डीके बोस\' वाली क्रांतिकारी फिल्म देखी है तो बताने की जरूरत नहीं कि इसके आगे के अल्फाज क्या हैं। लेकिन अभिजीत बाबू मीडिया क्या करे आप जैसों का, जिनकी उपलब्धि ही उनका युवराज होना है। जितना दयनीय आपका बयान था उससे दयनीय थी आपकी सफाई। यूपी-बिहार का \'थेथर से थेथर\' नेता भी सफाई में आपसे बेहतर बयान देता। बावजूद इसके कि वो माफी ही मांग रहा होता। ऐसे में सिर्फ सांसद अभिजीत मुखर्जी कह कर आपका परिचय कराना बे-मानी है। ये तो बताना ही पड़ेगा कि दरअसल आप श्रीमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के सुपुत्र हैं। मैं....
मैं कभी गुजरात नहीं गया और चुनावी दौरे पर लगभग हर पत्रकार मित्र गुजरात में है। सीनियर एंकर संदीप चौधरी चुनावी-चौपाल के सिलसिले में तो अब पॉलिटिकल एडिटर सुकेश रंजन भी। कुछ अन्य संस्थानों में भी मित्र गुजरात के दौरे कर लौटे हैं या आने वाले हैं। हर शख्स से मेरा एक ही सवाल है-क्या नरेंद्र मोदी हैट्रिक लगाएंगे ? और लगता है जैसे इस पर किसी को कोई संशय ही नहीं। पत्रकारीय धर्म का दबाव भले ही कोई एकतरफा जवाब देने से रोके लेकिन ध्वनि चुगली करती है। आईबीएन7 के खास कार्यक्रम चुनावी-चौपाल के सिलसिले में लगातार संदीप से संपर्क में हूं और हर चौपाल में केशुभाई पटेल की जीपीपी का एक प्रतिनिधि होता है। संदीप से पूछता हूं- 'क्या जीपीपी मोदी के लिए 'वोट-कटवा' साबित होगी?' 'संदीप के जवाब में संशय है- लेउवा पटेल छिटके तो हैं !' राहुल गांधी के साथ गुजरात पहुंचे सुकेश रंजन....
गुजरात के विकास पुरुष नरेंद्र मोदी...संघ परिवार के लिए हिंदू हृदय सम्राट नरेंद्र मोदी... गुजरातियों के छोटे सरदार नरेंद्र मोदी.....। मोदी के माथे पर इतने खिताब न होते अगर गोधरा कांड न होता। गोधरा कांड के बाद गुजरात का जबर्दस्त राजनीतिक धुव्रीकरण हुआ। आप या तो मोदी के साथ थे या मोदी के खिलाफ लेकिन इस लहर का उल्टा असर भी हुआ। राजनीति में अछूत हुए मोदी गुजरात तक सिमट कर रह गए। खुद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें राजधर्म के निर्वाह की सीख दी थी लेकिन तब मोदी सफलता के सांप्रदायिक रथ पर सवार थे। मोदी ने वाजपेयी की सलाह मानने की बजाए आडवाणी की दिखाई राह पर चलना तय किया लेकिन गुजरात के बाहर इसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा। एनडीए अगर दूसरी पारी नहीं खेल पाई तो इसके जिम्मेदार मोदी भी थे। जैसे-तैसे पार्टी के करीब आ रहा मुसलमान उससे हमेशा के लिए दूर हो....
बंगाल के वजीरे आला देश के वजीरे दाखिला से खफा हैं। जी हां, बुद्धोबाबू चिदंबरम की चिठ्ठी से चिढ़ गए। नाराजगी ये कि गृहमंत्री की आधिकारिक चिठ्ठी में हरमद वाहिनी का रिश्ता सीपीएम से क्यों जोड़ा गया? हरमद वाहिनी के लोगों को सीपीएम काडर क्यों कहा गया ? दरअसल बुद्धदेव भट्टाचार्य की इस नाराजगी में बेपर्दा होने की चिढ़ ज्यादा है। क्योंकि सच स्वीकारने के बाद पीढ़ियों का पाप कबूलना पड़ेगा। तभी उन्होंने चिदंबरम के साथ अपनी मुलाकात में तृणमूल और माओवादियों की साठगांठ का मुद्दा उछाल दिया। बुद्धदेब भले न मानें मगर हरमद वाहिनी सत्ता में बने रहने की सीपीएमकी तकनीक का ही हिस्सा है। ये तकनीक नई भी नहीं है, खुद ज्योति बाबू ने इसे अपना मौन समर्थन दे रखा था। नब्बे के दशक तक हरमद वाहिनी 'हाइबरनेशन' में थी, मगर ममता की तृणमूल का गठन होते ही वो सतह पर आ गई। मिदनापुर जिले के केशपुर-गढ़बेता कांड....
ये सन 1996-97 का वाकया है। अखबार की पहली-पहली नौकरी थी। क्राइम की खबरों को लेकर एडवेंचर टाइप का उत्साह था। मगर क्राइम की खबरों पर दादा टाइप सीनियरों का कब्जा था। क्राइम बीट से या क्राइम की खबर से वास्ता भी नहीं पड़ता था। एक दिन 'चवन्नियां' रिपोर्टर की किस्मत से क्राइम का छींका फूटा। एक दुर्दांत हिस्ट्रीशीटर के पुलिस के चंगुल में आने की खबर आई। मैं इस हिस्ट्रीशीटर का नाम ले सकता हूं मगर आगे जो कुछ कहने जा रहा हूं उसके लिहाज से ये उचित नहीं होगा। गोपनीयता की नैतिकता का तकाजा भी यही कहता है। बहरहाल दिन के ग्यारह बजे थे, दफ्तर में पहुंचा ही था....अचानक ब्यूरो चीफ ने कहा- 'जरा फलां थाने चले जाओ। सुना है कि अमुक गैंगस्टर को कहीं से उठाया है। थाने पर ही रखा है। देखो, मिलने देते हैं या नहीं। अगर एनकाउंटर करना होगा तो मिलने....









