उन दिनों बीजेपी मेरी बीट हुआ करती थी, एक प्रोडक्शन हाउस के लिए मैं रिपोर्टिंग करता था। इन्हीं दिनों बीजेपी के चाणक्य प्रमोद महाजन को भी कई बार नजदीक से देखने का मौका मिला कई बार पार्टी कार्यालय में या फिर सफदरजंग लेन के उनके बंगले पर। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में प्रमोद महाजन की क्या हैसियत थी किसी से छुपी नहीं। पार्टी के हर फैसलों में उनका दखल होता और सरकार के हर काम उनसे सलाह लिए बिना किए नहीं जाते। बेहद सधा हुआ व्यक्तित्व, दिग्गज राजनेताओं जैसे हावभाव और बोलने में महारत। जमीन से जुड़ा नेता न होने के बावजूद प्रमोद महाजन का पार्टी में कोई सानी नहीं था। हालांकि उस वक्त भी उनकी पर्सनल जिंदगी को लेकर पत्रकार बिरादरी में तरह तरह की चर्चाएं होती रहतीं थीं पर प्रमोद महाजन ऐसी बातों को सौ पर्दों में रखना अच्छी तरह जानते थे। राज़ तो बहुत थे....
तीन दिनों से 'फरार' अमित शाह जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में अचानक प्रकट हुए तो लगा कि नेता जी पूरी तैयारी के साथ आए होंगे मीडिया के सवालों का जवाब देने। पर अफसोस थोथा चना बाजे घना वाली कहावत याद आ गई शाह के मुंह से निकली अमृत वाणी सुनकर। एक रिपोर्टर ने उनके और एनकाउंटर करने वाले पुलिस वालों के बीच की बातचीत के ब्यौरे पर सवाल दागा कि क्या कहेंगे शाह साहब आप अपनी सफाई में। सवाल पूछने पर मोदी के ये खासमखास नेता बोल पड़े कि आपकी मुझसे बात हो रही है, अब अगर मैं हत्या कर दूं तो आप दोषी हो जाएंगी। शाह ने समझा मैंने सही निशाने पर तीर मारा है, अंदर ही अंदर खुशी उबाल मार रही थी कि एक पत्रकार ने सवाल दाग कर उनकी खुशी वापस हलक में अटका दी, सवाल बहुत छोटा था लेकिन तीर की तरह निशाने पर लगा। पत्रकार ने....
राजनीति में मुर्दे कभी दफन नहीं किए जाते उन्हें जिंदा रखा जाता है ताकि वक्त आने पर वो बोलें। प्रकाश झा की 'राजनीति' में मनोज वाजपेयी का ये डायलॉग आज नरेंद्र मोदी के पटना के ताजा भाषण के बाद अचानक याद आ गया। पटना में बीजेपी की स्वाभिमान रैली में पूरे कॉन्फिडेंस से कांग्रेस की बखिया उधेड़ते नरेन्द्र मोदी और साल 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान मोदी को उनकी ही मांद में घुसकर उन्हें उनकी औकात बतातीं सोनिया गांधी। राजनीति के गड़े मुर्दे होते क्या हैं ये जानने के लिए इन दोनों बातों का जिक्र एक साथ करना लाज़मी है क्योंकि आज अरसे बाद मोदी ने एक बार फिर कुछ गड़े मुर्दों को बुलवाया है। सोनिया गांधी को खरी-खरी सुनाई है। मोदी ने कहा कि भोपाल गैस कांड में हजारों लोगों की जानें गईं और भोपाल के गुनहगार वॉरेन एंडरसन को बचाने में उस वक्त की कांग्रेस शासित....
राजनीति किस हद तक गंदी हो सकती है, राजनीति कैसे रंग बदल सकती है और राजनीति कैसे एक भरे पूरे परिवार को नफरत और बदले की आग में अंगार बना सकती है। ये सब कुछ देखने को मिला प्रकाश झा की राजनीति में। हमारे देश की स्टेट पॉलिटिक्स का खाका खींचने की कोशिश में झा बहुत हद तक कामयाब रहे हैं। गंगाजल और अपहरण जैसी फिल्मों के जरिए जबरदस्त फैन फालोइंग बटोरने वाले प्रकाश झा ने इस फिल्म के बाद अपना लोहा मनवाने वालों की फेहरिस्त में और इजाफा कर दिया है। इस वीकएंड फिल्म देखकर निकला तो मन में यही ख्याल आया कि महाभारत के किरदारों की माला में आज के राजनेताओं को पिरोने का ये काम बखूबी अंजाम दिया है डायरेक्टर ने। बड़ा कैनवास, बड़ा बजट और सितारों की लंबी चौड़ी फौज और नाना से लेकर रणबीर तक सबकी शानदार अदाकारी। मानो एक एक एक्टर इसी रोल के....
बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी आजकल कुत्तों से बचते फिर रहे होंगे। वो क्या है कि सारी कुकुर बिरादरी उनसे नाराज चल रही है। गडकरी ने मुलायम और लालू यादव सरीखे नेताओं से उनकी तुलना जो कर दी। मुमकिन है वो सोच रहे हों कि इतने सालों की वफादारी का गडकरी नाम के इस इंसान ने आखिर ये क्या सिला दिया। संघ की पाठशाला के अगली पंक्ति के चेले रहे नए नवेले बीजेपी अध्यक्ष कह बैठे कि लालू मुलायम तो सोनिया गांधी के तलवे चाटने वाले कुत्ते हैं। मुहावरा प्रेमी गडकरी ने अब ऐसा अनजाने में कहा या जान बूझकर कह नहीं सकता, क्योंकि \'कुत्ता नहीं कुत्ते जैसा कहा\' ये कहकर खेद व्यक्त कर लेने के बाद भी मेरी जब उनसे बात हुई तो अपने कहे का पछतावा तो दूर की बात वो एक बार भी ये मानने के लिए तैयार नहीं हुए कि उनसे कोई गलती हुई है।....
ये क्या हो गया है कांग्रेस पार्टी को, क्यों पार्टी के सारे के सारे नेताओं को अचानक अमिताभ बच्चन तो क्या पूरे के पूरे बच्चन परिवार से एलर्जी हो गई है। हद तो तब हो गई जब कांग्रेस ने सीधे-सीधे बिग बी से सवाल करते हुए ये कहा कि वो देश के लोगों को बताएं कि गुजरात दंगों और उसमें नरेंद्र मोदी की भूमिका पर उनकी राय क्या है। गोया अमिताभ न हो गए बीजेपी के कोई नेता हो गए, अरे भई मैं पूछता हूं आप होते कौन हैं उनसे ये सवाल पूछने वाले। आखिर किस हैसियत से देश की एक पॉलिटिकल पार्टी एक नॉन पॉलिटिकल इंसान से ये सवाल पूछ रही है ? पार्टी के नेता मनीष तिवारी तीखे तेवर दिखाते हुए कहते हैं कि अगर अमिताभ बच्चन गुजरात के ब्रैंड अंबैसडर हैं तो उन्हें दंगों और मोदी पर अपनी सोच जाहिर करनी होगी। पहले तो वो ये जान....
नेताजी को लगता है कि महिला आरक्षण के बाद संसद में ऐसी महिलाएं आएंगी जिन्हें देखकर लोग (जाहिर है बात संसद की हो रही है तो सांसद) सीटी बजाएंगे। एक प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय सरकार में देश की रक्षा की जिम्मेदारी संभाल चुके मुलायम सिंह यादव सरीखे नेता के इस आपत्तिजनक बयान को सुनकर सबसे पहले एक ही सवाल जेहन में आया। अगर ऐसा है तो थोड़े दिनों पहले तक फिरोजाबाद के गली कूचे में घूम घूमकर लोगों से वोट मांगता पूरा यादव परिवार अपनी बहू डिंपल यादव को संसद तक पहुंचाने का ख्वाब क्यों देख रहा था, क्या वाकई फिरोजाबाद की सांसदी, राज बब्बर से 85000 वोटों से हारने के बाद यादव परिवार ने घर में खुशियां मनाईं होंगी कि चलो अच्छा हुआ घर की इज्जत घर में ही रह गई। वाकई शर्म आती है इस देश के मुलायम सरीखे नेताओं पर, रोना आता है इनकी राजनीति....
संडे को फनडे कहा जाता है आमतौर पर इस दिन लोगों की छुट्टियां होती हैं पर मैं उन खुशनसीबों में से नहीं। बहरहाल इस रोने-धोने का तो कभी अंत होगा नहीं सो आगे बढ़ते हैं। मन मारकर घर से निकला और ऑफिस पहुंचते ही एक खौफनाक खबर मिली...किंगफिशर एअरलाइंस में बम की। खुदा का लाख-लाख शुक्र था कि थोड़ी देर में ही ये साफ हो गया कि बम को डिफ्यूज कर दिया गया है और सभी यात्री बाल-बाल बच गए। पर बार-बार जेहन में ये ख्याल आ रहा था कि आज क्या हो सकता था, फिर सोचा कि आतंकवादी चाहे जितनी धमकी दे लें हम नहीं बदलेंगे, आंतकवाद हमारा चाहे जितना कुछ बिगाड़ लें हम नहीं बदलेंगे। ये जानते हुए भी कि मौजूदा दौर के आंतकवाद में सबसे बड़ा खतरा हवाई सुरक्षा को है हम नहीं बदलेंगे। अगर ऐसा न होता तो अखबार में लिपटा एक देसी बम तिरुअनंतपुरम....
आखिर ये क्या हो गया है बीजेपी को, लगातार दो लोकसभा चुनावों में मात खाने के बाद बदले बदले से क्यों नजर आ रहे हैं पार्टी के तेवर। संघ के पसंदीदा नए नवेले अध्यक्ष नितिन गडकरी तो मुसलमानों को साथ लाने की अपील कर रहे हैं वो कह रहे हैं कि मुसलमान भाई आगे आएं और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम करते हुए विवादित स्थल पर एक भव्य राम मंदिर बनने दें। राम मंदिर आंदोलन के हीरो कहलाने वाले आडवाणी के सामने ही मंच पर दिल बड़ा करते हुए वो ये भी कहते हैं कि अगर बगल की कोई जगह मिल गई तो बीजेपी विवादित स्थल के बगल में एक भव्य मस्जिद का निर्माण करवाने में पूरा सहयोग करेगी। आप ही बताएं दिसंबर 1992 के बाबरी विध्वंस के बाद क्या बीजेपी के पास वाकई इस अपील का नैतिक अधिकार है?, पर जो भी हो आज जमीन आसमान का....
अब ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों का विरोध नहीं करेंगे बाल ठाकरे और उनके लोग, जल्दबाजी में नहीं बहुत सोच समझ कर फैसला किया है ठाकरे ने। मन में एक उधेड़बुन सी चल रही होगी क्या करें क्या न करें शाहरुख ने ऐसी बैंड बजाई कि कहीं के नहीं रहे, किस मुंह से किसी बात का विरोध करें, पता नहीं कोई मानेगा भी या नहीं, पता नहीं कोई डरेगा भी या नहीं। कहीं नफरत के सौदागर बन चुके शिवसैनिकों को फिर मुंह की न खानी पड़ जाए। कहीं उल्टे जनता का विरोध न सहना पड़ जाए। शरद पवार से ठाकरे की मुलाकात का जिक्र इसलिए नहीं कर रहा क्योंकि ठाकरे के फैसले का इससे कोई ताल्लुक नहीं है अगर पवार की दोस्ती की वजह से ही फैसला बदलना था तो कल तक शिवसेना के तमाम गुंडे ये कहते न फिरते कि हम तो ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को मुंबई की धरती पर कदम....









